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[[Image:Working Committee.jpg|250px|thumb|right|[[अखिल भारतीय मुस्लिम लीग]] की कार्य समिति की [[लाहौर]] बैठक में देश भर से आए महत्वपूर्ण मुसलमान नेतागण]]
'''लाहौर प्रस्तावना''',({{lang-ur|{{Nastaliq|قرارداد لاہور}}}}, ''क़रारदाद-ए-लाहौर''; [[बाङ्ला भाषा|बंगाली]]: লাহোর প্রস্তাব, ''लाहोर प्रोश्ताब''), सन 1940 में [[अखिल भारतीय मुस्लिम लीग]] द्वारा प्रस्तावित एक आधिकारिक राजनैतिक संकल्पना थी जिसे मुस्लिम लीग के 22 से 24 मार्च 1940 में चले तीन दिवसीय [[लाहौर]] सत्र के दौरान पारित किया गया था। इस प्रस्ताव द्वारा [[ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]] के उत्तर पश्चिमी पूर्वी क्षेत्रों में, तथाकथित तौर पर, मुसलमानों के लिए "'''स्वतंत्र रियासतों'''" की मांग की गई थी एवं उक्तकथित इकाइयों में शामिल प्रांतों को [[स्वायत्तता]] एवं [[सम्प्रभुता|संप्रभुता]] युक्त बनाने की भी बात की गई थी। तत्पश्चात, यह संकल्पना "[[मुसलमान|भारत के मुसलमानों]]" के लिए '''[[पाकिस्तान]]''' नामक मैं एक अलग स्वतंत्र स्वायत्त मुल्क बनाने की मांग करने में परिवर्तित हो गया।<ref>"North Western and Eastern Zones of [[British India]] should be grouped to constitute ‘independent states’ in which the constituent units should be autonomous and sovereign"- Lahore Resolution. [http://criticalppp.com/archives/43698]</ref><ref>{{cite web|author=<!--[if IE 6]> <![endif]--> |url=http://www.alarabiya.net/views/2009/03/24/69098.html |title=Do we know anything about Lahore Resolution? |publisher=Alarabiya.net |date=March 24, 2009 |accessdate=June 2, 2013}}</ref><ref>Christoph Jaffrelot (Ed.) (2005), ''A History of Pakistan and Its Origins'', Anthem Press, ISBN 978-1-84331-149-2</ref>
 
हालांकि पाकिस्तान नाम को चौधरी चौधरी रहमत अली द्वारा पहले ही प्रस्तावित कर दिया गया था परंतु
<ref>Choudhary Rahmat Ali, (1933), ''[[Now or Never; Are We to Live or Perish Forever?]]'', pamphlet, published January 28. (Rehmat Ali at the time was an undergraduate at the [[कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय|University of Cambridge]])</ref> सन 1933 तक मजलूम हक मोहम्मद अली जिन्ना एवं अन्य मुसलमान नेता हिंदू मुस्लिम एकता के सिद्धांत पर दृढ़ थे,<ref>Ian Talbot (1999), ''Pakistan: a modern history'', St. Martin's Press, ISBN 0-312-21606-8</ref> परंतु अंग्रेजों द्वारा लगातार प्रचारित किए जा रहे विभाजन प्रोत्साह गलतफहमियों मैं हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति अविश्वास और द्वेष की भावना को जगा दिया था इन परिस्थितियों द्वारा खड़े हुए अतिसंवेदनशील राजनैतिक माहौल ने भी पाकिस्तान बनाने के उस प्रस्ताव को बढ़ावा दिया था<ref>Reginald Coupland (1943), ''Indian Politics (1936–1942)'', Oxford university press, London</ref>
 
इस प्रस्ताव की पेशी के उपलक्ष में प्रतीवर्ष 23 मार्च को [[पाकिस्तान]] में [[पाकिस्तान दिवस|यौम-ए-पाकिस्तान]]('''पाकिस्तान दिवस''') के रूप में मनाया जाता है।
 
