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[[File:Black Powder Close Up.jpg|thumb|270px|एक सिक्के के साथ बारूद का काला पाउडर]]
[[File:Yuan chinese gun.jpg|thumb|270px|[[चीन]] के [[युआन राजवंश]] काल में सन् १२८८ (अनुमानित) काल की एक हस्तचलित तोप]]
'''बारूद''' एक [[विस्फोटक]] रासायनिक [[मिश्रण]] है। इसे '''गन पाउडर''' (gunpowder) या अपने काले [[रंग]] के कारण '''काला पाउडर''' (black powder) भी कहते हैं। बारूद [[गंधक]], [[कोयला]] एवं [[पोटैशियम नाइट्रेट|शोरा]] (पोटैसिअम नाइट्रेट या साल्टपीटर) का मिश्रण होता है और यह मानव इतिहास का सर्वप्रथम निर्मित विस्फोटक था। बारूद का प्रयोग [[पटाख़ा|पटाखों]] एवं [[नोदक (पदार्थ)|नोदक]] (प्रोपेलन्ट) के रूप में [[अग्निशस्त्रोंअग्निशस्त्र]]ों (firearms) में किया जाता है। बारूद चिंगारी पाकर तेजी से जलता है जिससे भारी मात्रा में गैस एवं गरम ठोस पैदा होता है।<ref>Jai Prakash Agrawal (2010). High Energy Materials: Propellants, Explosives and Pyrotechnics. Wiley-VCH. p. 69. ISBN 978-3-527-32610-5.</ref>
 
आधुनिक काल में बारूद एक "कमजोर विस्फोटक" (low explosive) के रूप में जाना जाता है क्योंकि विस्फोट होने पर यह अपश्रव्य तरंगें (subsonic) पैदा करता है न कि पराश्रव्य तरंगें (supersonic)। इसलिये बारूद के जलने से उत्पन्न गैसे इतना ही दाब पैदा कर पाती हैं जो गोली को आगे फेंकने में सहायक होती है किन्तु बन्दूक की नली को क्षति नहीं पहुंचा पाती। किसी चट्टान के विध्वंस या किसी किले को तोडने के लिये बारूद का प्रयोग उपयुक्त नहीं होता बल्कि इनके लिये "टी एन टी" आदि अच्छे रहते हैं।
 
== इतिहास ==
इसका आविष्कार कब हुआ, इसका ठीक ठीक पता नहीं लगता, पर ऐसा मालूम होता है कि ईसा के पूर्व काल में चीनियों को बारूद की जानकारी थी। [[रोजर बेकन|रौजर बेकन]] (1214-1294) के लेखों में बारूद का उल्लेख मिलता है, पर प्रतीत होता है कि बारूद के प्रणोदक गुणों का उनको पता नहीं था1 बेकन के समय तक बारूद का एक आवश्यक अवयव शोरा शुद्ध रूप में प्राप्य नहीं था। 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के शस्त्रों में प्रक्षेप्य फेंकने में इसके प्रयोग का पता लगता है। बेकन ने जिस बारूद का उल्लेख किया है उसमें शोरा 41.2 और कोयला तथा गंधक प्रत्येक 29.4 प्रतिशत मात्रा में रहते थे। ऐसे बारूद की प्रबलता निकृष्ट कोटि की होती थी। बाद में बारूद के अवयवों में [[पोटैशियम नाइट्रेट|शोरा]], [[कोयला]] और [[गंधक]] का अनुपात क्रमश: 74.64, 13.51 और 11.85 प्रतिशत कर दिया गया।
 
बारूद में इन तीनों अवयवों का चूर्ण रहता है। यह चूर्ण प्रारंभ में हाथ में पीसकर बनाया जाता था, पर बाद में दलनेवाली मशीन का प्रयोग शुरू हुआ। ये मशीनें घोड़ों या पानी से चलती थीं। इनके स्थान पर बाद में '''स्टैंपिग मशीन''' का उपयोग शुरू हुआ, पर यह निरापद नहीं था। पहले जो चूर्ण बनते थे वे तीनों अवयवों के चूर्णों को मिलाकर बनते थे। ऐसे चूरे को तोपों में भली भाँति न तो बहुत कसा जा सकता था ओर न ढीला ही छोड़ा जा सकता था। इस कठिनता को दूर करने के लिए 15वीं शताब्दी में चूरे को दानेदार रूप में प्राप्त करने का प्रयत्न हुआ। चूरे में ऐलकोहल, या मूत्र, मिलाकर उसे दानेदार बनाया जाता था। मद्यसेवी का मूत्र इसके लिए सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था। इससे बने दाने अधिक शक्तिशाली होते थे। दाने विभिन्न आकार के होते थे और चालकर उन्हें अलग अलग किया जाता था। बड़े दाने तोपों में और छोटे दाने बंदूकों में इस्तेमाल होते थे।
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