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राजनीति विज्ञान अध्ययन का एक विस्तृत विषय या क्षेत्र है। राजनीति विज्ञान में ये तमाम बातें शामिल हैं:
राजनीतिक चिंतन, [[राजनीतिक दर्शन|राजनीतिक सिद्धान्त]], [[राजनीतिक दर्शन]], राजनीतिक विचारधारा, संस्थागत या संरचनागत ढांचा, [[तुलनात्मक राजनीति]], [[लोक प्रशासन]], [[अन्तरराष्ट्रीय विधि|अंतर्राष्ट्रीय कानून]] और [[संगठन]] आदि।
 
== परिचय ==
राजनीति विज्ञान का उद्भव अत्यन्त प्राचीन है। यूनानी विचारक [[अरस्तु|अरस्तू]] को राजनीति विज्ञान का पितामह कहा जाता है। यूनानी चिन्तन में [[प्लेटो]] का आदर्शवाद एवं अरस्तू का बुद्धिवाद समाहित है।
 
राजनीतिशास्त्र या राजनीति विज्ञान अत्यन्त प्राचीन विषय है। प्रारंभ में इसे स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं स्वीकारा गया। राजनीति विज्ञान का अध्ययन [[नीतिशास्त्र]], [[दर्शनशास्त्र]], [[इतिहास]], एवं [[विधिशास्त्र]] आदि की अवधारणाओं के आधार पर ही करने की परम्परा थी। आधुनिक समय में इसे न केवल स्वतंत्र विषय के रूप में स्वीकारा गया अपितु सामाजिक विज्ञानों के सन्दर्भों में इसका पर्याप्त विकास भी हुआ। राजनीति विज्ञान का अध्ययन आज के सन्दर्भ में पहले की अपेक्षा एक ओर जहां अत्यधिक महत्वपूर्ण है वहीं दूसरी ओर वह अत्यन्त जटिल भी है।
 
== राजनीति विज्ञान का परम्परागत दृष्टिकोण ==
ईसा पूर्व छठी सदी से 20वीं सदी में लगभग [[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय महायुद्ध]] से पूर्व तक जिस राजनीतिक दृष्टिकोण (political approach) का प्रचलन रहा है, उसे अध्ययन सुविधा की दृष्टि से 'परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण' कहा जाता है। इसे आदर्शवादी या शास्त्रीय दृष्टिकोण भी कहा जाता है।
 
परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण व विकास में अनेक राजनीतिक विचारकों का योगदान रहा है यथा- प्लेटो, अरस्तू, सिसरो, सन्त अगस्टीन, एक्विनास, लॉक, रूसो, मॉन्टेस्क्यू, कान्ट, हीगल, ग्रीन आदि। आधुनिक युग में भी अनेक विद्वान परम्परागत दृष्टिकोण के समर्थक माने जाते है जैसे- लियो स्ट्रॉस, ऐरिक वोगोलिन, ऑकसॉट, हन्ना आरेण्ट आदि।
 
प्राचीन यूनान व रोम में राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के लिये दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, इतिहास व विधि की अवधारणाओं को आधार बनाया गया था किन्तु मध्यकाल में मुख्यतः ईसाई धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण को राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण का आधार बनाया गया। 16वीं सदी में पुनर्जागरण आन्दोलन ने बौद्धिक राजनीतिक चेतना को जन्म दिया साथ ही [[सम्प्रभु राज्य|राष्ट्र]]-राज्य]] अवधारणा को जन्म दिया। 18 वीं सदी की [[औद्योगिक क्रांति]] ने राजनीतिक सिद्धान्त के विकास को नई गति प्रदान की। [[इंग्लैण्ड]] की [[गौरवशाली क्रांति|गौरवपूर्ण क्रांति]], फ्रांस व अमेरिका की लोकतांत्रिक क्रांतियों ने परम्परागत राजनीतिक सिद्धान्त का विकास ’उदारवादी लोकतांत्रिक राजनीतिक सिद्धांत’ के रूप में किया।
 
परम्परागत राजनीतिक दृष्टिकोण ने राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के लिये मुख्यतः दार्शनिक, तार्किक नैतिक, ऐतिहासिक व विधिक पद्धतियों को अपनाया है। 19वीं सदी से इसने विधिक, संवैधानिक, संस्थागत, विवरणात्मक एवं तुलनात्मक पद्धतियों पर विशेष बल दिया है। 20वीं सदी के प्रारंभ से ही परम्परागत दृष्टिकोण ने राजनीतिक सिद्धान्त के निर्माण के लिये एक नई दृष्टि अपनाई जो अतीत की तुलना में अधिक यथार्थवादी थी। परम्परागत राजनीतिक विज्ञान में [[सरकार]] एवं उसके वैधानिक अंगों के बाहर व्यवहार में सरकार की नीतियों एवं निर्णयों को प्रभावित करने वाले सामाजिक राजनीतिक तथ्यों के अध्ययन पर बल दिया। [[राजनीतिक दल]] एवम्
 
