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ऑपरेशन पवन (संक्षेप मे): ऑपरेशन पवन ,पेरन पावन, लिट। "ऑपरेशन विंड") तमिल ईलम (LTTE) के लिबरेशन टाइगर्स से जाफना को नियंत्रित करने के लिए इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) द्वारा ऑपरेशन को सौंपा गया कोड नाम था, तमिल टाइगर्स के रूप में बेहतर जाना जाता है, 1987 के अंत में लिट्टे के निरस्त्रीकरण को भारत-श्रीलंका समझौते के एक हिस्से के रूप में लागू करने के लिए। लगभग तीन सप्ताह तक चली क्रूर लड़ाई में, आईपीकेएफ ने लिट्टे से जाफना प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में ले लिया, कुछ ऐसा जो श्रीलंका की सेना ने किया था लेकिन करने में असफल रही। भारतीय सेना के टैंक, हेलीकॉप्टर गनशिप और भारी तोपखाने द्वारा समर्थित, IPKF ने 214 सैनिकों की कीमत पर LTTE को पार किया!
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'''ऑपरेशन पवन''' (संक्षेप मे): ऑपरेशन पवन ,पेरन पावन, लिट। "ऑपरेशन विंड") तमिल ईलम (LTTE) के लिबरेशन टाइगर्स से जाफना को नियंत्रित करने के लिए इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) द्वारा ऑपरेशन को सौंपा गया कोड नाम था, तमिल टाइगर्स के रूप में बेहतर जाना जाता है, 1987 के अंत में लिट्टे के निरस्त्रीकरण को भारत-श्रीलंका समझौते के एक हिस्से के रूप में लागू करने के लिए। लगभग तीन सप्ताह तक चली क्रूर लड़ाई में, आईपीकेएफ ने लिट्टे से जाफना प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में ले लिया, कुछ ऐसा जो श्रीलंका की सेना ने किया था लेकिन करने में असफल रही। भारतीय सेना के टैंक, हेलीकॉप्टर गनशिप और भारी तोपखाने द्वारा समर्थित, IPKF ने 214 सैनिकों की कीमत पर LTTE को पार किया!
 
(विस्तार से):11 अक्टूबर, 1987 दिन बहुत खास है। यही वो दिन है जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन पवन चलाया था। बता दें कि यह ऑपरेशन न तो पाकिस्तान के खिलाफ था, न चीन के खिलाफ और न ही यह नगा विद्रोहियों या नक्सलियों के खिलाफ था। भारतीय सेना ने यह ऑपरेशन था श्रीलंका में साल 1987 में चलाया था।
 
 
दरअसल 11 अक्टूबर, 1987 को भारतीय शांति सेना ने श्रीलंका में जाफना को लिट्टे के कब्जे से मुक्त कराने के लिए ऑपरेशन पवन शुरू किया था। इसकी पृष्ठभूमि में भारत और श्रीलंका के बीच 29 जुलाई 1987 को हुआ वह शांति समझौता था, जिसमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जे.आर. जयवद्धने ने हस्ताक्षर किया था। समझौते के अनुसार, श्रीलंका में जारी गृहयुद्ध को खत्म करना था, इसके लिए श्रीलंका सरकार तमिल बहुत क्षेत्रों से सेना को बैरकों में बुलाने और नागरिक सत्ता को बहाल करने पर राजी हो गई थी। वहीं, दूसरी ओर तमिल विद्रोहियों के आत्मसमर्पण की बात हुई, लेकिन इस समझौते की बैठक में तमिल व्रिदोहियों को शामिल नहीं किया गया था।
 
 
श्रीलंका में शांति भंग की समस्या की जड़ में वहां के निवासी सिंघली तथा तमिलों के बीच का द्वंद्व था। तमिल लोग वहां पर अल्पसंख्यकों के रूप में बसे हैं। आंकड़े बताते हैं कि श्रीलंका की कुल आबादी का केवल 18 फीसद हिस्सा ही तमिल हैं और श्रीलंका की सिंघली बहुल सरकार की ओर से तमिलों के हितों की अनदेखी होती रही है। इससे तमिलों में असंतोष की भावना इतनी भरती गई कि उसने विद्रोह का रूप ले लिया और वह स्वतंत्र राज्य तमिल ईलम की मांग के साथ उग्र हो गए।
 
श्रीलंका सरकार ने तमिल ईलम की इस मांग को न सिर्फ नजरअंदाज किया, बल्कि तमिलों के असंतोष को सेना के दम पर दबाने का प्रयास करने लगी। इस दमन चक्र का परिणाम यह हुआ कि श्रीलंका से तमिल नागरिक बतौर शरणार्थी भारत के तमिलनाडु में भागकर आने लगे। यह स्थिति भारत के लिए अनुकूल नहीं थी। इसीलिए श्रीलंका के साथ हुए समझौते में इंडियन पीस कीपिंग फोर्स का श्रीलंका जाना तय हुआ, जहां वह तमिल उग्रवादियों का सामना करते हुए वहां शांति बनाने का काम करें, ताकि श्रीलंका से भारत की ओर शरणार्थियों का आना रुक जाए।
 
 
भारतीय शांति सेना ने सभी उग्रवादियों से हथियार डालने का दबाव बनाया, जिसमें वह काफी हद तक सफल भी हुई, लेकिन तमिल ईलम का उग्रवादी संगठन लिट्टे यानी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम ने धोखा किया। उसने पूरी तरह से हथियार न डालकर अपनी नीति बदल ली और उन्होंने आत्मघाती दस्तों का गठन करके गोरिल्ला युद्ध की कला को अपना लिया। ऐसी स्थिति में भारत की शांति सेना की भूमिका बदल गई। खुद को टाइगर्स के हमले से बचने के लिए उन्हें भी सतर्क योद्धा का तरीका अपनाना पड़ा और वहां युद्ध जैसी स्थिति आने से बच नहीं पाई।
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