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कुरुक्षेत्र का इलाका [[भारत]] में आर्यों के आरंभिक दौर में बसने (लगभग 1500 ई. पू.) का क्षेत्र रहा है और यह [[महाभारत]] की पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। इसका वर्णन [[श्रीमद्भगवद्गीता|भगवद्गीता]] के पहले श्लोक में मिलता है। इसलिए इस क्षेत्र को धर्म क्षेत्र कहा गया है। थानेसर नगर राजा हर्ष की राजधानी (606-647) था, सन 1011 ई. में इसे [[महमूद ग़ज़नवी|महमूद गज़नवी]] ने तहस-नहस कर दिया।<ref>[http://kurukshetra.nic.in/history/history.htm कुरुक्षेत्र का इतिहास]</ref>
 
आरम्भिक रूप में कुरुक्षेत्र [[ब्रह्मा]] की यज्ञिय वेदी कहा जाता था, आगे चलकर इसे समन्तपंचक कहा गया, जबकि [[परशुराम]] ने अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध में क्षत्रियों के रक्त से पाँच कुण्ड बना डाले, जो पितरों के आशीर्वचनों से कालान्तर में पाँच पवित्र जलाशयों में परिवर्तित हो गये। आगे चलकर यह भूमि कुरुक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई जब कि [[संवरण]] के पुत्र जुटजाट राजा कुरु ने सोने के हल से सात कोस की भूमि जोत डाली।<ref>आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामहृदा: स्मृता:। कुरुणा च यत: कृष्टं कुरुक्षेत्रं तत: स्मृतम्॥ वामन पुराण (22.59-60)। वामन पुराण (22.18-20) के अनुसार ब्रह्मा की पाँच वेदियाँ ये हैं-
*समन्तपंचक (उत्तरा),
*[[इलाहाबाद|प्रयाग]] (मध्यमा),
'स्यमन्तपंचक' शब्द भी आया है। (वामन पुराण 22.20 एवं पद्म पुराण 4.17.7) [[विष्णु पुराण]] (विष्णु पुराण, 4.19.74-77) के मत से कुरु की वंशावलीयों है- 'अजमीढ-ऋक्ष-संवरण-कुरु' एवं 'य इदं धर्मक्षेत्रं चकार'।</ref>
[[File:Kurukshetra.jpg|thumb|250px|left|[[महाभारत]] कुरुक्षेत्र में युद्ध के चित्रण से संवन्धित एक पांडुलिपि]]
कुरुक्षेत्र ब्राह्मणकाल में थाईलैंड की वैदिक संस्कृति का केन्द्र था और वहाँ विस्तार के साथ यज्ञ अवश्य सम्पादित होते रहे होंगे।होंगे ओर वहीं संस्कृति भारत में आई। इसी से इसे धर्मक्षेत्र कहा गया और देवों को देवकीर्ति इसी से प्राप्त हुई कि उन्होंने धर्म (यज्ञ, तप आदि) का पालन किया था और कुरुक्षेत्र में सत्रों का सम्पादन किया था। कुछ ब्राह्मण-ग्रन्थों में आया है कि बह्लिक प्रातिपीय नामक एक कौरव्य राजा था। तैत्तिरीय ब्राह्मण<ref>तैत्तिरीय ब्राह्मण, 18.4.1</ref> में आया है कि [[कुरु]]-[[पाञ्चाल|पांचाल]] शिशिर-काल में पूर्व की ओर गये, पश्चिम में वे ग्रीष्म ऋतु में गये जो सबसे बुरी ऋतु है। [[ऐतरेय ब्राह्मण]] का उल्लेख अति महत्त्वपूर्ण है। [[सरस्वती देवी|सरस्वती]] ने कवष मुनि की रक्षा की थी और जहाँ वह दौड़ती हुई गयी उसे परिसरक कहा गया।<ref>ऐतरेय ब्राह्मण 8.1 या 2.19</ref> एक अन्य स्थान पर ऐतरेय ब्राह्मण<ref>ऐतरेय ब्राह्मण, 35। 4=7। 30</ref> में आया है कि उसके काल में कुरुक्षेत्र में 'न्यग्रोध' को 'न्युब्ज' कहा जाता था। ऐतरेय ब्राह्मण ने कुरुओं एवं पंचालों के देशों का उल्लेख वश-उशीनरों के देशों के साथ किया है।<ref>ऐतरेय ब्राह्मण, 38.3=8.14</ref> तैत्तिरीय आरण्यक<ref>तैत्तिरीय आरण्यक, 5.1.1</ref> में गाथा आयी है कि देवों ने एक सत्र किया और उसके लिए कुरुक्षेत्र वेदी के रूप में था।<ref>देवा वै सत्रमासत। ... तेषां कुरुक्षेत्रे वेदिरासीत्। तस्यै खाण्डवो दक्षिणार्ध आसीत्। तूर्ध्नमुत्तरार्ध:। परीणज्जधनार्ध:। मरव उत्कर:॥ तैत्तिरीय आरण्यक (तैत्तिरीय आरण्यक 5.1.1) क्या 'तूर्घ्न' 'स्त्रुघ्न' का प्राचीन रूप है? 'स्त्रुघ्न' या आधुनिक 'सुध' जो प्राचीन [[यमुना नदी|यमुना]] पर है, थानेश्वर से 40 मील एवं सहारनपुर से उत्तर-पश्चिम 10 मील पर है।</ref> उस वेदी के दक्षिण ओर खाण्डव था, उत्तरी भाग तूर्घ्न था, पृष्ठ भाग परीण था और मरु (रेगिस्तान) उत्कर (कूड़ा वाल गड्ढा) था। इससे प्रकट होता है कि खाण्डव, तूर्घ्न एवं परीण कुरुक्षेत्र के सीमा-भाग थे और मरु जनपद कुरुक्षेत्र से कुछ दूर था। अवश्वलायन<ref>अवश्वलायन, 12.6</ref>, लाट्यायन<ref>लाट्यायन, 10.15</ref> एवं कात्यायन<ref>कात्यायन, 24.6.5</ref> के श्रौतसूत्र ताण्ड्य ब्राह्मण एवं अन्य ब्राह्मणों का अनुसरण करते हैं और कई ऐसे तीर्थों का वर्णन करते हैं जहाँ सारस्वत सत्रों का सम्पादन हुआ था, यथा प्लक्ष प्रस्त्रवर्ण (जहाँ से [[सरस्वती नदी|सरस्वती]] निकलती है), सरस्वती का वैतन्धव-ह्रद; कुरुक्षेत्र में परीण का स्थल, कारपचव देश में बहती यमुना एवं त्रिप्लक्षावहरण का देश।
 