=== अर्थ एवं परिभाषा===
’राजनीति’ का पर्यायवाची [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेजी]] शब्द 'पॉलिटिक्स' [[यूनानी भाषा]] के 'पॉलिस' (Polis) शब्द से बना है जिसका अर्थ 'नगर’ अथवा ’राज्य’ है। प्राचीन यूनान में प्रत्येक नगर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में संगठित होता था और पॉलिटिक्स शब्द से उन नगर राज्यों से सम्बंधित शासन की विद्या का बोध होता था। धीरे-धीरे नगर राज्यों (सिटी स्टेट्स) का स्थान राष्ट्रीय राज्योंं (Nation-State) ने ले लिया अतः राजनीति भी राज्य के विस्तृत रूप से सम्बंधित विद्या हो गई।
 
आधुनिक युग में जब संसार प्रत्येक विषय के वैज्ञानिक व व्यवस्थित अध्ययन की ओर झुक रहा है, राज्य से सम्बंधित विषयों का अध्ययन '''राजनीति शास्त्र''' अथवा '''राजनीति विज्ञान''' कहा जाता है। परम्परागत राजनीति विज्ञान के विद्वानों ने राजनीति विज्ञान की भिन्न-भिन्न परिभाषाएॅ दी हैं। इन परिभाषाओं की निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत व्याख्या की जा सकती हैः-
'''(१) राजनीति विज्ञान राज्य का अध्ययन है'''- अनेक राजनीतिशास्त्रियों की मान्यता है कि प्राचीन काल से ही राजनीति विज्ञान [[राज्य]] नामक संस्था के अध्ययन का विषय है। विद्वानों की मान्यता है कि प्राचीन काल से आधुनिक काल तक राजनीति विज्ञान का ’केन्द्रीय तत्व’ [[राज्य]] ही रहा है। अतः राजनीति विज्ञान में राज्य का ही अध्ययन किया जाना चाहिये। प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री ब्लुंशली के अनुसार राजनीति शास्त्र वह विज्ञान है जिसका संबंध राज्य से है और जो यह समझने का प्रयत्न करता है कि राज्य के आधारभूत तत्व क्या है, उसका आवश्यक स्वरूप क्या है, उसकी किन-किन विविध रूपों में अभिव्यक्ति होती है तथा उसका विकास कैसे हुआ।’ जर्मन लेखक गैरिस का कथन है कि राजनीति शास्त्र में, शक्ति की संस्था के रूप में, राज्य के समस्त संबंधों, उसकी उत्पत्ति, उसके मूर्त रूप (भूमि एवं निवासी), उसके प्रयोजन, उसके नैतिक महत्व, उसकी आर्थिक समस्याओं, उसके अस्तित्व की अवस्थाओं उसके वित्तीय पहलू, उद्धेश्य आदि पर विचार किया जाता है। डाक्टर गार्नर के अनुसार ’’राजनीति शास्त्र का प्रारंभ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।’’ डाक्टर जकारिया का कथन है कि ’’राजनीति शास्त्र व्यवस्थित रूप में उन आधारभूत सिद्धान्तों का निरूपण करता है जिनके अनुसार समष्टि रूप में राज्य का संगठन होता है और प्रभुसत्ता का प्रयोग किया जाता है।’
 
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राजनीति विज्ञान का केन्द्रीय विषय राज्य है। इसका कारण [[प्लेटो]] व [[अरस्तु|अरस्तू]] के समय से चली आ रही यह मान्यता है कि राज्य का अस्तित्व कुछ पवित्र लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये है।
 
