"श्यामसुन्दर दास" के अवतरणों में अंतर

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[[चित्र:Dr. Shyam Sunder Das.jpg|right|thumb|300px|हिन्दी के महान सेवक : बाबू श्यामसुन्दर दास|कड़ी=Special:FilePath/Dr._Shyam_Sunder_Das.jpg]]
'''डॉ॰ श्यामसुंदर दास''' (सन् 1875 - 1945 ई.) [[हिन्दी|हिंदी]] के अनन्य साधक, विद्वान्, आलोचक और शिक्षाविद् थे। [[हिंदी साहित्य]] और बौद्धिकता के पथ-प्रदर्शकों में उनका नाम अविस्मरणीय है। हिंदी-क्षेत्र के साहित्यिक-सांस्कृतिक नवजागरण में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने और उनके साथियों ने मिलकर [[नागरीप्रचारिणी सभा|काशी नागरी प्रचारिणी सभा]] की स्थापना की।
 
विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई के लिए अगर बाबू साहब के नाम से मशहूर श्याम सुंदर दास ने पुस्तकें तैयार न की होतीं तो शायद हिंदी का अध्ययन-अध्यापन आज सबके लिए इस तरह सुलभ न होता। उनके द्वारा की गयी हिंदी साहित्य की पचास वर्षों तक निरंतर सेवा के कारण कोश, इतिहास, भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचन, सम्पादित ग्रंथ, पाठ्य-सामग्री निर्माण आदि से हिंदी-जगत समृद्ध हुआ। उन्हीं के अविस्मरणीय कामों ने हिंदी को उच्चस्तर पर प्रतिष्ठित करते हुए विश्वविद्यालयों में गौरवपूर्वक स्थापित किया।
 
बाबू श्याम सुंदर दास ने अपने जीवन के पचास वर्ष हिंदी की सेवा करते हुए व्यतीत किए उनकी इस हिंदी सेवा को ध्यान में रखते हुए ही राष्ट्रकवि [[मैथिलीशरण गुप्त|मैथिली शरण गुप्त]] ने निम्न पंक्तियाँ लिखी हैं-
 
: '''मातृभाषा के हुए जो विगत वर्ष पचास।'''
: '''नाम उनका एक ही है श्याम सुंदरदास।।'''
 
[[सर्वपल्लीसर्वेपल्लि राधाकृष्णन|डॉ॰ राधा कृष्णन]] के शब्दों में, ''बाबू श्याम सुंदर अपनी विद्वत्ता का वह आदर्श छोड़ गए हैं जो हिंदी के विद्वानों की वर्तमान पीढ़ी को उन्नति करने की प्रेरणा देता रहेगा।''
 
== जीवनी एवं हिन्दीसेवा ==
बाबू श्यामसुंदरदास का जन्म विद्वानों की काशी में 14 जुलाई 1875 को हुआ था। इनका परिवार [[लाहौर]] से आकर काशी में बस गया था और कपड़े का व्यापार करता था। इनके पिता का नाम लाला देवीदास खत्री था। बनारस के [[क्वींस कालेज]] से अँँगरेजी में 1897 में बी. ए. किया। जब इंटर के छात्र थे तभी सन् 1893 में मित्रों रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह के सहयोग से [[नागरी प्रचारिणीनागरीप्रचारिणी सभा|काशी नागरी प्रचारिणी सभा]] की नींव डाली और 45 वर्षों तक निरंतर उसके संवर्धन में बहुमूल्य योग देते रहे। 1896 में "[[नागरीप्रचारिणी पत्रिका]]" निकलने पर उसके प्रथम संपादक नियुक्त हुए और बाद में कई बार वर्षों तक उसका संपादन किया। "[[सरस्वती पत्रिका|सरस्वती]]" के भी आरंभिक तीन वर्षों (1900 सेे1902) तक संपादक रहे। 1899 में हिंदू स्कूल के अध्यापक नियुक्त हुए और कुछ दिनों बाद हिंदू कालेज में अंग्रेजी के जूनियर प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1909 में [[जम्मू]] महाराज के स्टेट आफिस में काम करने लगे जहाँ दो वर्ष रहे। 1913 से 1921 तक [[लखनऊ]] के कालीचरण हाई स्कूल में हेडमास्टर रहे। इनके उद्योग से विद्यालय की अच्छी उन्नति हुई। 1921 में [[काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय|काशी हिंदू विश्वविद्यालय]] में हिंदी विभाग खुल जाने पर इन्हें अध्यक्ष के रूप में बुलाया गया। पाठ्यक्रम के निर्धारण से लेकर हिंदी भाषा और साहित्य की विश्वविद्यालयस्तरीय शिक्षा के मार्ग की अनेक बाधाओं को हटाकर योग्यतापूर्वक हिंदी विभाग का संचालन और संवर्धन किया। इस प्रकार इन्हें हिंदी की उच्च शिक्षा के प्रवर्तन और आयोजन का श्रेय है। उस समय विश्वविद्यालय स्तर की पाठ्य पुस्तकों और अलोचना ग्रंथों का अभाव था। इन्होंने स्वयं अपेक्षित ग्रंथों का संपादन किया, समीक्षाग्रंथ लिखे और अपने सुविज्ञ सहयोगियों से लिखवाए।
 
