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[[चित्र:Sharada Temple Maihar.JPG|thumb|देवी माँ शारदा मंदिर]]
[[चित्र:View from Sharda temple Maihar2.JPG|thumb|शारदा मन्दिर से आल्हा-उदल जलाशय]]
'''मैहर''' [[मध्य प्रदेश]] का ज़िला है। यह एक प्रसिद्ध [[हिन्दू]] [[तीर्थ]] स्थल है। मैहर में मां शारदा का भव्य मंदिर है इस मंदिर को शक्तिपीठों में एक माना जाता है इस मंदिर के कारण है मैहर का नाम बहुत प्रसिद्ध है। हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों के लिए यह धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है नवरात्रि के समय यहां पर भक्त जनों की अपार भीड़ होती है। इन्हीं के नाम से एक बहुत प्रसिद्ध विद्यालय खुला है जो कि बहुत प्रसिद्ध है जिसका नाम माँ शारदा धनराजी देवी इंटर कॉलेज है जो कि उत्तर प्रदेश के भदोही के दवनपुर में स्थित है । मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर ह जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 [[शक्ति पीठ]]ों में से एक है। यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर [[परमाल रासो|आल्हखण्ड]] के नायक [[आल्हा]] व [[ऊदल]] दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है।
 
यहाँ प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों [[नवरात्रि|नवरात्रों]] में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं। मां शारदा के बगल में प्रतिष्ठापित नरसिंहदेव जी की पाषाण मूर्ति आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है।
 
== उत्पत्ति ==
[[ब्रह्मा|ब्रह्माजी]] के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह [[मनु|स्वायम्भुव मनु]] की पुत्री [[प्रसूति]] से हुआ था। प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का [[अग्नि देव]] के साथ, स्वधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, [[सती]] नामक एक कन्या का भगवान [[शिव|शंकर]] के साथ और शेष तेरह कन्याओं का [[धर्म]] के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।
हिंदू धर्म के सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की पुत्री सती का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ एक बार दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को नीचा दिखाने के उद्देश्य से एक यज्ञ का आयोजन किया और उसमें भगवान शंकर को आमंत्रण नहीं दिया जब यह बात सती को पता चली तो उन्होंने भगवान शंकर से दक्ष प्रजापति के यज्ञ में जाने की बात कही भगवान शंकर के मना करने पर भी सती नहीं मानी और वह बिना बुलाए ही अपने पिता के घर अर्थात दक्ष प्रजापति के यज्ञ में पहुंच गई किंतु वहां पर सभी देवताओं का स्थान तो था परंतु भगवान शंकर का कोई भी स्थान निश्चित नहीं था उनको कोई भी मान सम्मान नहीं दिया गया इस बात से क्रुद्ध होकर सती ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया इस बात का पता जब भगवान शंकर को चला तो भगवान शंकर ने अपने गणों को भेज कर यज्ञ को ध्वस्त कर दिया और देवी सती के सब को लेकर तांडव करने लगे यह बात जब भगवान नारायण को पता चली तब उन्होंने भगवान शंकर को इस दुख से बाहर निकालने के लिए क्षति के शरीर के सुदर्शन चक्र से टुकड़े कर दिए यह सारे टुकड़े भारतवर्ष के अलग-अलग स्थानों पर गिरे जिन स्थानों पर भी सती के शव के जो भी अंग गिरे उन्हीं से उनका नामकरण हुआ और वहां पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई इसी सिलसिले में कहा जाता है कि सती के गले का हार मैहर में गिरा था इसलिए यहां पर मैहर में शारदा मां का मंदिर है।
 
== सती का जन्म, विवाह तथा दक्ष-शिव-वैमनस्य ==