== पृष्ठभूमि व सत्र ==
[[File:Chaudhry Khaliquzzaman.jpg|250px|thumb|right|मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र में भाषण देते हुए मौलाना खलकुज़्ज़माम]]
[[२३ मार्च|23 मार्च]] को [[लाहौर]] के [[इक़बाल पार्क|मिंटो पार्क]] में [[अखिल भारतीय मुस्लिम लीग|ऑल इंडिया मुस्लिम लीग]] के तीन दिवसीय वार्षिक बैठक के अंत में वह ऐतिहासिक संकल्प पारित किया गया था, जिसके आधार पर [[ऑलअखिल इंडियाभारतीय मुस्लिम लीग|मुस्लिम लीग]] ने भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के अलग देश के अधिग्रहण के लिए आंदोलन शुरू किया था और सात साल के बाद अपनी मांग पारित कराने में सफल रही।
 
[[उपमहाद्वीप]] में [[ब्रिटिश राज]] द्वारा सत्ता जनता को सौंपने की प्रक्रिया के पहले चरण में 1936/1937 में पहले आम चुनाव हुए थे उनमें [[मुस्लिम लीग]] को बुरी तरह से हार उठानी पड़ी थी और उसके इस दावे को गंभीर नीचा पहुंची थी कि वह उपमहाद्वीप के मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि सभा है। इसलिए [[मुस्लिम लीग]] नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गए थे और उन पर एक अजब बेबसी का आलम था।
 
[[कांग्रेस]] को [[चेन्नई|मद्रास]], यू पी, सी पी, [[बिहार]] और [[ओडिशा|उड़ीसा]] में स्पष्ट बहुमत हासिल हुई थी, [[खैबरख़ैबर पख्तूनख्वापख़्तूनख़्वा|सीमा]] और [[मुंबईमुम्बई|बम्बई]] में उसने दूसरे दलों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का गठन किया था और [[सिंध]] और [[असम]] में जहां [[मुसलमान|मुस्लिम]] हावी थे [[अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] को काफी सफलता मिली थी।
 
पंजाब में अलबत्ता [[सिर इनाम हुसैन]] के [[यूनीनसट पार्टी]] और [[बंगाल]] में [[कृपा हक|मौलवी कृपा हक]] की प्रजा कृषक पार्टी को जीत हुई थी।
 
[[File:Muhammad Zafarullah Khan.jpg|thumb|left|upright|मुहम्मद जफरुल्ला खान, दस्तावेज के लेखक]]
इस दौरान [[अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] ने जो पहली बार सत्ता के नशे में कुछ ज्यादा ही सिर शार थी, ऐसे उपाय किए जिनसे मुसलमानों के दिलों में भय और खतरों ने जन्म लेना शुरू कर दिया। जैसे [[अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] ने [[हिन्दी|हिंदी]] को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया, गाओ क्षय पर पाबंदी लगा दी और [[अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] के तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया।
 
इस मामले में [[मुस्लिम लीग]] की सत्ता खोने के साथ अपने नेतृत्व में यह भावना पैदा हो रहा था कि [[मुस्लिम लीग]] सत्ता से इस आधार पर वंचित कर दी गई है कि वह अपने आप को मुसलमानों की प्रतिनिधि सभा कहलाती है। यही प्रारंभ बिंदु था मुस्लिम लीग के नेतृत्व में दो अलग राष्ट्रों की भावना जागरूकता कि।
 
इसी दौरान [[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्व युद्ध]] समर्थन के बदले सत्ता की भरपूर हस्तांतरण के मसले पर [[ब्रिटिश राज]] और [[अखिलभारतीय भारतीयराष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] के बीच चर्चा भड़का और [[अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] सत्ता से अलग हो गई तो [[मुस्लिम लीग]] के लिए कुछ दरवाजे खुलते दिखाई दिए। और इसी पृष्ठभूमि में [[लाहौर]] में '' [[अखिल भारतीय मुस्लिम लीग|ऑल इंडिया मुस्लिम लीग]] '' 'का यह 3 दिवसीय बैठक 22 मार्च को शुरू हुआ।
 
