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सामान्यतः ऐसा माना जाता है। कि बिहार पर प्रथम आक्रमण प्रथम तुर्क बख्तियार खिलजी ने किया था, परन्तु उसके आक्रमण से पूर्व भी बिहार में तुर्कों का आवागमन था। तुर्कों का प्रारम्भिक प्रभाव क्षेत्र पटना जिले का मनेर था। जहाँ हदारस मोमिन यारिफ बसने आये थे।
 
११९७-९८ ई. के पश्‍चात्‌ [[इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी|बख्तियार खिलजी]] ने [[मगध महाजनपद|मगध]] क्षेत्र में प्रथम आक्रमण किया और लूटा। इसके पश्‍चात उसने आधुनिक [[बिहारशरीफ|बिहार शरीफ]] (ओदन्तपुरी) पर आक्रमण किया। ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय के लूटने के बाद नालन्दा विश्‍वविद्यालय को जलाकर तहस-नहस कर दिया। इसी समय उसने आधुनिक बख्तियारपुर शहर को बसाया। इसी दौरान बिहार शरीफ तुर्कों का केन्द्र के रूप में उभरा।
 
== बौद्ध विहार ==
 
== खिलजी वंश ==
जब १२९० ई. [[जलालुद्दीन ख़िलजी|जलालुद्दीन खिलजी]] [[दिल्ली]] का सुल्तान बना और खिलजी वंश की स्थापना की तब बंगाल में बुगरा खाँ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन कैकाउस शासक बना हुआ था। उसके उत्तर और दक्षिण बिहार के भागों पर बंगाल का नियन्त्रण था।
 
१२९६ ई. में [[अलाउद्दीन खिलजी]] दिल्ली का सुल्तान बना और १२९७ ई. में शेख मुहम्मद इस्माइल को बिहार के दरभंगा में भेजा वह राजा चक्र सिंह द्वारा पराजित हो गया परन्तु इस्माइल के दूसरे आक्रमण में राजा को पराजित कर बन्दी बना लिया तथा दोनों ने परस्पर समझौता कर लिया। उसने अलाउद्दीन के साथ मधुर सम्बन्ध होने के कारण रणथम्भौर (१२९९-१३०० ई.) में अभियान में भाग लिया।
इस प्रकार बिहार पर [[ख़िलजी वंश|खिलजी वंश]] का प्रभाव कम और सीमित क्षेत्रों पर रहा। (जो अवध का गवर्नर था) इवाज को गिरफ्तार कर हत्या कर दी। अवध, बिहार और लखनौती को मिलाकर एक कर दिया। १२२७-२९ ई. तक उसने शासन किया। १२२९ ई. में उसकी मृत्यु के बाद दौलतशाह खिलजी ने पुनः विद्रोह कर दिया, परन्तु इल्तुतमिश ने पुनः लखनौती जाकर वल्ख खिलजी को पराजित कर दिया तथा बिहार और बंगाल को पुनः अलग-अलग कर दिया। उसने अलालुद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर एवं सैफूद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया बाद में तुगान खाँ बिहार का राज्यपाल बना। उसके उत्तराधिकारियों में क्रमशः रुकनुद्दीन फिरोजशाह, [[रज़िया सुल्तान|रजिया]] मुइज्जुद्दीन, ब्रह्यराय शाह एवं अलाउद्दीन मसूद शाह आदि शासकों ने लखनौती एवं बिहार के तथा दिल्ली के प्रति नाममात्र के सम्बन्ध बनाये रखे।
 
== [[गयासुद्दीन बलबन|बलबन]] ==
जब दिल्ली का सुल्तान बलबन बना तब बिहार को पुनः बंगाल से अलग कर (गया क्षेत्र) दिल्ली के अधीन कर दिया, जिसकी स्पष्टता हमें वनराज राजा की गया प्रशस्ति से मिलती है। लखनौती शासक जो स्वतन्त्र हो गये थे उन्होने बलबन की अधीनता भी स्वीकार की।
 
२७९-८० ई. तक तीन विद्रोह हुए। तीनों विद्रोह को दबाने के लिए तीन अभियान भेजे जो असफल रहे। अन्त में स्वयं बलबन विद्रोही के खिलाफ अभियान चलकर विद्रोही को मार डाला। उसने तुगरिक खाँ को मारकर अपने छोटे पुत्र बुगरा खाँ को राजकीय सम्मान दिया।
 
