"वाप्पला पंगुन्नि मेनन": अवतरणों में अंतर

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==भारत विभाजन==
मेनन भारत के आखरी वाइसराय माउण्ट बैटन के राजनीतिक सलाहकार थे। [[मुस्लिम लीग]] और कॉँँग्रेस के बीच के होड की वजह से जब अंतरिम सरकार गिर गई , तब मेनन ने ही [[जवाहरलाल नेहरू]], [[वल्लभ भाई पटेल|सरदार वल्लभभाई पटेल]], और माउन्ट बैटन को [[मोहम्मद अली जिन्नाह|मुहम्मद अली जिन्ना]] के माँग के हिसाब से बंटवारे का प्रस्ताव रखा। मेनन की उपाय कुशलता से सरदार पटेल काफी प्रभावित हुए थे। सरदार पटेल आगे चलकर भारत के उप-प्रधानमंत्री बने।
 
[[जोधपुर]] के राजा हनवन्त सिंह और मौंट्बैट्न के बीच के बैठ्क् में मेनन भी उपस्थित थे। इसी भेंट में ही परिग्रहण साधन पर हस्ताक्षर किए गए थे।
मेनन पटेल से करीब रहकर, ५६५ राज्यों का भारत से जोडने के काम में उनका हाथ ब्ँटाया। परमसत्ता का स्थानांतरन जब विसरोई द्वारा होने को था, तब मेनन ने पटेल को निर्देश दिया कि राजाओं को अगर प्रतिरक्षा और विदेशकार्य के साथ अगर संप्रेषन का भी भागडोर अगर भारत सरकार को मिल जाएँ, तो एकीकरन का काम आसान हो सकता है। इसमें मौंटबैटन की सहायता लेने की भी उसने सलाह दी।पटेल के नीचे सचिव होते, राज्यों के एकीकरन के वक्त देनेवालली पटेल का बयान, मेनन ने ही तैयार किया था। अमरीका के राष्ट्रपति श्री एब्रहाम लिंकन से प्रभावित ये बयान अत्यंत रोचक है। वे अपने कूट्नीतिक कौशल का उपयोग करके, अनिच्छुक राजाओं को मनाकर राज्य मंत्राल्य के साथ अनेकों योजनाओं पर हस्ताक्षर करने में सक्षम रहें। विसरोई के नीचे काम करते वक्त भी मेनन, राज्यों को स्वत्ंत्र स्तर देने के खिलाफ था।एसी योजना पर उन्होंने इस्तीफा देने की धमकी दी थी। विसरोई की पत्नी द्वारा मनाने पर ही मेनन अपनी पदवी छोडे नहीं। मेनन के कौशल पर विश्वास होने के कारण,कभी-कभी अपने निर्देशों को पार करके काम करने पर भी पटेल मेनन के योजनओं को ठुकराते नहीं थे।<br />
 
मेनन ने [[जूनागढ़|जूनागढ]] और [[हैदराबाद]] जैसे राज्यों का भारत से मेल वाले जोखिम् भरा काम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई एवं नेह्रू और पटेल को कशमीर समस्या के उपरांत [[पाकिस्तान]] के साथ स्ंपर्क रख्नने की सलाह दी।मंत्रिमंडल ने कशमीर के मामले की सुझाव के लिए १९४७ में मेनन को ही चुना था। विस्रोई मौंट्बैटन मेनन को "नाइट की पदवी" से पुरस्कृत करना चाहते थे,पर्ंतु नए सरकार के सेवक होते हुए, इस उपाधि का स्वीकार करना, मेनन को सही नहीं लगा।
 
==उत्तर काल==
 
पटेल और मेनन के बीच की रिश्ता अमूल्य था। मेनन, पटेल के बाए हाथ जैसे था और स्वतंत्र भारत के एकता में महत्त्वपूर्ण योगदान निभा चुके है।हर राजनीतिज्ं, अंग्रेज सरकार के नीचे काम करनेवाले प्रशासन कर्मचारियों से असहनुभूतिपूर्ण थे। कुछ काँग्रेस कर्म्चारी प्रशासन सेवा को वंचित करना चाहते थे, क्योंकि उनके गिरफ्तारी में इन्हीं अफ्सरों का हाथ था। पंडित नेहरु को तक प्र्शासन कर्मचारियों से ज्यादा प्यार नहीं था। लेकिन मेनन को सन १९५१ ओडिशा के राज्यपाल का स्थान दिया गया। कुछ समय वे वित्त आयोग के सदस्य भी रह चुके हैं। पटेल के देहांत के बाद, मेनन नव-निर्मित भारतीय प्रशासन सेवा से इस्तीफा ले लिए। <br />
उन्होने उसके पश्चात , भारतीय एकीकरण पर एक किताब की रचना की, जो एकीकरण,सत्ता का स्थानांतरण और बटवारे का सजीव चित्रण था। बाद में वे "स्व्तंत्र पार्टी" के सद्स्य हो गए। स्वतंत्र भारत के शांतिपूर्ण अवस्था में मेनन का बहुत बडा हाथ है। अगर शिमला में मेनन ने भिन्न राष्ट्रों को मौंट्बैटन के सहयोग के साथ केन्द्र सरकार से जोड्ने की योजना नहीं बनाया होता, तो भारत का नक्षा आज कुछ और ही होता। [[अंग्रेज़|अंग्रेज]] सरकार की अनुक्र्मांकित समाज में, मेनन जैसे मामूली वातावरन से आकर सरकार के सबसे ऊँचे श्रेणियों पर पहुँचनेवाला शायद ही कोई है। आश्चर्य की बात यह है कि किसी ने भी आज तक इनकी आत्मकथा लिखी नहीं है। सेवा निर्वृत्ति के बाद मेनन [[बंगलौर|बेंगालुरु]] में रह्ने लगे।१९६६ में उनकी देहांत हुई।
 
==कलात्मक चित्रण==
85,949

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