"रामकृष्ण परमहंस" के अवतरणों में अंतर

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=== दक्षिणेश्वर आगमन ===
[[चित्र:Kolkatatemple.jpg|thumb|right| [[दक्षिणेश्वर काली मन्दिर|दक्षिणेश्वर काली मंदिर]] ]]
 
सतत प्रयासों के बाद भी रामकृष्ण का मन अध्ययन-अध्यापन में नहीं लग पाया। १८५५ में रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को [[दक्षिणेश्वर काली मन्दिर|दक्षिणेश्वर काली मंदिर ]]( जो [[रानी रासमणि]] द्वारा बनवाया गया था ) के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। रामकृष्ण और उनके भांजे ह्रदय रामकुमार की सहायता करते थे। रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व दिया गया था। १८५६ में रामकुमार के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया।<br />
 
रामकुमार की मृत्यु के बाद श्री रामकृष्ण ज़्यादा ध्यान मग्न रहने लगे। वे [[काली ]] माता के मूर्ति को अपनी माता और ब्रम्हांड की माता के रूप में देखने लगे। कहा जाता हैं की श्री रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रम्हांड की माता के रूप में हुआ था। रामकृष्ण इसकी वर्णना करते हुए कहते हैं " घर ,द्वार ,मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया , जैसे कहीं कुछ भी नहीं था! और मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था। जिस दिशा में भी मैंने दूर दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्जवल लहरें दिखाई दे रही थी, जो एक के बाद एक ,मेरी तरफ आ रही थी।
चन्द्रमणि देवी ने अपने बेटे की उन्माद की अवस्था से चिन्तत होकर गदाधर का विवाह [[शारदा देवी]] से कर दिया।
इसके बाद भैरवी ब्राह्मणी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। उन्होंने उन्हें तंत्र की शिक्षा दी। मधुरभाव में अवस्थान करते हुए ठाकुर ने श्रीकृष्ण का दर्शन किया।
उन्होंने तोतापुरी महाराज से [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैत]] [[वेदान्त दर्शन|वेदान्त]] की ज्ञान लाभ किया और जीवन्मुक्त की अवस्था को प्राप्त किया। सन्यास ग्रहण करने के वाद उनका नया नाम हुआ श्रीरामकृष्ण परमहंस। इसके बाद उन्होंने ईस्लाम और क्रिश्चियन धर्म की भी साधना की।
 
=== भक्तों का आगमन ===
समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया। कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। वह शीघ्र ही तत्कालीन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें [[केशवचन्द्र सेन|केशवचंद्र सेन]], विजयकृष्ण गोस्वामी, [[ईश्वर चन्द्र विद्यासागर|ईश्वरचंद्र विद्यासागर]] के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसके सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, [[महेन्द्रनाथ गुप्त|महेंद्रनाथ गुप्त]] (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग थे।<ref name="rolland">{{cite book
| url=http://books.google.co.in/books?id=RADaAAAAMAAJ
| title=द लाइफ ऑफ़ रामकृष्ण
सन् 1886 ई. में श्रावणी पूर्णिमा के अगले दिन प्रतिपदा को प्रातःकाल रामकृष्ण परमहंस ने देह त्याग दिया।<ref name=":0">{{Cite web|url=https://hindipath.com/ramkrishna-paramhans-biography-in-hindi/|title=रामकृष्ण परमहंस की जीवनी|last=शुक्ल|first=पण्डित विद्याभास्कर|date=|website=|archive-url=|archive-date=|dead-url=|access-date=}}</ref> 16 अगस्त का सवेरा होने के कुछ ही वक्त पहले आनन्दघन विग्रह श्रीरामकृष्ण इस नश्वर देह को त्याग कर महासमाधि द्वारा स्व-स्वरुप में लीन हो गये।
 
[[चित्र:Ramakrishna Marble Statue.jpg|thumb|right|[[ रामकृष्ण मिशन ]] का मुख्यालय [[बेलुड़ मठ| बेलूर मठ में]]में स्थित श्रीरामकृष्ण की मार्बल प्रतिमा]]
 
== उपदेश और वाणी ==
85,197

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