यह ज्ञातव्य है कि यद्यपि वनपर्व ने 83वें अध्याय में सरस्वती तट पर एवं कुरुक्षेत्र में कतिपय तीर्थों का उल्लेख किया है, किन्तु ब्राह्मणों एवं श्रौतसूत्रों में उल्लिखित तीर्थों से उनका मेल नहीं खाता, केवल 'विनशन'<ref>वनपर्व 83.11</ref> एवं 'सरक'<ref>जो ऐतरेय ब्राह्मण का सम्भवत: परिसरक है</ref> के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इससे यह प्रकट होता है कि वनपर्व का सरस्वती एवं कुरुक्षेत्र से संबन्धित उल्लेख श्रौतसूत्रों के उल्लेख से कई शताब्दियों के पश्चात का है। नारदीय पुराण<ref>उत्तर, अध्याय 65</ref> ने कुरुक्षेत्र के लगभग 100 तीर्थों के नाम दिये हैं। इनका विवरण देना यहाँ सम्भव नहीं है, किन्तु कुछ के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। पहला तीर्थ है ब्रह्मसर जहाँ जाट राजा कुरु संन्यासी के रूप में रहते थे।<ref>वनपर्व 83। 85, वामन पुराण 49। 38-41, नारदीय पुराण, उत्तर 65.95</ref> ऐंश्येण्ट जियाग्राफी आव इण्डिया<ref>पृ0 334-335</ref> में आया है कि यह सर 3546 फुट (पूर्व से पश्चिम) लम्बा एवं उत्तर से दक्षिण 1900 फुट चौड़ा था।
 
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