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चार्वाक का नाम सुनते ही आपको ‘यदा जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्’ (जब तक जीओ सुख से जीओ, उधार लो और घी पीयो।) की याद आएगी। प्रचलित धारणा यही है कि चार्वाक शब्द की उत्पत्ति ‘चारु’+’वाक्’ (मीठी बोली बोलने वाले) से हुई है। चार्वाक सिद्धांतों के लिए बौद्ध पिटकों में ‘लोकायत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका मतलब ‘दर्शन की वह प्रणाली है जो जो इस लोक में विश्वास करती है और स्वर्ग, नरक अथवा मुक्ति की अवधारणा में विश्वास नहीं रखती’। चार्वाक या लोकायत दर्शन का ज़िक्र तो महाभारत में भी मिलता है लेकिन इसका कोई भी मूल ग्रन्थ उपलब्ध नहीं।
 
[[सर्वदर्शनसंग्रह]] में चार्वाक का मत दिया हुआ मिलता है। [[पद्म पुराण|पद्मपुराण]] में लिखा है कि असुरों को बहकाने के लिये बृहस्पति ने वेदविरुद्ध मत प्रकट किया था। नास्तिक मत के संबध में [[विष्णु पुराण|विष्णुपुराण]] में लिखा है कि जब धर्मबल से दैत्य बहुत प्रबल हुए तब देवताओं ने [[विष्णु]] के यहाँ पुकार की। विष्णु ने अपने शरीर से मायामोह नामक एक पुरुष उत्पन्न किया जिसने [[नर्मदा नदी|नर्मदा]] तट पर दिगबंर रूप में जाकर तप करते हुए असुरों को बहकाकर धर्ममार्ग में भ्रष्ट किया। मायामोह ने असुरों को जो उपदेश किया वह सर्वदर्शनसंग्रह में दिए हुए चार्वाक मत के श्लोकों से बिलकुल मिलता है। [[लिङ्ग पुराण|लिंगपुराण]] में त्रिपुरविनाश के प्रसंग में भी शिवप्रेरित एक दिगंबर मुनि द्वारा असुरों के इसी प्रकार बहकाए जाने की कथा लिखी है जिसका लक्ष्य [[जैन धर्म|जैनों]] पर जान पड़ता है। [[वाल्मीकि रामायण]] अयोध्या कांड में महर्षि जावालि ने रामचंद्र को वनवास छोड़ अयोध्या लौट जाने के लिये जो उपदेश दिया है वह भी चार्वाक के मत से बिलकुल मिलता है। इन सब बातों से सिद्ध होता है कि नास्तिकनिरीश्वरवादी मत बहुत प्राचीन है। इसकासांख्य अविर्भावदर्शन, उसीजो समयएक मेंआस्तिक समझनादर्शन चाहिएहैं, जववह वैदिकभी कर्मकांड़ोंनिरीश्वरवादी की अधिकता लोगों को कुछ खटकनेमत लगीहैं। थी।
 
चार्वाक ईश्वर और परलोक नहीं मानते। परलोक न मानने के कारण ही इनके दर्शन को '''[[चार्वाक दर्शन|लोकायत]]''' भी कहते हैं। सर्वदर्शनसंग्रह में चार्वाक के मत से सुख ही इस जीवन का प्रधान लक्ष्य है [[सुखवाद]]। संसार में दुःख भी है, यह समझकर जो सुख नहीं भोगना चाहते, वे मूर्ख हैं। मछली में काँटे होते हैं तो क्या इससे कोई मछली ही न खाय ? चौपाए खेत पर जायँगे, इस डर से क्या कोई खेत ही न बोवे ? इत्यादि। चार्वाक आत्मा को पृथक् कोई पदार्थ नहीं मानते [[अनात्मवाद]]। उनके मत से जिस प्रकार गुड़, तंडुल आदि के संयोग से [[मदिरा|मद्य]] में मादकता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन चार भूतों के संयोगविशेष से चेतनता उत्पन्न हो जाती है[[भूतचैतन्यवाद]]। इनके विश्लेषण या विनाश से 'मैं' अर्थात् चेतनता का भी नाश हो जाता है। इस चेतन शरीर के नाम के पीछे फिर पुनरागमन आदि नहीं होता। ईश्वर, परलोक आदि विषय अनुमान के आधार पर हैं जिनकी कोइ वस्तुगत अस्तित्व नही है।[[अनीश्वरवादी और इहलौकिकवादी]]।
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