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|image = [[चित्र:Mao proclaiming the establishment of the PRC in 1949.jpg|300px]]
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|caption = [[पीपल्सचीनी रिपब्लिकजनवादी ओफ़ चायनागणराज्य|चीनी लोक गणराज्य]] की स्थापना की घोषणा करते हुए [[माओ त्सेसे-तुंग|माओ]]
|partof = [[चीनी गृहयुद्ध|चीन का गृहयुद्ध]] (since 1927) और [[शीतयुद्ध]] (1947–1950)
|date = 1945–1950
|place = चीन
* {{ROC}} on Taiwan (after 1949 retreat)
|commander1 =
* [[File:Flag of the Chinese Communist Party (Pre-1996).svg|25px]] [[File:Flag of the People's Republic of China.svg|25px]]<br /><small>अध्यक्ष</small> [[माओ से-तुंग|माओ ज़ेदोंग]]
* [[File:Flag of the Chinese Communist Party (Pre-1996).svg|25px]] [[File:Flag of the People's Republic of China.svg|25px]]<br /><small>[[People's Liberation Army|Commander-in-Chief]]</small> [[Zhu De]]
|commander2 =
|casualties2 = 1.5 million in three campaigns<ref name="Lynch">{{cite book |first = Michael |last = Lynch |title = The Chinese Civil War 1945–49 |url = https://books.google.com/books?id=rkJYue5dCJgC&pg=PA91 |year=2010 |publisher = Osprey Publishing |ISBN = 978-1-84176-671-3 |page = 91 }}</ref>
}}
[[चीनी साम्यवादी दल]] की स्थापना १९२१ में हुई थी। सन १९४९ में चीनी साम्यवादी दल का [[चीन]] की सत्ता पर अधिकार करने की घटना '''चीनी साम्यवादी क्रांति''' कहलाती है। चीन में १९४६ से १९४९ तक [[चीन काचीनी गृहयुद्ध|गृहयुद्ध]] की स्थिति थी। इस गृहयुद्ध का द्वितीय चरण साम्यवादी क्रान्ति के रूप में सामने आया। चीन ने आधिकारिक तौर पर इस अवधि को 'मुक्ति संग्राम' (War of Liberation , सरल चीनी : 解放战争; परम्परागत चीनी: 國共內戰; [[फीनयिन]]: Jiěfàng Zhànzhēng) कहा जाता है।
 
==परिचय==
19वीं सदी के मध्य तक [[चीन]] अपने गौरवपूर्ण इतिहास से लगभग अनभिज्ञ, ध्वस्त, पस्त एक एशियाई देश बचा रह गया था। भले ही वह औपचारिक रूप से किसी विदेशी ताकत का उपनिवेश नहीं था परन्तु उसकी हालत किसी दूसरे गुलाम देश से बेहतर नही थी। इतिहासकार चीन में यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष को “खरबूजे का बटवारा” कहते थे, ऐसा फल जिसे अपनी इच्छानुसार शक्तिसंपन्न व्यक्ति फांक-फांक काटकर आपस में बांटते, खाते पचाते रहते हैं। चीन के प्रमुख शहरों में ऐसे अनेक इलाके थे जिन पर यूरोपीय ताकतों का कब्जा था और जहाँ चीनी शासक का राज नहीं चलता था। तटवर्ती बंदरगाह भी यूरोपियों के सैनिक नियंत्रण में थे। ब्रिटेन की नौसैनिक शक्ति का मुकाबला करने की क्षमता चीन में नहीं थी इसलिए चीन के व्यापार पर उन्हीं का नियंत्रण था। [[ब्रिटेन]] ने अपने स्वार्थों की रक्षा के लिए चीन में [[अफ़ीम|अफीम]] के सेवन को बढ़ावा दिया था और इस नशे में गालिफ चीनियों का भरपूर उत्पीड़न किया था। अतः यह स्वाभाविक था कि राष्ट्रपे्रमी चीनियाें के मन में इन उत्पीड़क परिस्थितियों के प्रति आक्रोश पनप रहा था।
 
चीन की पहली क्रांति का स्वरूप मुख्यतः सांस्कृतिक था और इसका सूत्रपात डॉ॰ [[सुन यात-सेन|सनयात सेन]] ने किया था। उन्हीं के प्रयत्नों से राष्ट्रवादी चीनी पार्टी की स्थापना हुई जिसे ''''कुओमितंग'''' के नाम से जाना जाता है।
 
