"तड़ित" के अवतरणों में अंतर

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== परिचय एवं इतिहास ==
[[चित्र:Global_Lightning_Frequency.png|right|thumb|400px|विश्व के विभिन्न भागों में तड़ित की बारम्बारता]]
संभवत: अन्य किसी भी प्राकृतिक घटना ने इतना भय, रोमांच और आश्चर्य नहीं उत्पन्न किया होगा और न आज भी करती होगी जितना तड़ितपात और [[बादल|बादलों]] की कड़क से उत्पन्न होता है। अनादि काल से संसार के प्राय: सभी देशों में यह विश्वास प्रचलित था कि तड़ित ईश्वर का दंड है, जिसका प्रहार वह उस प्राणी अथवा वस्तु पर करता है जिसके ऊपर वह कुपित हो जाता है। ग्रीक और रोमन देशवासी इसे भगवान जुपिटर का प्रहारदंड मान ते थे। आज भी बहुत से लोग ऐसा ही समझते हैं और तड़ित के वैज्ञानिक कारण को समझने की चेष्टा करने के बदले चिरपोषित अंधविश्वास पर ही अधिक भरोसा करते हैं। प्राचीन धर्मग्रथों में वर्णित अनेक कथाएँ उनके इस अंधविश्वास को बल देती हैं।
 
विद्युत संबंधी जानकारियों में कुछ वृद्धि होने पर वैज्ञानिकों की यह धारणा बनी कि साधारण तौर पर तड़ित की घटना ठीक उसी प्रकार की होती है जैसा संघनित्र (condenser) को अनाविष्ट (discharge) करते समय उसके प्लेटों के बीच वायु में से होकर स्फुलिंगों का प्रवाह होता है। इस धारणा की पुष्टि करने के लिये प्रयोग करने का साहस किसी को नहीं होता था; किन्तु अन्त में [[बेंजामिन फ्रैंकलिन]] (Benjamin Franklin) की प्रेरणा से फ्रांस के दो वैज्ञानिकों, डालिबार्ड (Dalibard) और डेलॉर (Delor), ने प्रयोग करने का निश्चय किया। उन्होंने धातु के दो छड़ लिए। डालिबार्ड का छड़ ४० फुट तथा डेलॉर का छड़ ९९ फूट ऊँचा था। दोनों ही छड़ों से वे लगभग डेढ़ इंच लंबाई तक के स्फुलिंगों का विसर्जन करा सकने में सफल हुए। यह प्रयोग अन्यंत खतरनाक था और आगे चलकर एक अन्य वैज्ञानिक ने यही प्रयोग दोहराते समय अपने प्राणों से ही हाथ धोया था।
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