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गुरु जम्भेश्वर भगवान
 
'''बिश्नोई''' [[हिन्दू धर्म]] के अंदर एक प्रकृति प्रेमी पंथ है। इस पंथ के संस्थापक [[जाम्भोजी महाराज]] है। बिश्नोई पंथ में दीक्षित (अपनाने) होने वाले जाट तथा अन्य जाति के व्यक्ति थे। श्री गुरू जाम्भोजी महाराज द्वारा बताये [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियमो] का पालन करने वाला बिश्नोई है। यानी बीस+नौ=बिश्नोई। बिश्नोई शुध्द [[शाकाहार|शाकाहारी]] हैं। बिशनोई [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियमो] पर चलते है। बिश्नोई समाज की [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/the-great-khejarli-scarifice.html [पर्यावरण संरक्षण]] और वन्य जीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है।ओर 29 नियम बनाए जिसमे पहला नियम सवेरे सूर्य उदय से पहले स्नान करना हैहै।
 
==समाज की स्थापना==
:'' कलिकाल वेद अर्थवण, सहज पंथ चलावियो।
:'' संभराथल जोत जागी, जग विणण आवियो।
जाम्भोजी से पाहल लेकर सर्वप्रथम बिश्नोई बनने वालों में पूल्होजी पंवार थे। ये [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियम] बिश्नोई समाज की आचार संहिता है। बिश्नोई समाज आज तक इन नियमों का पूरी दृढ़ता से पालन करता आ रहा है। बिश्नोई बनाने का यह कार्य अष्टमी से लेकर कार्तिक अमावस (दीपावली) तक निरंतर चलता रहा। महात्मा साहबरामजी ने जम्भसार के आठवें प्रकरण में लिखा है-
 
जाम्भोजी से पाहल लेकर सर्वप्रथम बिश्नोई बनने वालों में पूल्होजी पंवार थे। ये [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियम] बिश्नोई समाज की आचार संहिता है। बिश्नोई समाज आज तक इन नियमों का पूरी दृढ़ता से पालन करता आ रहा है। बिश्नोई बनाने का यह कार्य अष्टमी से लेकर कार्तिक अमावस (दीपावली) तक निरंतर चलता रहा। महात्मा साहबरामजी ने जम्भसार के आठवें प्रकरण में लिखा है-
:'' आदि अष्टमी अंत अमावस च्यार वरण को किया तपावस।
:'' दीपावली कै प्रात: ही काला बारहि कोड़ कटे जमजाला।।