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गुरु जम्भेश्वर भगवान
 
'''बिश्नोई''' [[हिन्दू धर्म]] के अंदर एक प्रकृति प्रेमी पंथ है। इस पंथ के संस्थापक [[जाम्भोजी महाराज]] है। बिश्नोई पंथ में दीक्षित (अपनाने) होने वाले जाट तथा अन्य जाति के व्यक्ति थे। श्री गुरू जाम्भोजी महाराज द्वारा बताये [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियमो]नियमों का पालन करने वाला बिश्नोई है। यानी बीस+नौ=बिश्नोई। बिश्नोई शुध्द [[शाकाहार|शाकाहारी]] हैं। बिशनोई [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियमो] पर चलते है। बिश्नोई समाज की [[पर्यावरण संरक्षण]] और वन्य जीव संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है।
 
==समाज की स्थापना==
;बिश्नोई धर्म का प्रवर्तन (सम्वत् 1542)
सम्वत् 1542 तक जाम्भोजी की कीर्ति चारों और फेल गई और अनेक लोग उनके पास आने लगे व सत्संग का लाभ उठाने लगे। इसी साल राजस्थान में भयंकर अकाल पड़ा। इस विकट स्थिति में जाम्भोजी महाराज ने अकाल पीडि़तों की अन्न व धन्न से भरपूर सहायता की। जो लोग संभराथल पर सहायत हेतु उनके पास आते, जांभोजी महाराज अपने अखूठ (अकूत) भण्डार से लोगों को अन्न धन्न देते। जितने भी लोग उनके पास आते, वे सब अपनी जरूरत अनुसार अन्न जले जाते। सम्वत् 1542 की कार्तिक बदी 8 को जांभोजी महाराज ने एक विराट यज्ञ का आयोजन सम्भराथल धोरे पर किया, जिसमें सभी जाति व वर्ग के असंख्य लोग शामिल हुए।ज्यादातर बिश्नोई [[जाट]] से बने हैं जिन्हें बिश्नोई जाट भी कहा जाता है। गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इसी दिन कार्तिक बदी 8 को सम्भराल पर स्नान कर हाथ में माला औरमुख से जप करते हुए कलश-स्थापन कर पाहल (अभिमंत्रित जल) बनाया और [https://www.bishnoimirror.in/2020/02/twenty-nine-rules.html 29 नियमों] की दीक्षा एवं पाहल देकर बिश्नोई धर्म की स्थापना की। इस विषय में कवि सुरजनजी पूनियां लिखते हैं{{citation needed}}-
:'' करिमाला मुख जाप करि, सोह मेटियो कुथानं।
:'' पहली कलस परठियौ, सझय ब्रह्मांण सिनान।।