बैठक से 4 दिन पहले [[लाहौर]] में [[अल्लामा पूर्वी इनायत उल्लाह ख़ां|अल्लामा पूर्वी]] के [[दीन]] पार्टी ने पाबंदी तोड़ते हुए एक सैन्य परेड की थी जिसे रोकने के लिए पुलिस ने गोलीबारी की। 35 के करीब दीन मारे गए। इस घटना की वजह से [[लाहौर]] में जबरदस्त तनाव था और [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] में [[मुस्लिम लीग]] की सहयोगी पार्टी [[यूनीनसट पार्टी]] सत्ता थी और इस बात का खतरा था कि दीन के फावड़ा वाहक कार्यकर्ता , [[मुस्लिम लीग]] का यह बैठक न होने दें या इस अवसर पर हंगामा बरपा है।
 
संयोग ही गंभीरता के मद्देनजर [[मोहम्मद अली जिन्नाह|मुहम्मद अली जिन्ना]] ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया जिसमें उन्होंने पहली बार कहा कि [[भारत]] में समस्या सांप्रदायिक ोरारना तरह का नहीं है बल्कि बेन इंटरनेशनल है यानी यह दो देशों की समस्या है।
 
उन्होंने कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों में अंतर इतना बड़ा और स्पष्ट है कि एक केंद्रीय सरकार के तहत उनका गठबंधन खतरों से भरपूर होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में एक ही रास्ता है कि उन्हें अलग ममलकतें हूँ।
 
दूसरे दिन इन्हीं पदों पर [[२३ मार्च|23 मार्च]] को इस समय के [[बंगाल]] के [[मुख्यमन्त्री (भारत)|मुख्यमंत्री]] [[कृपा हक|मौलवी कृपा हक]] ने संकल्प लाहौर दिया जिसमें कहा गया था कि इस तब तक कोई संवैधानिक योजना न तो व्यवहार्य होगा और न मुसलमानों को होगा जब तक एक दूसरे से मिले हुए भौगोलिक इकाइयों अलग गाना क्षेत्रों में परिसीमन न हो। संकल्प में कहा गया था कि इन क्षेत्रों में जहां मुसलमानों की संख्यात्मक बहुमत है जैसे कि भारत के उत्तर पश्चिमी और पूर्वोत्तर क्षेत्र, उन्हें संयोजन उन्हें मुक्त ममलकतें स्थापित की जाएं जिनमें शामिल इकाइयों को स्वायत्तता और संप्रभुता उच्च मिल।
 
मौलवी इनाम उल द्वारा की पेशकश की इस संकल्प का समर्थन यूपी के मुस्लिम लेगी नेता [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]], पंजाब [[मौलाना जफर अली खान]], सीमा से [[सरदार औरंगजेब]] सिंध से [[सिर अब्दुल्ला हारून]] और बलूचिस्तान से [[काजी ईसा]] ने की। संकल्प [[२३ मार्च|23 मार्च]] को समापन सत्र में पारित किया गया।
 
अप्रैल सन् 1941 में [[चेन्नई|मद्रास]] में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में ''' संकल्प लाहौर '''को पार्टी के [[संविधान]] में शामिल किया गया और इसी के आधार पर [[पाकिस्तान आंदोलन]] शुरू हुई। लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान नहीं की गई थी, जिनमें शामिल अलग मुस्लिम राज्यों की मांग किया जा रहा था।
 