1911 में जिस [[मांचू राजवंश]] का अंत कर गणतंत्र की स्थापना की गई उसका अस्थायी राष्ट्रपति [[युवान शिह काई]] था। किन्तु उसने प्रतिक्रियावादी एवं दमनात्मक कदम उठाते हुए कुओमितांग दल पर प्रतिबंध लगा दिया और सनयात सेन को [[जापान]] भागना पड़ा। 1916 में [[युवान शिह]] काई की भी मृत्यु हो गई और उसकी मृत्यु के पश्चात प्रांतीय गवर्नर व सेनापतियों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया, पूरा चीन अनेक युद्ध सरदारों (टूचेन) के नियंत्रण में बंट गया। 1917 ई. में कुओमितांग दल ने अराजकता के माहौल में गणतांत्रिक सरकार की स्थापना का प्रयास किया। इसी समय [[रूस]] में हुई [[रूसी क्रांति|साम्यवादी क्रांति]] से प्रभावित होकर 1923 में सनयात सेन ने रूसी साम्यवादी सरकार से सहयोगात्मक संधि कर गणतांत्रिक सरकार बनाने का प्रयास किया किन्तु 1925 में उनकी मृत्यु के कारण यह पूरा नही हो पाया। आगे उनके उत्तराधिकारी [[च्यांग काई शेक]] को चीन के साम्यवादी दल के साथ गृह युद्ध में फंसना पड़ा। अंततः [[माओ से-तुंग|माओत्से तुंग]] के नेतृत्व में साम्यवादी दल ने 1 अक्टूबर, 1949 को चीनी लोक गणराज्य (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) की स्थापना की।
 
==चीन में साम्यवादी क्रांति की परिस्थितियाँ एवं विकास==
1917 में हुई रूस की [[रूसी क्रांति|बोल्शेविक क्रांति]] के प्रभाव से चीनी भी अछूता न रहा। 1919 में पेकिंग के अध्यापकों व छात्रों ने [[साम्यवाद]], [[मार्क्सवाद]] के अध्ययन के लिए एक संस्था की स्थापना की। इन्हीं व्यक्तियों में माओत्से तुंग भी शामिल था जो आगे चलकर चीनी साम्यवादी दल का नेता बना। 1919 में इन्हीं लोगों के प्रयास से चीनी साम्यवादी दल (कुंगचांगतांग) की स्थापना हुई। शीघ्र ही [[कैंटन]], [[शंघाई]] और [[हूनान]] प्रांतों में भी कम्यूनिस्ट पार्टी की शाखाएँ कायम हो गई और 1921 में शंघाई में इन सब शाखाओं का प्रथम सम्मेलन हुआ जिसमें विदेशी आधिपत्य से चीन को मुक्ति दिलाना लक्ष्य घोषित किया गया।
 
इस साम्यवादी विचारधारा ने चीन के उदार राष्ट्रवादियों को भी प्रभावित किया जिनमें [[सुन यात-सेन|सनयात सेन]] भी शामिल थे। वस्तुतः डॉ॰ सनयात सेन चीन को संगठित करने के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करना चाहता था लेकिन पश्चिम के साम्राज्यवादी राज्यों ने उनकी कोई मदद नहीं की अंततः वह [[सोवियत संघ]] की ओर आकृष्ट हुआ। रूस ने साम्यवादी प्रसार के लोभ में चीन के प्रति सहानुभूति जताई और उसे हर तरह की सहायता देने का आश्वासन दिया। इसी संदर्भ में 1921 ई. में कॉमिन्टर्न के प्रतिनिधि मेरिंग ने सनयात सेन से मुलाकात कर आपसी सहयोग की चर्चा की।
 
डॉ॰ सनयात सेन के सूझबूझ एवं संगठनात्मक क्षमता की वजह से कुओमितांग तथा चीनी साम्यवादी दल में सहयोगपूर्ण संबंध बने। रूसी साम्यवादी विचारकों ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को कुओमितांग दल के साथ मिलजुल कर कार्य करने को कहा। दोनों मिलकर वहाँ [[साम्राज्यवाद]] के विरूद्ध कार्य करने लगे। सनयात सेन के जीवित रहने तक यह सहयोग बना रहा और दोनों दल मिलजुल कर कार्य करते रहे। किन्तु '''12 मार्च, 1925 को सनयात सेन की मृत्यु हो गई'''। तत्पश्चात् चीनी साम्यवादी दल तथा कुओमितांग के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे। वस्तुतः चीनी साम्यवादी अपने संगठन को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने किसानों और मजदूरों को अपने पक्ष में संगठित किया और राष्ट्रीय स्तर पर एक मजदूर संघ की स्थापना की। फलतः मजदूरों की हड़तालों तथा मांगों की बारंबारता में वृद्धि हुई। इसी तरह किसानों के संघ बने जिन्होंने लगान में कमी तथा जमींदारी उन्मूलन की मांग की। सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात 1925 में माओत्से तुंग ने [[हूनान प्रांत]] में एक उग्र किसान आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने न सिर्फ जमींदारों को उखाड़ फेंका बल्कि सम्पत्ति पर कब्जा कर समाज के ढांचे को बदला।
च्यांग काई शेक जापानियों को रोकने के बजाय कम्युनिस्टों का सफाया करना अधिक महत्वपूर्ण मानता था और इसलिए 1936 में साम्यवादियों से संघर्ष करने के लिए लियांग के नेतृत्व में एक सेना शेन्सी प्रांत भेजी किन्तु साम्यवादियों ने अपने चीनी भाईयों से लड़ना उचित नहीं समझा और लियांग के अधीन भेजी गई सेना को राष्ट्रीय चेतना से युक्त कर जापनियों से संघर्ष करने को कहा। जब च्यांग काई शेक ने साम्यवादियों के दमन की ही बात की तब लियांग ने उसे बंदी बना लिया किन्तु साम्यवादियों के हस्तक्षेप से अंततः वह मुक्त हुआ। अतः चीनी लोकमत की इच्छा को देखते हुए च्यांग ने साम्वादियों के साथ बातचीत आरंभ की और 1937 में एक समझौता किया ताकि सम्मिलित प्रयास करते हुए जापान के प्रभुत्व को नष्ट किया जा सके। इस समझौते के अनुसार उत्तर-पश्चिमी चीन के शेन्सी और कांगसू प्रांत पर साम्यवादियों के शासन को स्वीकार किया गया और साम्यवादी सेना को चीन की राष्ट्रीय सेना का अंग मान लिया गया जिसे जापान के विरूद्ध महासेनापति च्यांग काई शेक के आदेशों का पालन करना था। इस प्रकार चीन में दो पृथक-पृथक सरकार इस समय विद्यमान थी। दोनों की अपनी-अपनी पृथक् सेनाएँ थी और दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में अपने आदर्शों के अनुसार शासन और सामाजिक व्यवस्था के विकास में तत्पर थी। यह समझौता साम्यवादियों की शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
 