'''(२) राजनीति विज्ञान सरकार का अध्ययन है''' - कुछ राजनीतिशास्त्रियों की राय में राजनीति विज्ञान में राज्य का नहीं अपितु [[सरकार]] का अध्ययन किया जाना चाहिये। उनका मत है कि राज्य मनुष्यों का ही संगठन विशेष है तथा उसकी क्रियात्मक अभिव्यक्ति सरकार के माध्यम से होती है। उनका तर्क है कि राज्य एक अमूर्त संरचना है जबकि सरकार एक मूर्त एवं प्रत्यक्ष संस्था है और सरकार ही सम्प्रभुता का प्रयोग करती है। सरकार ही राज्य का वह यन्त्र होता है जिसके द्वारा उसके उद्देश्य तथा प्रयोजन कार्यरूप में परिणित होते हैं। अतः राजनीति विज्ञान में सरकार का ही अध्ययन होना चाहिये। सीले के अनुसार ’’राजनीति विज्ञान शासन के तत्वों का अनुसंधान उसी प्रकार करता है जैसे [[अर्थशास्त्र|सम्पत्ति शास्त्र]] सम्पत्ति का, [[जीव विज्ञान|जीवविज्ञान]] जीवन का, [[अंकगणित]] अंकों का तथा [[रेखागणित]] स्थान एवं लम्बाई-चौड़ाई का करता है।’’ लीकॉक ने इस सन्दर्भ में संक्षिप्त एवं सारगर्भित परिभाषा दी है- ‘‘राजनीति विज्ञान सरकार से सम्बंधित शास्त्र है।’’<ref>Elements of Political Science (1906)</ref>
 
'''(३) राजनीति विज्ञान राज्य एवं सरकार दोनों का अध्ययन है'''- परम्परागत राजनीति विज्ञान के कुछ विद्वानों की मान्यता है कि केवल राज्य या केवल सरकार की दृष्टि से दी गई परिभाषाएॅ अपूर्ण हैं। वस्तुतः राज्य एवं सरकार का परस्पर घनिष्ठ संबंध है और इनमें से किसी एक के अभाव में दूसरे का अध्ययन ही नहीं किया जा सकता है। यदि राज्य अमूर्त संरचना है तो सरकार इसे मूर्त व भौतिक रूप प्रदान करती है तथा इसी प्रकार यदि राज्य प्रभुसत्ता को धारण करने वाला है तो सरकार उस प्रभुसत्ता का उपभोग करती है। अतः राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत इन दोनों का ही अध्ययन किया जाना चाहिये। [[पॉल जैनेट]] के अनुसार ’’राजनीति विज्ञान सामाजिक विज्ञानों का वह अंग है जिसमें राज्य के आधार तथा सरकार के सिद्धान्तों पर विचार किया जाता है।’’ [[डिमॉक]] के अनुसार राजनीति विज्ञान का संबंध राज्य तथा उसके साधन सरकार से है।’’ [[गिलक्राइस्ट]] ने संक्षिप्त परिभाषा देते हुये कहा है कि ’’राजनीति विज्ञान राज्य व सरकार की सामान्य समस्याओं का अध्ययन करता है।’’
'''(४) राजनीति विज्ञान मानव तत्व के सन्दर्भ में अध्ययन है'''- कुछ राजनीतिशास्त्री उपरोक्त परिभाषाओं को पूर्ण नहीं मानते क्योंकि इन परिभाषाओं में मानव तत्व की उपेक्षा की गई है। इनकी मान्यता है कि राज्य या सरकार का अध्ययन बिना मानव के उद्देश्यहीन एवं महत्वहीन है क्योंकि इनका निर्माण मानव के हित के लिये ही हुआ है अतः मानव-तत्व का अध्ययन अनिवार्य है।
 
प्रोफेसर [[हैरोल्ड लॉस्की|लास्की]] की अनुसार ‘‘राजनीति शास्त्र के अध्ययन का संबंध संगठित राज्यों से सम्बंधित मनुष्यों के जीवन से है।’’ राजनीति शास्त्र के प्रसंग में मानव तत्व का महत्व व्यक्त करते हुये [[एन्साइक्लोपीडिया ऑफ सोशल साइन्सेज]] में [[हरमन हेलर]] ने तो यहाँ तक कहा है कि ’’राजनीति शास्त्र के सर्वांगीण स्वरूप का निर्धारण उसकी मनुष्य विषयक मौलिक मान्यताओं द्वारा होता है।’’ वस्तुतः इसका अर्थ यह है कि राजनीति विज्ञान एक ऐसा सामाजिक विज्ञान है जिसके अन्तर्गत इस तथ्य का भी अध्ययन किया जाता है कि किसी संगठित राजनीतिक समाज में स्वयं मनुष्य की स्थिति क्या है। राजनीति विज्ञान व्यक्ति के अधिकार व स्वतन्त्रताओं के अध्ययन के साथ समाज के विभिन्न समुदायों व वर्गों के प्रति सरकार की नीतियों का भी अध्ययन करता है।
 