== [[तुग़लक़ राजवंश|तुगलक वंश]] ==
तुगलक वंश की स्थापना [[गयासुद्दीन तुग़लक़|गयासुद्दीन तुगलक]] (गाजी मलिक) ने १३२० ई. में दिल्ली सुल्तान खुसराव खान का अन्त करके की।
 
पटना में दरियापुर, नूहानीपुर जैसे नाम भी नूहानी के प्रभाव की झलक देते हैं। परन्तु १५२३ ई. में दरिया खाँ नूहानी की मृत्यु हो गयी। दूसरी ओर पानीपत के प्रथम युद्ध १५२६ ई. में इब्राहिम लोदी उठाकर नूहानी का पुत्र सुल्तान मोहम्मद शाह नूहानी ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता की घोषणा कर दी। इसके दरबार में इब्राहिम जैसे असन्तुष्ट अफगान सरदारों का जमावाड़ा था। उसने धीरे-धीरे अपनी सेना की संख्या एक लाख कर ली और बिहार से सम्बल तक मुहम्मद लोहानी का कब्जा हो गया। इस परिस्थति से चिन्तित होकर इब्राहिम लोदी ने मुस्तफा फरश्‍ली को सुल्तान मुहम्मद के खिलाफ सेना भेजी, परन्तु इस समय मुस्तफा की मृत्यु हो गई। सेना की कमान शेख बाइजिद और फतह खान के हाथों में थी। दोनों की सेनाओं के बीच कनकपुरा में युद्ध हुआ। इब्राहिम लोदी की मृत्यु के पश्‍चात सुल्तान मुहम्मद ने सिकन्दर पुत्र मेहमूद लोदी को दिल्ली पर अधिकार करने के प्रयास में सहायता प्रदान की थी, परन्तु १५२९ ई. में घाघरा युद्ध में बाबर ने इन अफगानों को बुरी तरह पराजित किया। बाबर ने बिहार में मोहम्मद शाह नूहानी के पुत्र जलाल खान को बिहार का प्रशासक नियुक्‍त किया (१५२८ ई. में) शेर खाँ (फरीद खाँ) को उसका संरक्षक नियुक्‍त किया गया। इस प्रकार बिहार में नूहानिया का प्रभाव १४९५ ई. से प्रारम्भ होकर १५३० ई. में समाप्त हो गया।
 
== [[अफ़ग़ानिस्तान|अफगान]] ==
बिहार में अफगानों का इतिहास भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस समय सूर वंश का अभि उत्‍थान हुआ जो बिहार सहित भारत में राजनीतिक स्थिति में क्रान्तकारी परिवर्तन हुआ। यह काल सूर वंश का काल १५४० से १५४५ ई. तक माना जाता है। यहँ पठानो का लम्बी अवधि तक शासन रहा।
 
बिहार का शासक-मुगलों ने विद्रोही अफगानों को पराजित कर अफगान सैनिकों के योग्य अफगान को नष्ट कर दिया। १५२८ ई. के असफल अफगान विद्रोह के बाद शेर खाँ जलाल खाँ का मन्त्री और संरक्षक नियुक्‍त हो गया। शेर खाँ ने संरक्षक की हैसियत से शासन करना प्रारम्भ कर दिया। उसने स्थानीय सरदारों पर कड़ा नियन्त्रण रखा, उसके हिसाब पर जांच कराई और प्रजा पर अत्याचार करने वालों को दण्डित किया जिससे नूहानी सरदार शत्रु हो गये। नूहानी सरदारों ने बंगाल शासक नुसरतशाह से आवेदन किया कि बिहार को शेर खाँ के प्रभाव से मुक्‍त करने का प्रयास करे।
 
