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चारो ओर पित्ति देखकर पुण्य सदन जी ने शरीर त्यागने की इच्छा की लेकिन लोगों ने उन्हें धैर्य बंधाया। उसी समय योग बल से महर्षि राघानन्द हाँ प्रकट हुये। शिष्ठ मुनि के अतार राघानन्द जी के प्रकट होते ही समस्त नर नारी उनके चरणों में जा पड़े। उन्होने समाधि लगाकर लोगों की समस्या को समझा। वे पुण्य सदन जी को सम्बोधित कर कहने लगे- आपका पुण्य महान है। आपको प्रभु ने रदान दिया था कि ह बारह साल तक वे आपके घर में बाल लीला का आनन्द देंगे। अब ह समय पूरा हो गया है और प्रभु अपने लोक को चले गये हैं। इस पर लोगो ने महर्षि राघानन्द जी से एक बार दर्शन कराने की बात की तो राघानन्द जी ने बड़े राम यज्ञ की आश्यकता बताई। उस यज्ञ के बाद कुमार रामानन्द प्रकट हुये। महíष राघानन्द जी ने कुमार से कहा- आपने दर्शन देकर हमारे यज्ञ को सफल किया। अब आप इस भूमि पर धर्म में आई गिराट को मिटाने के लिए और यनों के अत्याचार को खत्म करने के लिए यहीं रहो। महर्षि राघवानन्द जी ने उन्हें राम मंत्र की दीक्षा देकर विधिवत वैष्णव संन्यास दिया। रामानन्द जी पंच गंगा घाट पर तपस्या करने लगे। लोगों के ज्यादा आग्रह पर वह शंख बजाकर लोगों की समस्या का समाधान कर देते। एक मुर्दा उनकी शंख ध्वनि सुनकर जीवित् हो गया था। उन्हें जब ज्यादा विक्षोभ होने लगा तो उन्होंने शंख बजाना बंद कर दिया। वे लोगों के आग्रह पर दिन में सिर्फ एक बार शंख बजाने लगे।
 
आधी रात के पश्चात एक दिन जब वे [[गंगा नदी|गंगा]] स्नान के लिए गये तो कलयुग राज उनके सामने प्रकट हुये। उनका पंच पात्र सोने का था। [[कलियुग|कलयुग]] राज उसमें जा बैठे। लेकिन आचार्य को इसका पता चल गया। जब आचार्य ने उनसे पूछा कि आप मेरी पूजा में विघ्न क्यों डालते हो तो कलयुग राज प्रत्यक्ष होकर राम मंत्र की दीक्षा मांगने लगे। रामानन्दाचार्य जी ने अपना स्वभाव छोड़ उन्हें मंत्र दीक्षा दी। रामानन्द जी ने अपने जीन काल में अनेकों दुखियों और पीड़ितों को अपने आर्शीाद से ठीक किया जिनमें राजकुमार का क्षय रोग, [[रविदास|रैदास]] को दीक्षा, कबीर को आशीर्वाद, नये योगी श्री हरि नाथ की पीड़ा, ब्राह्मण कन्या बीनी का उद्धार जसी अनेकों चमत्कारिक घटनायें शामिल थीं। गगनौढ़गढ़ के राजा पीपाजी को मंत्र दीक्षा देकर उन्होंने वैष्णब सन्त बना दिया। उन्होंने अपने जीन काल में यवनों से हिन्दुओं की रक्षा की। उनके अत्याचारों को रुकाने के लिए दिल्ली के बादशाह से सन्धि की। आचार्य ने धर्म प्रचार के लिए काशी से चलकर गगनौरगढ़, चित्रकूट, जनकपुर, गंगासागर, जगन्नाथपुरी आदि स्थानों की यात्रा की। आज उन्हीं के तपोबल से रामानन्द सम्प्रदाय का विशाल पंथ चल रहा है।
 
== श्री रामानंदाचार्य : कबीर तथा तुलसी के प्रेरक ==
साथ ही श्री रामानंद ने एक प्रभावी तथा अद्भुत शिष्य परंपरा का निर्माण किया। विश्व के समूचे इतिहास में किसी भी व्यक्ति ने उतने श्रेष्ठ तथा समर्पित शिष्यों का निर्माण नहीं किया जितना रामानंद ने। रामानंद के बारह प्रसिद्ध शिष्य भक्ति आंदोलन के मुख्य प्रचारक बने। उनकी रामभक्ति की धारा दो प्रवाहों में विभाजित हुई थी। एक निराकार निर्गुण रामभक्ति में तथा दूसरी साकार सगुण अवतारी रामभक्ति में। एक का प्रतिनिधित्व किया कबीर ने तथा दूसरे को व्यापक स्वरूप प्रदान किया तुलसी ने।
 
क्रांतिकारी कबीर ने रामानंद से निर्गुण राम तथा भक्ति का रहस्य सीखा। यद्यपि राम की [[अवतारवाद]] की धारणा को उन्होंने स्वीकार नहीं किया, परंतु ईश्वर को व्रह्म के रूप में स्वीकार किया। इसके प्रमाण श्री [[गुरूग्रंथ साहब]] में उनके एक पद से होता है जो उसमें दिया गया है। कबीर पर रामानंद का प्रभाव प्राय: सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने भक्ति के लिए अभय का पाठ रामानंद से ही सीखा। [[कबीर ग्रंथावली]] में राम का नाम २१७ बार आया है, कबीर की भक्ति रामानंद की भांति जाति भेद अथवा वर्ग भेद से ऊपर है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है यदि रामानंद व कबीर हिन्दू समाज के उपेक्षित जनों में एक आशा और भरोसे की नींव न डालते तो उनमें से अधिकतर मुसलमान हो गए होते। महाकवि तुलसी ने रामानंद की भक्ति तथा [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैत वेदांत]] का समन्वय कर सगुण रामभक्ति का पाठ विश्व को पढ़ाया। वस्तुत: समाज के प्रबुद्ध विचार तथा जन सामान्य के विचारों का अद्भुत समन्वय तुलसी के दर्शन में दृष्टिगोचर होता है। जहां [[शंकराचार्य|शंकर]] का अद्वैतवाद प्रबुद्ध विचार का परिचायक है, वहां रामानंद के भक्ति संबंधी विचारों में जन सामान्य की भावना का प्रतिनिधित्व है। दोनों का अद्भुत समन्वय तुलसी में दिखलाई देता है। इसी कारण उनका प्रसिद्ध ग्रंथ [[श्रीरामचरितमानस|रामचरितमानस]] विश्व के महानतम ग्रंथों में माना जाता है। धर्म की मर्यादा को महत्व देते हुए उन्होंने भक्ति की धारा प्रभावित की।
 
अत: निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि श्री रामानंदाचार्य को ही यह श्रेय है कि उन्होंने प्रेम और रामभक्ति को उत्तर भारत में जनव्यापी एक सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। रामभक्ति के माध्यम से उन्होंने देश में नव जागरण किया। उन्होंने भारतीय समाज में आत्मविश्वास व सामाजिक चेतना जगाई। इसके फलस्वरूप धर्म मत परिवर्तन की प्रक्रिया अवरुद्ध हुई। जन भाषा के माध्यम से उनके द्वारा फैला यह आंदोलन शीघ्र ही भक्ति आंदोलन के रूप में व्यक्त हुआ और जिसे कबीर तथा तुलसी ने रक्षात्मक के साथ-साथ आक्रामक स्वरूप प्रदान किया। वही रामभक्ति की अविरल धारा आज भी भारतीय समाज को समेटे हुए प्रेरणा व राष्ट्रीय जागरण का स्रोत बनी हुई है।
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