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उन्होने 'सारस्वत समाज' की सह-स्थापना की थी जो बहुत कम समय तक चल पाया। यह एक साहित्यिक समाज था जिसका उद्देश्य बंगाली भाषा में उच्च-शिक्षा की पुस्तकें प्रकाशित करना था। इसकी स्थापना १८८२ में ज्योतिरीन्द्रनाथ ठाकुर ने सरकार के सहयोग से किया था। उन्होने यूरोपीय वैज्ञानिक शब्दावली के भारतीयकरण करने की एक योजना (A Scheme for the Rendering of European Scientific terms in India) के बारे में लिखा था। वे अनेक अन्य समाजों, देशी साहित्य सभाओं, और कलकता स्कूल-पाठ्यपुस्तक सओसायटी के सदस्य थे। उनके द्वारा रचित कई बांग्ला पुस्तकों को स्कूलों में उपयोग की स्वीकृति मिली हुई थी। उनकी 'पत्र कौमुदी' नामक बांग्ला व्याकरण की पुस्तक अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी।
 
==सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियाँ==
राजेन्द्रलाल मित्र, [[बंगाल का पुनर्जागरण|बंगाल के पुनर्जागरण]] के प्रमुख हस्तियों में से एक थे। उन्होने [[तत्त्वबोधिनी सभा]] एवं अन्य अनेक संस्थाओं में अनेक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ अदा की। वे बेन्थुने सोसायटी के कर्यकारी सदस्य थे, कलकता फोटोग्राफिक सूसायटी में उन्होने अनुवादक का कार्य किया, सोसायटी फॉर प्रोमोशन ऑफ इंडस्ट्रिअल आर्ट में उनका प्रभावी उपस्थिति थी। इस सोसायटी ने बंगाल में स्वैच्छिक शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
 
मित्र ने उस समय ऐसे अनेक सामाजिक विषयों पर निबन्ध लिखे जो उस समय चर्चा में थे। विधवा-पुनर्विवाह को उन्होने एक प्राचीन काल में प्रचलित प्रथा बताते हुए इसे 'भारतीय संस्कृति का विकृतीकरण' बताने वाले विचारों का विरोध किया। उन्होने बहुविवाह (polygamy) का भी विरोध किया।
 
==सन्दर्भ==