"सिख धर्म की आलोचना" के अवतरणों में अंतर

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(→‎धर्मशास्र: महर्षि दयानंद के नाम से जो भ्रम फैला कर हिंदू, सिख और आर्यसमाज ओं में द्वेष फैलाने का प्रयास पहले के पैराग्राफ में किया गया है , वह अप्रामाणिक है। महर्षि दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में लिखा प्रकरण वैसा का वैसा देकर अपनी टिप्पणी लिखी है। स्वामी दयानंद जी ने कहीं भी नानक जी को दूषित नहीं लिखा।)
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टैग: मोबाइल संपादन मोबाइल वेब सम्पादन यथादृश्य संपादिका
मूर्त्तिपूजा तो नहीं करते किन्तु उस से विशेष ग्रन्थ की पूजा करते हैं, क्या यह मूर्त्तिपूजा नहीं है? किसी जड़ पदार्थ के सामने शिर झुकाना वा उस की पूजा करनी सब मूर्त्तिपूजा है। जैसे मूर्त्तिवालों ने अपनी दुकान जमाकर जीविका ठाड़ी
की है वैसे इन लोगों ने भी कर ली है। जैसे पूजारी लोग मूर्त्ति का दर्शन कराते; भेंट चढ़वाते हैं वैसे नानकपन्थी लोग ग्रन्थ की पूजा करते; कराते; भेंट भी चढ़वाते हैं। अर्थात् मूर्त्तिपूजा वाले जितना वेद का मान्य करते हैं उतना ये लोग ग्रन्थसाहब वाले नहीं करते। हां! यह कहा जा सकता है कि इन्होंने वेदों को न सुना न देखा; क्या करें? जो सुनने और देखने में आवें तो बुद्धिमान् लोग जो कि हठी दुराग्रही नहीं हैं वे सब सम्प्रदाय वाले वेदमत में आ जाते हैं। परन्तु इन सब ने भोजन का बखेड़ा बहुत सा हटा दिया है। जैसे इस को हटाया वैसे विषयासक्ति दुरभिमान को भी हटाकर वेदमत की उन्नति करें तो बहुत अच्छी बात है।"
यहां एक और विनती है कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपना कोई संप्रदाय नहीं चलाया और स्पष्ट लिखा है कि आर्य समाज की स्थापना से मेरा उद्देश्य कोई मत संप्रदाय चलाना नहीं किंतु ब्रह्मा से लेकर जय मिनीजैमिनी मुनि पर्यंत जो परंपरा भारत में मानी जाती रही और जो बाद में दूषित हो गई उस और दूषितअदूषित शुद्ध परंपरा की पुनर्स्थापना महर्षि का उद्देश्य था और हिंदुओं, भारत और विश्व के कल्याण के लिए महर्षि के इस उद्देश्य को जो समझ सकता है वही महर्षि की भाषा को समझ सकता है अपनी अपनी ढपली अपना-अपना राग लेकर चलोगे तो एकता असंभव है अंत में तो उस ओंकार को मानना ही पड़ेगा उस अकाल को मानना ही पड़ेगा जिसकी शिक्षा गुरु साहिबान होने दी जिसके शिक्षा महर्षि दयानंद ने दी और जो वेदों में उल्लिखित है आप एक ही पुस्तक में दो और दो बराबर 4 और 2 और 2 बराबर 5 एक साथ नहीं रख सकते इस बात को समझ लोगे तो दयानंद को समझ लोगे।
 
अपनी अपनी ढपली अपना-अपना राग लेकर चलोगे तो एकता असंभव है ।
 
अंत में तो उस ओंकार को मानना ही पड़ेगा, उस अकाल को मानना ही पड़ेगा, जिसकी शिक्षा गुरु साहिबानों ने दी, जिसकी शिक्षा महर्षि दयानंद ने दी और जो वेदों में उल्लिखित है ।
 
आप एक ही पुस्तक में दो और दो बराबर 4 तथा 2 और 2 बराबर 5 एक साथ नहीं रख सकते ।
 
इस बात को समझ लोगे तो दयानंद को समझ लोगे।
 
 
 
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