"अग्निपुराण" के अवतरणों में अंतर

398 बैट्स् जोड़े गए ,  6 माह पहले
छो
बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है
छो (2405:205:2317:AC17:0:0:25D2:D8A5 (Talk) के संपादनों को हटाकर अजीत कुमार तिवारी के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया)
टैग: प्रत्यापन्न
छो (बॉट: पुनर्प्रेषण ठीक कर रहा है)
| translator =
| image = [[चित्र:अग्निपुराण.gif|150px]]
| image_caption = अग्निपुराण, [[गीताप्रेस|गीताप्रेस गोरखपुर]] का आवरण पृष्ठ
| author = वेदव्यास
| illustrator =
| cover_artist =
| country = [[भारत]]
| language = [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]]
| series = [[पुराण]]
| subject = विष्णु तथा शिव महात्यम्
}}
 
'''अग्निपुराण''' [[पुराण|पुराण साहित्य]] में अपनी व्यापक दृष्टि तथा विशाल ज्ञान भंडार के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। विषय की विविधता एवं लोकोपयोगिता की दृष्टि से इस पुराण का विशेष महत्त्व है। अनेक विद्वानों ने विषयवस्‍तु के आधार पर इसे 'भारतीय संस्‍कृति का विश्‍वकोश' कहा है। अग्निपुराण में त्रिदेवों – [[ब्रह्मा]], [[विष्णु|विष्‍णु]] एवं [[शिव]] तथा [[सूर्य]] की पूजा-उपासना का वर्णन किया गया है। इसमें परा-अपरा विद्याओं का वर्णन, [[महाभारत]] के सभी पर्वों की संक्षिप्त कथा, [[रामायण]] की संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि [[अवतार|अवतारों]] की कथाएँ, सृष्टि-वर्णन, दीक्षा-विधि, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओं के मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयों का अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है।
 
इस पुराण के वक्‍ता भगवान [[अग्नि देव|अग्निदेव]] हैं, अतः यह 'अग्निपुराण' कहलाता है। अत्‍यंत लघु आकार होने पर भी इस पुराण में सभी विद्याओं का समावेश किया गया है। इस दृष्टि से अन्‍य पुराणों की अपेक्षा यह और भी विशिष्‍ट तथा महत्‍वपूर्ण हो जाता है।
 
[[पद्म पुराण]] में [[विष्णु|भगवान् विष्‍णु]] के पुराणमय स्‍वरूप का वर्णन किया गया है और अठारह पुराण भगवान के 18 अंग कहे गए हैं। उसी पुराणमय वर्णन के अनुसार ‘अग्नि पुराण’ को भगवान विष्‍णु का बायां चरण कहा गया है।
 
== कथा एवं विस्तार ==
;विस्तार
:आधुनिक उपलब्ध अग्निपुराण के कई संस्करणों में ११,४७५ श्लोक है एवं ३८३ अध्याय हैं, परन्तु [[नारद पुराण|नारदपुराण]] के अनुसार इसमें १५ हजार श्लोकों तथा [[मत्स्य पुराण|मत्स्यपुराण]] के अनुसार १६ हजार श्लोकों का संग्रह बतलाया गया है। [[बल्लाल सेन]] द्वारा दानसागर में इस पुराण के दिए गए उद्धरण प्रकाशित प्रतियों में उपलब्ध नहीं है। इस कारण इसके कुछ अंशों के लुप्त और अप्राप्त होने की बात अनुमानतः सिद्ध मानी जा सकती है।
 
अग्निपुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है।
 
== अग्नि पुराण का महत्त्व ==
पुराण साहित्य में अग्निपुराण अपनी व्यापक दृष्टि तथा विशाल ज्ञान भंडार के कारण विशिष्ट स्थान रखता है। साधारण रीति से पुराण को 'पंचलक्षण' कहते हैं, क्योंकि इसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (संहार), वंश, मन्वंतर तथा वंशानुचरित का वर्णन अवश्यमेव रहता है, चाहे परिमाण में थोड़ा न्यून ही क्यों न हो। परंतु अग्निपुराण इसका अपवाद है। प्राचीन भारत की परा और अपरा विद्याओं का तथा नाना [[भौतिकीभौतिक शास्त्र|भौतिकशास्त्रों]] का इतना व्यवस्थित वर्णन यहाँ किया गया है कि इसे वर्तमान दृष्टि से हम एक विशाल [[विश्वज्ञानकोश|विश्वकोश]] कह सकते हैं।
 
