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हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थे। तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जावेंगे। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा। इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें। व्यास जी ने उनका नाम रखा - [[ऋग्वेद]], [[यजुर्वेद]], [[सामवेद संहिता|सामवेद]] और [[अथर्ववेद संहिता|अथर्ववेद]]। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेद व्यास के नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिन, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया। वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवे वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है। <ref>{{Cite web|url=https://himachalabhiabhi.com/culture-and-spirituality/guru-purnima.html|title=वेद व्यास को समर्पित गुरु पूर्णिमा|last=divya|date=2016-07-19|website=Himachal Abhi Abhi|language=en-US|access-date=2020-01-08}}</ref>
 
पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढ़ाया। व्यास जी के शिष्योंने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएँ और उप शाखाएँ बना दीं। व्यास जी ने [[महाभारत]] की रचना की।{{उद्धरण आवश्यकhttps://books.google.co.in/books?id=vL4DhBWJbGIC&lpg=PA1&ots=kzh2vbKGcq&dq=info%3AhinSH1sqwKsJ%3Ascholar.google.com%2F&lr&pg=PR3#v=onepage&q&f=false}}
 
[[File:Ganesa writing the Mahabharat.jpeg|thumb|left|[[गणेश]] महाभारत लिखते हुए।]]
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