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| religion = [[Hinduism]]
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'''राजा राजेन्द्रलाल मित्र''' (1823 या 1824 – 1891) [[भारत]] में जन्में प्रथम आधुनिक [[भारतविद्या|भारतविद]] थे। वे [[बंगाल का नवजागरण|बंगाल के पुनर्जागरण]] के भी अग्रदूत थे।
वे बंगाल के वैज्ञानिक इतिहास के प्रथम रचयिता थे। उन्होने पुरातत्त्वविद के रूप में भी ख्याति अर्जित की थी। वे एक [[बहुज्ञ]] थे।
 
==प्राथमिक जीवन==
राजा राजेन्द्रलाल मित्र का जन्म १६ फरवरी, १८२२ को पूर्वी कलकता के सुरा (वर्तमान समय का बेलियाघाटा) नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता का नाम जन्मजय मित्र था। अपने पिता के छः पुत्रों में से वे तृतीय थे, इसके अलावा उनकी एक बहन भि थीं। राजेन्द्रलाल छोटी उम्र से ही अपनी बिधबा और निःसन्तान मौसी के पास रहकर बड़े हुए।
 
अपनी प्राथमिक शिक्षा बांग्ला की एक ग्राम पाठशाला से लेने के बाद पाथुरियाघाटा के एक गैर-सरकारी अंग्रेजी-माध्यमिक विद्यालय से उन्होने शिक्षा ग्रहण की। लगभग १० वर्ष की उम्र से उन्होने कलकाता के हिन्दु स्कुल में पढ़ना शुरू किया। इसके बाद उनकी शिक्षा दिशाहीन हो गयी। यद्यपि उन्होने १८३७ के दिसम्बर में कलकाता मेडिकल कालेज में प्रवेश ले लिया था, किन्तु १८१४ में किसी विवाद में आने से उन्हें उसे छोड़ना पड़ा। इसके बाद उन्होने कानून की शिक्षा लेना आरम्भ किया किन्तु उसे भी ज्यादा दिन नहीं चला सके। इसके बाद वे भाषा सीखने लगे और उन्होने [[ग्रीक]], [[लातिन]], [[फारसी]], जर्मन का एक साथ अध्ययन शुरू किया। इसका परिणाम हुआ कि वे एक भाषाशास्त्री बन गए।
 
==विवाह==
१८३९ में जब वे १७ वर्ष के थे, उनका विवाह सौदामिनी से हो गया। २२ अगस्त १८४४ को उनकी एक बेटी हुई जिसके जनमने के कुछ ही देर बाद सौदामिनी का देहान्त हो गया। बेटी भी एकाध सप्ताह के बाद चल बसी। राजेन्द्रलाल ने अपना दूसरा विवाह १८६० या १८६१ में भुवनमोहिनी के साथ किया। उनके दो पुत्र हुए।
 
==एशियाटिक सोसायटी==
अप्रैल १८४५ में राजेन्द्रलाल एशियाटिक सोसायटी के पुस्तकालयाध्यक्ष सह सहायक-सचिव नियुक्त हुए। इस पद पर उन्होने १० वर्ष तक कार्य किया और फिर फरवरी १८५६ में उसे छोड़ दिया। इसके बाद वे एशियाटिक सोसायटी के सचिव चुने गए और बाद में इसके गवर्निंग काउन्सिल में भी ले लिए गए। तीन बार वे इसके उपाध्यक्ष चुने गए। १८८५ में वे एशियाटिक सोसायटी के प्रथम भारतीय अध्यक्ष बने।
 
यद्यपि राजेन्द्रलाल को इतिहास में बहुत कम औपचारिक शिक्षा मिली थी, एशियाटिक सोसायटि के साथ काम करने से उन्होने भारतीय इतिहासलेखन में ऐतिहासिक विधि का पक्षधर बनने में सहायता मिली। वे 'बारेन्द्र रिसर्च सोसायटी' नामक एक स्थानीय सोसायटी से भी जुड़े हुए थे।
 
[[श्रेणी:भारतविद]]