"ईश्वर" के अवतरणों में अंतर

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{{एक स्रोत}}
'''परमेश्वर''' वह सर्वोच्च परालौकिक शक्ति है जिसे इस [[ब्रह्माण्ड|संसार]] का सृष्टा और शासक माना जाता है। हिन्दी में परमेश्वर को [[भगवान]], [[परमात्मा]] या [[परमेश्वर]] भी कहते हैं। अधिकतर धर्मों में परमेश्वर की परिकल्पना [[ब्रह्माण्ड]] की संरचना से जुड़ी हुई है।
[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] की ईश् [[धातु]] का अर्थ है- नियंत्रित करना और इस पर वरच् प्रत्यय लगाकर यह शब्द बना है। इस प्रकार मूल रूप में यह शब्द नियंता के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इसी धातु से समानार्थी शब्द ईश व ईशिता बने हैं।<ref>{{ Citation
हम अपने आसपास जिस प्रकृति सृष्टि और ब्रह्मांड को देखते हैं और हमारे आसपास जो भी घटनाएं घटित होती हैं उन सब का कारक एक परम सकता है या यू कहें यह हमारे सृष्टि में या वातावरण में जो भी प्रकट होता है या होने वाला है या हो रहा है उन सब के पीछे कोई एक परम सत्ता कोई एक परम तत्व कार्य करता है वही परम शक्ति परम तत्व ईश्वर है।
 
हमें यह तो मानना पड़ेगा किस समस्त मानव जाति और समस्त व्यस्त हो किसी न किसी परम सकता यह परम शक्ति के द्वारा ही नियंत्रित होता है इस विश्व में जो भी घटनाएं घटित होती हैं उसके पीछे किसी न किसी शक्ति का हाथ अवश्य है उस शक्ति के द्वारा ही निर्माण विकास और विनाश को नियंत्रित किया जाता है वही शक्ति हट पर व्याप्त है ‌।
 
संपूर्ण सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का तत्व व्याप्त रहता है चाहे वह सजीव हो या निर्जीव उस तत्व में ईश्वर का तत्व किसी न किसी रूप में उपस्थित रहता है ईश्वर ही अपने अंश के द्वारा इस सृष्टि में प्रत्येक घटने वाली घटनाओं का कारक है हम अपने आसपास जो भी देखते हैं चाहे वह प्रकृति हो या उसमें उपस्थित कोई भी तत्व हो उसमें ईश्वर विद्यमान रहता है।
 
संपूर्ण प्रकृति पेड़ पौधे जीव जंतु जीव सजीव ग्रह उपग्रह सूर्य चंद्रमा तारे और प्रकृति के मुख्य तत्व जल थल वायु अग्नि आकाश यह सभी ईश्वरी तत्व है।
ईश्वर हर जगह विद्यमान है वह हर तत्व में में मौजूद रहता है चाहे वह जीव हो या सजीव या निर्जीव यदि हम बात करें ईश्वर की अनुभूति कैसे हो तो उसके लिए आपको प्रकृति के समीप जाना पड़ेगा आप महसूस कीजिए आप अकेले बैठे हुए हैं और आपके सामने हरा भरा जंगल पहाड़ नदियां है उन्हें देखकर आप अपने आप को भूल जाते हैं यह ईश्वर ही तत्व है यही उसके होने का एहसास है। जब आप पृथ्वी पर चलते हैं तो क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे आप अपनी मां की गोद में उछल कूद कर रहे हो। जब हवा का स्पर्श आपके शरीर को छूता है तो वह ईश्वर का ही स्पर्श है मानो ईश्वर अपने हाथों से आपका स्पर्श कर रहा है। यह सब ईश्वर के प्रगट माध्यम और यही ईश्वर है इन्हीं परम सत्ता का जो रचयिता है वह ईश्वर है।
 
हम और आप ईश्वर का ही अंश है इस सृष्टि के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है बस आवश्यकता है उसे महसूस करने की उसे जानने की उसे पहचानने की। ईश्वर ने हमें सब कुछ दिया है यह पृथ्वी जीवन यापन के लिए जंगल पहाड़ फल फूल सब ईश्वर की ही दें। ईश्वर के द्वारा सूरज के माध्यम से प्रकाश का देना फिर रात का होना फिर रात में चंद्रमा के द्वारा प्रकाश देना यह सब उसकी ही व्यवस्था है यह उसका ही एहसास है ईश्वर हर पल हमारे पास रहता है हम बस उसे महसूस नहीं कर पाते हर पल हम उसकी गोद में ही रहते हैं फिर भी हम ईश्वर के एहसास को यह ईश्वर को पहचान नहीं पाते हमें लगता है कि ईश्वर कोई हम जैसा ही शरीर वाला होगा ऐसा नहीं है ईश्वर को जानने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम प्रकृति के करीब होना है आप जितना प्रकृति के करीब जाएंगे उतना ईश्वर के करीब होते जाएंगे जिस दिन आप संपूर्ण रूप से प्रकृति को जान लेंगे प्रकृति के रहस्यों को समझ लेंगे आप समझ लीजिए आपने ईश्वर को पा लिया लेकिन यह सब इतना आसान नहीं मानव ईश्वर द्वारा निर्मित इस ब्रह्मांड की बहुत एक छोटी सी कृति है मानव भले ही सर्वश्रेष्ठ हो लेकिन ईश्वर परम श्रेष्ठ है मानव के द्वारा ईश्वर को समझ पाना बहुत ही मुश्किल है हम बहुत कुछ हद तक उसके एहसास को समझ सकते हैं जिस तरह हम हवा को महसूस तो कर सकते हैं लेकिन उसे देख नहीं सकते ठीक इसी तरह हम ईश्वर द्वारा बनाए गए सृष्टि ब्रह्मांड को देख तो सकते हैं महसूस कर सकते हैं परंतु उसके पीछे के सत्य को जानना अभी बाकी है।
 
जिस दिन आप स्वयं को ईश्वर के अधीन कर देंगे उसी दिन ईश्वर और आपके बीच का फर्क समाप्त हो जाएगा।
 
<ref>{{ Citation
| last1=आप्टे
| first1=वामन शिवराम
 
{{मुख्य|नास्तिकता}}
जो लोग ईश्वर में आस्था नहीं रखते वह नास्तिक कहलाते हैं। यह जरूरी नहीं कि सभी लोग ईश्वर में आस्था ही रखें ईश्वर को अपना अस्तित्व साबित करने के लिए किसी की आवश्यकता नहीं है।
 
[[नास्तिक]] लोग और नास्तिक दर्शन ईश्वर को झूठ मानते हैं। परन्तु ईश्वर है या नहीं इस पर कोई ठोस तर्क नहीं दे सकता।