अतः राजनीति विज्ञान की परिभाषा हम ऐसे शास्त्र के रूप में कर सकते है जिसका संबंध उसके राज्य नामक संगठन से होता है और जिसके अन्तर्गत स्वभावतः सरकार का भी विस्तृत अध्ययन सम्मिलित होता हैं संक्षेप में राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत राज्य, सरकार तथा अन्य सम्बंधित संगठनों व संस्थाओं का, मानव के राजनीतिक जीवन के संदर्भ में अध्ययन किया जाता है।
* तृतीय विचारधारा '''राज्य व सरकार दोनों''' को राजनीति विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय मानती है।
 
परम्परागत राजनीति विज्ञान का क्षेत्र निर्धारण करने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ की [[युनेस्को|यूनेस्को]] द्वारा सितम्बर 1948 में विश्व के प्रमुख राजनीतिशास्त्रियों का सम्मेलन अयोजित किया गया जिसमें परम्परागत राजनीति विज्ञान के क्षेत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित अध्ययन विषय शामिल किये जाने का निर्णय किया गया-
 
'''(१) राजनीति के सिद्धान्त'''- अतीत और वर्तमान के राजनीतिक सिद्धान्तों एवं विचारों का अध्ययन।
 
इस मत के प्रतिवादक यह मानते है कि सभी समाज विज्ञानों की प्रेरणा स्रोत व अध्ययन का केन्द्र बिन्दु मानव-व्यवहार है और राजनीति विज्ञान सामान्यतः मानव व्यवहार के राजनीतिक पहलू का अध्ययन है।
[[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय महायुद्ध]] से पूर्व कतिपय राजनीतिक विचारक राजनीति विज्ञान के अध्ययन में मनुष्य की राजनीतिक प्रक्रियाओं एवं गतिविधियों को प्रमुख स्थान दिये जाने के प्रति आग्रहशील रहे। [[बाल्टर वैजहॉट]], [[वुडरो विल्सन]], [[लार्ड ब्राइस]] आदि ने राजनीति के यथार्थवादी अध्ययन पर बल दिया। ग्राहम वालास, आर्थर बैन्टले, कैटलिन और लासवैल ने मानव एवं उसके व्यवहार के अध्ययन पर बल दिया। [[चार्ल्स मैरियम]] ने 1925 की अमरीकी राजनीति विज्ञान एशोसियेशन के सम्मेलन में राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिये वैज्ञानिक तकनीकों एवं प्रविधियों के विकास एवं प्रयोग पर बल दिया। 1930 में लासवैल ने अपनी पुस्तक ‘साइको-पैथौलॉजी एण्ड पॉलिटिक्स’ में राजनीतिक घटनाओं एवं क्रियाओं की व्याख्या के लिये [[फ्राइड]] के [[मनोविज्ञान]] को आधार बनाया।
 
द्वितीय महायुद्ध के पूर्व अमेरिका का [[शिकागो विश्वविद्यालय]] व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान का कार्यक्षेत्र बन चुका था। परम्परागत राजनीति विज्ञान से आधुनिक राजनीति विज्ञान तक की विकास प्रक्रिया में द्वितीय महायुद्ध की घटना का विशेष महत्व है जिसके बाद की दुनिया पूर्व की दुनिया से राजनीतिक संरचना, औद्योगिक विकास, वैज्ञानिक व तकनीकी उपलब्धियों तथा सैन्य क्षमता की दृष्टि से अत्यधिक भिन्न थी। विश्वस्तर पर हुये इस गंभीर परिवर्तन ने मानव समाज व संस्कृति की परम्परागत अवधारणाओं के स्थान पर नई अवधारणाओं को जन्म दिया। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् इस वातावरण में चार्ल्स मैरियम के अपनी रचना ’न्यू आस्पेक्ट ऑफ पॉलिटिक्स’
[[अरस्तु]] के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक जीवन के समस्त आयाम (सांस्कृतिक, सामाजिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, राजनीतिक) उसकी जीवन शैली को सम्पन्न करते हैं। मानक जीवन की धुरी पर इन आयामों के सभी नियामक विषय परस्पर जुड़कर सतत परिचालित है। राजनीति इन सभी आयामों को समन्वित करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है।
 
राजनीति विज्ञान एवं अन्य [[सामाजिक विज्ञान|सामाजिक विज्ञानों]] की घनिष्ठता के कारण ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन में प्राचीन काल से अन्तर-अनुशासनात्मक अध्ययन की परम्परा रही है। प्राचीन यूनानी विचारक [[प्लेटो]], अरस्तू की रचनाओं में [[दर्शनशास्त्र|दर्शन]] व [[नीतिशास्त्र|आचारशास्त्र]] से राजनीति की घनिष्ठता स्पष्ट होती है। मध्ययुगीन विचारक [[सेण्ट आगस्टाइन]] व [[टॉमस एक्वीनास]] की रचनाओं में [[धर्मशास्त्र]] व [[नीतिशास्त्र]] के साथ राजनीति की घनिष्ठता प्रकट होती है।
 