== [[शेर शाह सूरी|शेरशाह सूरी]] ==
[[शेर शाह सूरी|शेरशाह सूरी]] का वास्तविक नाम फरीद खाँ था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर १४७२ ई. में) में अपने पिता हसन की अफगान पत्‍नी से उत्पन्न पुत्र था। उसका पिता हसन बिहार के सासाराम का जमींदार था। दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी ने उसे एक शेर मारने के उपलक्ष्य में शेर खाँ की उपाधि से सुशोभित किया और अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्‍त किया। बहार खाँ लोहानी की मृत्यु के बाद शेर खाँ ने उसकी बेगम दूदू बेगम से विवाह कर लिया और वह दक्षिण बिहार का शासक बन गया। इस अवधि में उसने योग्य और विश्‍वासपात्र अफगानों की भर्ती की। १५२९ ई. में बंगाल शासक नुसरतशाह को पराजित करने के बाद शेर खाँ ने हजरत आली की उपाधि ग्रहण की। १५३० ई. में उसने चुनार के किलेदार ताज खाँ की विधवा लाडमलिका से विवाह करके चुनार के किले पर अधिकार कर लिया। १५३४ ई. में शेर खाँ ने सुरजमठ के युद्ध में बंगाल शासक महमूद शाह को पराजित कर १३ लाख दीनार देने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार शेरशाह ने अपने प्रारम्भिक अभियान में दिल्ली, आगरा, बंगाल, बिहार तथा पंजाब पर अधिकार कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। १५३९ ई. में चौसा के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेर खाँ ने शेरशाह की अवधारणा की। १५४० ई. में शेरशाह ने [[हुमायूँ]] को पुनः हराकर राजसिंहासन प्राप्त किया। उत्तर बिहार में पहले से ही हाकिम मखदूग आलम शासन कर रहा था। नुसरतशाह ने दक्षिण बिहार पर प्रभाव स्थापित करने के लालच में कुत्य खाँ के साथ एक सेना भेजी, परन्तु शेर खाँ ने उसे पराजित कर दिया। शेर खाँ धीरे-धीरे सर्वाधिक शक्‍तिशाली अफगान नेता बन गया।
 
नूहानी सरदारों ने उनकी हत्या के लिए असफल कोशिश की और जब शेर खाँ ने उनको नुसरतशाह के विरुद्ध युद्ध कर दिया और पराजित कर दिया। इस विजय ने बंगाल के सुल्तान की महत्वाकांक्षी योजना को विफल कर दिया। बाबर के समय शेर खाँ हमेशा अधीनता का प्रदर्शन करता रहा था परन्तु हुमायूँ के समय में अपना रुख बदलकर चुनार गढ़ को लेकर प्रथम बार चुनार लेने की चेष्टा की तब उसे महमूद लोदी के प्रत्याक्रमण के कारण वहाँ से जाना पड़ा। उसने हिन्दूबेग को सेना भेजकर शेर खाँ ने दुर्ग देने से साफ इनकार कर दिया। फलतः एक युद्ध हुआ।
१५४५ ई. हुमायूँ ने ईरान शाह की सहायता से काबुल तथा कन्धार पर अधिकार कर लिया। १५५५ ई. में लाहौर को जीता। १५ मई १५५५ में मच्छीवाड़ा युद्ध में सम्पूर्ण पंजाब पर अधिकार कर लिया। २२ जून १५५५ के सरहिन्द युद्ध में अफगानों (सिकन्दर सूर) पर निर्णायक विजय प्राप्त कर हुमायूँ ने भारत के राजसिंहासन को प्राप्त किया तथा २३ जुलाई १५५५ को भारत का सम्राट बना लेकिन १५५६ ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इससे पहले उसने १५ वर्षीय सूर वंश को समाप्त कर दिया।
 
== [[मुग़ल साम्राज्य|मुगल]] शासन ==
बिहार के महान अफगान सम्राट शेरशाह का स्थापित सूर वंश के पतन के बाद भी बिहार अफगानो के अधीन बना रहा। ताज खाँ करारानी, सुलेमान खाँ एवं दाऊद खाँ करारानी आदि के अधीन में रहा।
 
१५८७ ई. में कुँवर मानसिंह को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। १५८९ ई. में राजा [[भगवान दास]] की मत्यु के पश्‍चात्‌ [[राजा मान सिंह|मानसिंह]] को राजा की पद्‍वी दी गई। उन्होंने गिद्दौर के राजा पूरनमल की पुत्री से शादी की। खड्‍गपुर के राजा संग्राम सिंह एवं चेरो राजा अनन्त सिंह को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।
 
[[राजा मान सिंह|राजा मानसिंह]] के पुत्र जगत सिंह ने बंगाल के विद्रोही सुल्तान कुली कायमक एवं कचेना (जो बिहार के तांजपुर एवं दरभंगा में उत्पात मचा रहे थे) को शान्त किया। बिहार में मुगलों की सत्ता स्थापित होने के दौर में अफगानों ने अनेक बार विद्रोह किये।
 
