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राजेन्द्रलाल मित्र अपने स्थापत्यकला सम्बन्धी लेखों में यूरोपीय विद्वानों के इस विचार का लगातार खण्ड करते हुए दिखते हैं कि भारतीय वास्तुकला (विशेषतः प्रस्तर के भवन) यूनानी वास्तु से व्युत्पन्न है। राजेन्द्र लाल मित्र प्रायः कहा करते थे कि मुसलमानों के आने के पहले का भारतीय स्थापत्य, यूनानी स्थापत्य के बराबरी का है। वे यूनानियों और भारतीयों को जातीय रूप से समान मानते थे और कहते थे कि दोनों की बौद्धिक क्षमता भी समान है। इस बात को लेकर वे प्रायः यूरोपीय विद्वानों से भिड़ जाते थे। जेम्स फर्ग्युसन के साथ उनका विवाद बहुत से इतिहासकारों को रोचक लगता है।
 
==भाषाविज्ञान==
राजेन्द्रलाल मित्र प्रथम भारतीय थे जिन्होने लोगों को भारतीय भाषाओं के [[स्वनिमविज्ञान]] और [[रूपविज्ञान]] (phonology and morphology) पर विचारों का आदान-प्रदान करने का प्रोत्साहन दिया। वे [[वाङ्मीमांसा]] (philology) को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयत्न की सलाह देते थे। वे यूरोपीय विद्वानों से भारतीय संस्कृति में भाषाविज्ञान सम्बन्धी प्रगति के विषय में वाद-विवाद किया करते थे। उन्होने सिद्धान्त दिया था कि आर्यों की लिपि अपनी लिपि है और यह द्रविड़ संस्कृति से व्युत्पन्न नहीं हुई है। उन्होने संस्कृत, बौद्ध भाषाओं एवं साहित्य, गाथा बोली आदि पर मौलिक कार्य किया है।
 
==देशीकरण==
राजेन्द्रलाल मित्र, बांग्ला भाषा में मानचित्र प्रकाशित करने में अग्रणी थे। उन्होने ऐसे अनेक भौगोलिक शब्दों के तुल्य बांग्ला शब्द निर्मित किए जो पहले केवल अंग्रेजी में ही थे। उन्होने बिहार, बंगाल और ओड़ीसा के जिलों के मानचित्रों को शृंखलाबद्ध रूप में प्रकाशित किया। छोटे से छोटे गाँव का नाम भी सही-सही लिखने के लिए वे प्रसिद्ध थे। पश्चिमी विज्ञान के देशीकरण के उनके प्रयास अत्यन्त उल्लेखनीय हैं।
 
उन्होने 'सारस्वत समाज' की सह-स्थापना की थी जो बहुत कम समय तक चल पाया। यह एक साहित्यिक समाज था जिसका उद्देश्य बंगाली भाषा में उच्च-शिक्षा की पुस्तकें प्रकाशित करना था। इसकी स्थापना १८८२ में ज्योतिरीन्द्रनाथ ठाकुर ने सरकार के सहयोग से किया था। उन्होने यूरोपीय वैज्ञानिक शब्दावली के भारतीयकरण करने की एक योजना (A Scheme for the Rendering of European Scientific terms in India) के बारे में लिखा था। वे अनेक अन्य समाजों, देशी साहित्य सभाओं, और कलकता स्कूल-पाठ्यपुस्तक सओसायटी के सदस्य थे। उनके द्वारा रचित कई बांग्ला पुस्तकों को स्कूलों में उपयोग की स्वीकृति मिली हुई थी। उनकी 'पत्र कौमुदी' नामक बांग्ला व्याकरण की पुस्तक अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी।
 
==सन्दर्भ==
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[[श्रेणी:भारतविद]]