16वीं सदी अर्थात् आधुनिक युग के प्रारम्भ के विद्वान [[निकोलो मैकियावेली|मैकियावली]] ने [[इतिहास]] का अपने वैचारिक आधार में प्रयोग किया। उसके बाद [[हाब्स]] ने [[ज्यामिति]], [[यांत्रिकी]] तथा [[आयुर्विज्ञान|चिकित्साविज्ञान]] के तथ्यों व सिद्धान्तों का उपयोग किया। [[रूसो]] व [[मॉन्टेस्क्यू]] ने राजनीति व [[भूगोल]] की घनिष्ठता को स्पष्ट किया। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध व 19वीं सदी के प्रारम्भिक काल में राजनीति विज्ञान व अन्य समाज विज्ञानों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकारने में बाधा आयी क्योंकि इस काल में विभिन्न विज्ञानों द्वारा अपने को पूर्ण एवं स्वतंत्र विज्ञान मानने पर बल दिया गया। किन्तु 19वीं सदी के मध्यकाल से पुनः इस तथ्य को स्वीकारा जाने लगा कि सभी समाज विज्ञानों में घनिष्ठ सम्बन्ध होते है। [[कार्ल मार्क्स]] एवं [[आगस्त काम्टे]] ने सामाजिक विज्ञानों की घनिष्ठता पर बल दिया।
 
20 वीं सदी के प्रारम्भ के साथ ही राजनीति विज्ञान की अन्य विज्ञानों से घनिष्ठता प्रायः निर्विवाद रूप से स्वीकारी जाने लगी। व्यवहारवाद एवं उत्तर-व्यवहारवाद ने अन्तर-अनुशासनात्मक अध्ययन की अनिवार्यता को स्थापित किया। इस विकास में अमेरिकी राजनीति विज्ञानियों, विशेषकर शिकागो स्कूल के राजनीति विज्ञानियों, का प्रमुख योगदान रहा है। केटलिन, चार्ल्स मेरियम, गॉस्वेल, लासवेल, डेविड ईस्टन, स्टुअर्ट राइस, वी.ओ. की। (जूनियर) आदि ने अनुभववादी प्रमाणों के आधार पर अन्तर-अनुशासनात्मक अध्ययनों को पुख्ता किया। पॉल जेनेट ने लिखा है-
:’’राजनीति शास्त्र का राजनीतिक अर्थव्यवस्था या [[अर्थशास्त्र]] से गहरा सम्बन्ध है’, इसका [[विधि|कानून]] से सम्बन्ध है चाहे वह प्राकृतिक हो या मानवीय जो कि नागरिकों के आपसी संबन्धों को नियमित करता है, वह [[इतिहास]] से सम्बन्धित है जो कि इसको आवश्यकता के अनुसार ’तथ्य’ देता है, इसका ‘तत्व ज्ञान’ या [[दर्शनशास्त्र]] और विशेषकर नैतिकता या आचार से सम्बन्ध है जो कि इसको ‘सिद्धान्त’ देता है।
 
सारांश यह है कि समाजशास्त्रों में पारस्परिक अर्न्तनिर्भरता पायी जाती है। कोई भी एक समाज विज्ञान समाज
का उचित एवं समग्र अध्ययन नहीं कर सकता। इसलिए तमाम समाजशास्त्र आपस में सम्बन्धित हैं और अन्तर्शास्त्रीय अध्ययन पद्धति ने फिर से समाजशास्त्रों के इस सम्बन्ध को उभार दिया है। आज [[राजनीतिक अर्थशास्त्र|राजनैतिक अर्थशास्त्र]] (पॉलिटिकल इकोनॉमी), राजनैतिक नैतिकता (पॉलिटिकल मौरेलिटी), राजनैतिक इतिहास (पॉलिटिकल हिस्ट्री), राजनैतिक समाजशास्त्र (पॉलिटिकल सोशियोलॉजी), राजनैतिक मनोविज्ञान (पॉलिटिकल साइकोलॉजी), तथा [[राजनीतिक भूगोल|राजनैतिक भूगोल]] (political geography) आदि विभिन्न राजनीति विज्ञान की नई शाखाओं का खुलना इस बात का प्रतीक है कि राजनीति विज्ञान अन्य समाज विज्ञानों से सम्बन्ध स्थापित किये बिना नहीं चल
सकता।
 
== इन्हें भी देखें==
*[[राजनीतिक दर्शन|राजनीतिक सिद्धान्त]]
*[[राजनीति]]
*[[राज्य]]
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