"पुष्टिमार्ग" के अवतरणों में अंतर

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==परिचय==
वल्लभाचार्य द्वारा प्रतिपादित [[शुद्धाद्वैतवादशुद्धाद्वैत]]वाद दर्शन के भक्तिमार्ग को '''पुष्टिमार्ग''' कहते हैं। शुद्धाद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म माया से अलिप्त है, इसलिये शुद्ध है। माया से अलिप्त होने के कारण ही यह अद्वैत है। यह ब्रह्म सगुण भी है और निर्गुण भी। सामान्य बुद्धि को परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली बातों का ब्रह्म में सहज अन्तर्भाव हो जाता है। वह अणु से भी छोटा और सुमेरु से भी बड़ा है। वह अनेक होकर भी एक है। यह ब्रह्म स्वाधीन होकर भी भक्त के अधीन हो जाता है। विशिष्टाद्वैत की तरह शुद्धाद्वैतवादी ने भी ब्रह्म के साथ साथ जगत को भी सत्य बताया है। कारणरूप ब्रह्म के सत्य होने पर कार्यरूप जगत मिथ्या नहीं हो सकता। ब्रह्म की प्रतिकृति होने के कारण जगत की त्रिकालाबाध सत्ता है। जीव और जगत का नाश नहीं होता, सिर्फ़ आविर्भाव और तिरोभाव होता है।
 
पुष्टिमार्ग शुद्धाद्वैत के दर्शन को ही भक्ति में ढालता है। पुष्टि का शाब्दिक अर्थ है ‘पोषण’। श्रीमद्भागवत में ईश्वर के अनुग्रह को पोषण कहा गया है- “पोषणं तदनुग्रहः”। वल्लभाचार्य के अनुसार, “कृष्णानुग्रहरूपा हि पुष्टिः कालादि बाधक”। अर्थात् कालादि के प्रभाव से मुक्त करने वाला कृष्ण का अनुग्रह ही पुष्टि है। पुष्टिमार्गी भक्ति का मूलाधार भगवतकृपा और उनके प्रति पूर्ण समर्पण है। भक्त के भगवान की ओर ध्यान ले जाने के पहले ही भगवान भक्त पर अपनी कृपा वर्षा कर देता है। कृष्ण की मुरली द्वारा गोपियों पर कृपा वर्षा होती है। कृष्ण की यह मुरली अनुग्रह संचारिका है। पुष्टिमार्ग में भक्त स्वय को पूर्णतया भगवान के आसरे छोड़ देता है।
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