१९४ ई. में सईद खान तीसरी बार बिहार का सूबेदार बना और १५९८ ई. तक बना रहा। १५९९ ई. में जब उज्जैन शासक दलपत शाही ने विद्रोह किया तो इलाहाबाद के गवर्नर राजकुमार दानियाम ने उसकी पुत्री से विवाह कर लिया।
शाइस्ता खाँ ने १६४२ ई. में चेरो शासकों को पराजित कर दिया। उसके बाद उसने मिर्जा सपुर या इतिहाद खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त कर दिया। १६४३ ई. से १६४६ ई. तक चेरी शासक के खिलाफ पुनः अभियान चलाया गया। १६४६ ई. में बिहार का सूबेदार आजम खान को नियुक्‍ किया गया। उसके बाद सईद खाँ बहादुर जंग को सूबेदार बनाया। इसके प्रकार १६५६ ई. में जुल्फिकार खाँ तथा १६५७ ई. में अल्लाहवर्दी ने बिहार का सूबेदारी का भा सम्भाला। अल्लाहवर्दी खान शाहजादा शुजा का साथ देने लगा, लेकिन शाही सेना ने शहजादा सुलेमान शिकोह एवं मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में शहजादा शुजा को पराजित कर दिया। १६ जनवरी १६५९ को खानवा के युद्ध में औरंगजेब ने शुजा को पराजित किया और शुजा बहादुर पटना एवं मुंगेर होते हुए राजमहल पहुँच गया।
 
[[औरंगजेबऔरंगज़ेब|मुईउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब]] [[शाह जहाँ|शाहजहाँ]] तथा मुुुमताज महल का छठवाँ पुत्र था जब औरंगजेब दिल्ली (५ जून १६५९) को सम्राट बना तो बिहार का गवर्नर दाऊद खाँ कुरेशी को नियुक्‍त किया गया। वह १६५९ ई. से १६६४ ई. तक बिहार का सूबेदार रहा। दाऊद खाँ के बाद १६६५ ई. में बिहार में लश्कर खाँ को गवर्नर बनाया गया इसी के शासन काल में अंग्रेज यात्री बर्नीयर बिहार आया था। उसने अपने यात्रा वृतान्त में सामान्य प्रशासन एवं वित्तीय व्यवस्था का उल्लेख किया है। उस समय पटना शोरा व्यापार का केन्द्र था। वह पटना में आठ वर्षों तक रहा। १६६८ ई. में लश्कर खाँ का स्थानान्तरण कर इब्राहिम खाँ बिहार का सूबेदार बना। इसके शासनकाल में बिहार में जॉन मार्शल आया था। उसने भयंकर अकाल का वर्णन किया है।
 
एक अन्य डच यात्री डी ग्रैफी भी इब्राहिम के शासनकाल में आया था। जॉन मार्शल ने बिहार के विभिन्‍न शहर भागलपुर, मुंगेर, फतुहा एवं हाजीपुर की चर्चा की है।
१७१२ ई. में [[बहादुर शाह प्रथम|बहादुरशाह]] की मृत्यु हो गयी तो अजीम उश शान ने भी दिल्ली की गद्दी प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन वह असफल होकर मारा गया। जब दिल्ली की गद्दी पर [[जहांदार शाह|जहाँदरशाह]] बादशाह बना तब अजीम उश शान का पुत्र [[फ़र्रुख़ सियर|फर्रुखशियर]] पटना में था। उसने अपना राज्याभिषेक किया और आगरा पर अधिकार के लिए चल पड़ा। आगरा के समीप फर्रुखशियर ने जहाँदरशाह को पराजित कर दिल्ली का बादशाह बन गया।
 
१७०२ ई. में मुगल सम्राट [[औरंगज़ेब|औरंगजेब]] के पौत्र राजकुमार को बिहार का सूबेदार नियुक्‍त किया गया। प्रशासनिक सुधार उन्होंने विशेष रूप से पटना में किया फलतः पटना का नाम बदलकर ‘अजीमाबाद’ रख दिया।
 
* अजीम का पुत्र फर्रूखशियर पहला मुगल सम्राट था जिसका राज्याभिषेक बिहार के (पटना में) हुआ था।
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