काशी नागरीप्रचारिणी सभा के माध्यम से श्री श्यामसुंदरदास ने हिंदी की बहुमुखी सेवा की और ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों का सूत्रपात एवं संचालन किया जिनसे हिंदी की अभूतपूर्व उन्नति हुई। न्यायालयों में [[देवनागरी|नागरी]] के प्रवेश के लिए [[मदनमोहन मालवीय|मालवीय जी]] आदि की सहायता में उन्होंने सफल उद्योग किया। [[हिंदी वैज्ञानिक कोश]] के निर्माण में भी योग दिया। हिंदी की लेख तथा [[लिपि]] प्रणाली के संस्कार के लिए आरंभिक प्रयत्न (1898) किया। हस्तलिखित हिंदी पुस्तकों की खोज का काम आरंभ कर इन्होंने उसे नौ वर्षों तक चलाया और उसकी सात रिपोर्टें लिखीं। "[[हिंदी शब्दसागर]]" के ये प्रधान संपादक थे। यह विशाल शब्दकोश इनके अप्रतिम बुद्धिबल और कार्यक्षमता का प्रमाण है। 1907 से 1929 तक अत्यंत निष्ठा से इन्होंने इसका संपादन और कार्यसंचालन किया। इस कोश के प्रकाशन के अवसर पर इनकी सेवाओं को मान्यता देने के निमित्त "कोशोत्सव स्मारक संग्रह" के रूप में इन्हें अभिनंदन ग्रंथ अर्पित किया गया।
 
[[काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय|काशी हिंदू विश्वविद्यालय]] में अध्यापनकार्य के समय उच्च अध्ययन में उपयोग के लिए इन्होंने [[भाषाविज्ञान]], आलोचना शास्त्र और हिंदी भाषा तथा साहित्य के विकास क्रम पर श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे।
 
श्यामसुंदरदास का व्यक्तित्व तेजस्वी और जीवन हिंदी की सेवा के लिए अर्पित था। जिस जमाने में उन्होंने कार्य शुरु किया उस समय का वातावरण हिंदी के लिए अत्यंत प्रतिकूल था। सरकारी कामकाज और शिक्षा आदि के क्षेत्रों में वह उपेक्षित थीं। हिंदी बोलनेवाला अशिक्षित समझा जाता था। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में हिंदी के प्रचार प्रसार और संवर्धन के लिए उन्होंने कशी नागरीप्रचारिणी सभा को केंद्र बनाकर जो अभूतपूर्व संघबद्ध प्रयत्न किया उसका ऐतिहासिक महत्व है। ये उच्च कोटि के संगठनकर्ता और व्यवस्थापक थे। समर्थ मित्रों के सहयोग और अपने बुद्धिबल तथा कर्मठता से उन्होंने हिंदी की उन्नति के मार्ग में आनेवाली कठिनाइयों का डटकर सामना किया और सफलता प्राप्त की। उनकी दृष्टि व्यक्तियों की क्षमता पहचानने में अचूक थी। उन्होंने अनेक व्यक्तियों को प्रोत्साहित कर साहित्य के क्षेत्र में ला खड़ा किया। इसीलिए कहा गया है कि उन्होंने "ग्रंथों की ही नहीं, ग्रंथकारों की भी रचना की"।
 
उनकी हिंदीसेवाओं से प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने "रायबहादुर", [[अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन|हिंदी साहित्य सम्मेलन]] ने "साहित्यवाचस्पति" और काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने डी. लिट्. की सम्मानोपाधि प्रदान की।
 
== ग्रंथ-रचना ==
हिंदी साहित्य में बाबू श्याम सुंदर दास का स्थान उनके हिंदीप्रचारक और हिंदी उन्नायक के रूप में। उन्होंने अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की। अनेक ग्रंथों का संपादन किया। काशी नगरी-प्रचारिणी सभा की स्थापना में उनका प्रमुख हाथ था। उन्होंने अपने प्रयत्नों से हिंदी को विश्वविद्यालय की उच्च कक्षाओं में स्थान दिलाया।
 