1937 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया और उसे पराजित किया तथा चीन पर कब्जा कर लिया। [[नानकिंग]] पर जापान का अधिकार हो जाने से च्यांग काई शेक को पीछे हटना पड़ा और पश्चिम में चुंगकिंग को अपनी राजधानी बनाना पड़ा। दूसरी तरफ शेन्सी प्रांत में डटे हुए कम्युनिस्टों ने उत्तर में जापान के विरूद्ध कारगर छापामार लड़ाई का नेतृत्व किया और अपने को लोगों के सामने देशभक्त राष्ट्रीवादी के रूप प्रस्तुत किया। इस कारण जापानी अत्याचार से पीड़ित किसानों और मध्यवर्ग का भारी समर्थन मिला। इस बीच [[द्वितीय विश्वयुद्ध]] आरंभ हो गया और [[प्रथम चीन-जापान युद्ध|चीन-जापान युद्ध]] द्वितीय विश्वयुद्ध का अंग बन गया। उस समय भी च्यांग काई शेक साम्यवादियों को बढ़ती शक्ति से चिंतित था, जापानी आक्रमण से नहीं। वह जापान के विरूद्ध संघर्ष की अपेक्षा चीन की आंतरिक राजनीति को अधिक महत्व देता था। अतः साम्यवादियों तथा कुओमितांग के बीच संघर्ष की स्थिति पुनः उत्पन्न हो गई।
 
द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू हो जाने से चीन-जापान युद्ध अमेरिकी-ब्रिटिश नीतियों से प्रभावित होने लगा। अमेरिका और ब्रिटेन ने च्यांग काई शेक के सरकार की मदद हेतु वायुयान द्वारा लाखों टन युद्ध सामग्री पहुँचाई ताकि जापान या रूस का प्रभाव चीन में न बढ़े। वस्तुतः चीन के आंतरिक मामलों में अमेरिका और ब्रिटेन के हस्तक्षेप का एक बड़ा कारण उनका साम्यवादी विचारधारा का विरोधी होना था। ब्रिटेन व अमेरिका चीन में गृहयुद्ध को रोकना चाहते थे क्योंकि गृहयुद्ध की स्थिति में शक्तिशाली हो चुके साम्यवादियों की विजय निश्चित प्रायः नजर आ रही थी।
* भारत सहित चीन के आसपास के देशों में माओवादी चिंतन को प्रोत्साहन मिला। समस्याओं के निराकरण हेतु बहुत सारे हिंसक माओवादी स्वरूप सामने आए।
 
* माओवादी चीन ने दुनियाभर में प्रवासी चीनियों को इस बात के लिए ललकारा कि वे अपनी जन्मभूमि, पैतृक भूमि के प्रति पे्रम और निष्ठा को प्रमाणित कर अपने स्वाभिमान को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ना आरंभ करे। [[इंडोनेशिया|इण्डोनेशिया]], [[मलेशिया]], [[सिंगापुर]] जैसे देशों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा चीनी मूल के लोगों का है। वर्षों तक इण्डोनेशिया की साम्यवादी पार्टी पेकिंग के निर्देशानुसार ही काम करती रही। [[वियतनाम]] का राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम माओवादी नमूने का (छापामार वाला) ही रहा।
 
* चीनी साम्यवादी क्रांति की सफलता से उत्साहित होकर साम्यवादियों ने [[तिब्बत]] में एक सफल सैनिक अभियान का संचालन किया। फलतः [[भारत]] के साथ उसके संबंधों में तनाव पैदा हुआ क्योंकि भारत ने तिब्बत की लामा सरकार को अपने यहाँ मानवीय मूल्यों के आधार पर शरण दे रखी है।
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