: ''आग्नेय हि पुराणेऽस्मिन् सर्वा विद्याः प्रदर्शिताः''
अग्निपुराण के विषय में ज्ञातव्य है कि यह लोकशिक्षण के लिए उपयोगी विद्याओं का संग्रह प्रस्तुत करने वाला ग्रन्थ है जिसे 'पौराणिक कोष' भी कह सकते हैं। अग्निपुराण के समय को निर्धारित करना कठिन कार्य है। भारतीय परम्परा के अनुसार अग्निपुराण में [[काव्यशास्त्र]] से सम्बन्धित सिद्धान्त सबसे पहले लिखे गये थेे। महेश्वर ने काव्यप्रकाशार्थ में लिखा है- [[भरत मुनि|भरत]] ने अलङ्कार शास्त्र की सामग्री को अग्निपुराण से लिया था और इसको संक्षिप्त कारिकाओं में निबद्ध किया था। इसी प्रकार [[साहित्यकौमुदी]] की टीका में विद्याभूषण लिखते हैं कि भरत ने अग्निपुराण आदि को देखकर संक्षिप्त कारिकाओं द्वारा साहित्य की प्रक्रिया का निबन्धन किया था। इस प्रकार अग्निपुराण का समय भरत से पहले का प्रतिपादित होता है।
 
परन्तु आधुनिक समालोचकों के अनुसार अग्निपुराण बहुत बाद की रचना है तथा इसका वर्तमान रूप भरत, भामह, दण्डी, आनन्दवर्धन, भोज के भी बाद का है। अग्निपुराण को इतना आर्वाचीन सिद्ध करने के लिए यह उक्तियाँ दी गयी हैं, अग्निपुराण के निर्माणकाल का परिचय दिया जा सकता है। अग्निपुराण भोजराज के [[सरस्वतीकंठाभरण|सरस्वतीकण्ठाभरण]] का प्रधान उपलीव्य ग्रन्थ है, अतः इसे एकादश शती से प्राचीन होना चाहिए। अग्निपुराण का अपना उपजीव्य ग्रन्थ दण्डी का काव्यादर्श है। इस पुराण को सप्तम शती से प्राक्कालीन स्वीकार किया गया है। अतः अग्निपुराण का रचनाकाल सप्तम, नवम शती के मध्य में मानना सर्वथा समीचीन होगा।
 
== अध्यायानुसार विचार ==
अग्निपुराण में वर्ण्य विषयों पर सामान्य दृष्टि डालने पर भी उनकी विशालता और विविधता पर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। आरम्भ में [[दशावतार]] (अ. १-१६) तथा [[सृष्टि]] की उत्पत्ति (अ. १७-२०) के अनन्तर [[मंत्रमन्त्र|मंत्रशास्त्र]]शास्त्र तथा [[वास्तु शास्त्र|वास्तुशास्त्र]] का सूक्ष्म विवेचन है (अ. २१-१०६) जिसमें मन्दिर के निर्माण से लेकर देवता की प्रतिष्ठा तथा उपासना का पुखानुपुंख विवेचन है। [[भूगोल]] (अ. १०७-१२०), ज्योति शास्त्र तथा वैद्यक (अ. १२१-१४९) के विवरण के बाद [[राजनीति]] का विस्तृत वर्णन किया गया है जिसमें अभिषेक, साहाय्य, सम्पत्ति, सेवक, [[दुर्ग]], [[राजधर्म]] आदि आवश्यक विषय निर्णीत हैं (अ. २१९-२४५)। [[धनुर्वेद]] का विवरण बड़ा ही ज्ञानवर्धक है जिसमें प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों तथा सैनिक शिक्षा पद्धति का विवेचन विशेष उपादेय तथा प्रामाणिक है (अ. २४९-२५८)। अंतिम भाग में [[आयुर्वेद]] का विशिष्ट वर्णन अनेक अध्यायों में मिलता है (अ. २७९-३०५)। [[छन्दशास्त्र|छंदशास्त्र]], [[काव्यशास्त्र|अलंकार शास्त्र]], [[व्याकरण]] तथा [[शब्दकोश|कोश]] विषयक विवरणों के लिए अध्याय लिखे गए हैं।
 
{|class='wikitable'
85,209

सम्पादन