[[Image:Ispahani..jpg|left|thumb|[[हसन इस्फ़हानी]]]]
पहली बार पाकिस्तान की मांग के लिए क्षेत्रों की पहचान 7 अप्रैल सन् 1946 [[दिल्ली]] के तीन दिवसीय सम्मेलन में की गई जिसमें केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के मुस्लिम लेगी सदस्यों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में [[ब्रिटेन]] से आने वाले [[कैबिनेट मिशन]] के प्रतिनिधिमंडल के सामने मुस्लिम लीग की मांग पेश करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था जिसका मसौदा मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी के दो सदस्यों [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]] और [[हसन इस्फ़हानी]] ने तैयार किया था। इस करादाद में स्पष्ट रूप से पाकिस्तान में शामिल किए जाने वाले क्षेत्रों की पहचान की गई थी। पूर्वोत्तर में [[बंगाल]] और [[असम]] और उत्तर पश्चिम में [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]], [[पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत|सीमा]], [[सिंध]] और [[बलूचिस्तान (पाकिस्तान)|बलूचिस्तान]]। आश्चर्य की बात है कि इस संकल्प में [[कश्मीर]] का कोई जिक्र नहीं था हालांकि उत्तर पश्चिम में मुस्लिम बहुल क्षेत्र था और [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] से जुड़ा हुआ था।
 
यह बात बेहद महत्वपूर्ण है कि [[दिल्ली]] कन्वेंशन इस संकल्प में दो राज्यों का उल्लेख बिल्कुल हटा दिया गया था जो संकल्प लाहौर में बहुत स्पष्ट रूप से था उसकी जगह पाकिस्तान की एकमात्र राज्य की मांग की गई थी।
 
== दस्तावेज के निर्माता ==
शायद बहुत कम लोगों को यह पता है कि संकल्प लाहौर का मूल मसौदा उस ज़माने के [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] के यूनीनसट मुख्यमंत्री [[सर सिकंदर हयात खान]] ने तैयार किया था।
[[यूनीनसट पार्टी]] उस ज़माने में मुस्लिम लीग में एकीकृत हो गई थी और सिर सिकंदर हयात खान [[पंजाब क्षेत्र|पंजाब]] [[मुस्लिम लीग]] के अध्यक्ष थे।
 
सिर सिकंदर हयात खान ने संकल्प के मूल मसौदे में उपमहाद्वीप में एक केंद्रीय सरकार के आधार पर लगभग कंडरेशन प्रस्तावित थी लेकिन जब मसौदा मुस्लिम लीग सब्जेक्ट कमेटी में विचार किया गया तो कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने खुद इस मसौदे में एकमात्र केंद्र सरकार का उल्लेख मौलिक काट दिया।
सिर सिकंदर हयात खान इस बात पर सख्त नाराज थे और उन्होंने 11 मार्च सन् 1941 को पंजाब विधानसभा में साफ-साफ कहा था कि उनका पाकिस्तान का नजरिया जिन्ना साहब के सिद्धांत मुख्य रूप से अलग है। उनका कहना था कि वह [[भारत]] में एक ओर हिन्दउ राज और दूसरी ओर मुस्लिम राज के आधार पर वितरण के सख्त खिलाफ हैं और वह ऐसी बकौल उनके विनाशकारी वितरण का डटकर मुकाबला करेंगे। मगर ऐसा नहीं हुआ।
 
सिर सिकंदर हयात खान दूसरे वर्ष सन 1942 में 50 साल की उम्र में निधन हो गया यूं पंजाब में [[मोहम्मद अली जिन्नाह|मुहम्मद अली जिन्ना]] तीव्र विरोध के उठते हुए हिसार से मुक्ति मिल गई।
 
सन् 1946 के दिल्ली अधिवेशन में पाकिस्तान की मांग संकल्प [[हुसैन शहीद सोहरावर्दी]] ने पेश की और [[यूपी]] के मुस्लिम लेगी नेता [[चौधरी रिएक ाल्समाँ]] ने इसकी तायद की थी। संकल्प लाहौर पेश करने वाले [[कृपा हक|मौलवी कृपा हक]] इस सम्मेलन में शरीक नहीं हुए क्योंकि उन्हें सुन 1941 में [[मुस्लिम लीग]] सेखारज कर दिया गया था।
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