[[काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय|काशी हिंदू विश्वविद्यालय]] में आने से पूर्व उन्होंने 1900 में हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए न्यायालयों में हिंदी के प्रवेश का आंदोलन चलाया। 1900 तक श्यामसुंदर दास ने ही सरस्वती पत्रिका का सम्पादन किया। उन्होने हस्तलिखित ग्रंथों की खोज की तथा [[हिंदी शब्दसागर]] का भी सम्पादन किया। 1902 में नागरी प्रचारिणी सभा के भवन का निर्माण भी उन्हीं की देखरेख में कराया गया। 1907 में उन्होंने हिंदी आर्य भाषा पुस्तकालय की स्थापना की, प्राचीन महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का सम्पादन किया और शिक्षा स्तर के अनुरूप पाठ्य पुस्तकों का निर्माण कार्य भी आरंभ किया।
 
[[रामचन्द्र शुक्ल|रामचंद्र शुक्ल]] ने हिंदी साहित्य का इतिहास में लिखा है :
 
:''बाबू साहब ने बड़ा भारी काम लेखकों के लिए सामग्री प्रस्तुत करने का किया है। हिंदी पुस्तकों की खोज के विधान द्वारा आपने साहित्य का इतिहास, कवियों के चरित और उन पर प्रबंध आदि लिखने का बहुत बड़ा मसाला इकट्ठा करके रख दिया। इसी प्रकार हिंदी के नये-पुराने लेखकों के जीवनवृत्त हिंदी कोविद रत्नमाला के दो भागों में संगृहीत किये हैं। शिक्षोपयोगी तीन पुस्तकों, भाषा विज्ञान, हिंदी भाषा और साहित्य तथा साहित्य लोचन, भी आपने लिखी या संकलित की है।''
 
श्याम सुंदर दास न केवल संस्थान-निर्माता थे, बल्कि प्रबंध-कला में भी बेजोड़ थे। साहित्य के समस्त क्षेत्रों के अभावों को दूर करने के लिए उन्होंने संकल्पबद्ध होकर श्रम किया। भाषा तत्त्ववेत्ता के रूप में या सिद्धांतों के व्याख्याता रूप में उन्हीं की उपलब्धियों के कारण साहित्यालोचन हिंदी के विद्यार्थियों का बहुत समय तक कंठहार बना रहा। इनके मन में यह धारणा निर्भांत रही कि हिंदी की सैद्धांतिक समीक्षा का आधार संस्कृत और पश्चिमी आलोचना-सिद्धांतों को मिला कर और उन्हें एक ख़ास सामंजस्य के साथ ही बनाया जाना चाहिए। श्याम सुंदर दास से पहले हिंदी और नागरी लिपि के लिए विशेष रूप से संकटपूर्ण समय था। [[प्रतापनारायण मिश्र|प्रताप नारायण मिश्र]] ने कई स्थानों पर हिंदी के प्रचार के लिए सभाएँ स्थापित की थीं। ऐसी ही एक सभा 1884 में ‘हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि मध्य भारत सभा’ के नाम से प्रयाग में प्रतिष्ठित की गयी। सरकारी दक्रतरों में नागरी के प्रवेश के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कई बार उद्यम किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। इसके बावजूद प्रयत्न बराबर चलता रहा। अदालती भाषा उर्दू होने के कारण नवशिक्षितों में उर्दू पढ़ने वालों की संख्या अधिक थी, जिससे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य आगे नहीं बढ़ पाता था। इस साहित्य-संकट के अतिरिक्त नागरी का प्रवेश सरकारी दक्रतरों में न होने से नागरी जानने वाली जनता के सामने घोर संकट था। इसी दौर में कुछ उत्साही छात्रों के उद्योग से, जिनमें बाबू श्याम सुंदर दास प्रमुख थे, 1893 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की गयी। यहाँ भी रामचंद्र शुक्ल का कथन याद रखना चाहिए कि, ‘सच पूछिए तो इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्याम सुंदर दास के त्याग और सतत परिश्रम का फल है। वे आदि से अंत तक इसके प्राणस्वरूप स्थित होकर बराबर इसे अनेक बड़े उद्योगों में तत्पर करते रहे। इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफ़ेरे भाई राधाकृष्ण दास हुए।’ नागरी प्रचार के आंदोलन ने हिंदी-प्रेमियों में नया उत्साह पैदा किया और बहुत से लोग साहित्य की श्रीवृद्धि में समर्पित भाव से लग गये।
 
== सन्दर्भ ==
* [[हिन्दी गद्यकार]]
* [[हिंदी साहित्य]]
* [[नागरीप्रचारिणी सभा|काशी नागरी प्रचारिणी सभा]]
* [[हिंदी शब्दसागर|हिन्दी शब्दसागर]]
 
{{हिन्दी साहित्यकार (जन्म १८५०-१९००)}}
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