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===कुशीनगर का प्राचीन वर्णन===
कुशीनगर उत्तरी भारत का एक प्राचीन नगर है जो [[मल्ल महाजनपद|मल्ल गण]] की [[राजधानी]] था। [[दीघनिकाय]] में इस नगर को 'कुशीनारा' कहा गया है (दीघनिकाय २।१६५)। इसके पूर्व इसका नाम 'कुशावती' था। कुशीनारा के निकट एक सरिता 'हिरञ्ञ्वाती' (हिरण्यवती) का बहना बताया गया है। इसी के किनारे [[मल्ल|मल्लों]] का [[साल (वृक्ष)|शाल]] वन था। यह नदी आज की [[छोटी गंडक]] है जो [[बड़ी गंडक]] से लगभग १२ किलोमीटर पश्चिम बहती है और [[सरयू]] में आकर मिलती है। बुद्ध को कुशीनगर से [[राजगृह]] जाते हुए ककुत्था नदी को पार करना पड़ा था। आजकल इसे [[बरही नदी]] कहते हैं और यह कुशीनगर से १२ किमी की दूरी पर बहती है।
 
बुद्ध के कथनानुसार कुशीनगर पूर्व-पश्चिम में १२ योजन लम्बा तथा उत्तर-दक्षिण में ७ योजन चौड़ा था। किन्तु [[राजगृह]], [[वैशाली]] अथवा [[श्रावस्ती]] नगरों की भाँति यह बहुत बड़ा नगर नहीं था। यह बुद्ध के शिष्य [[आनन्द (बुद्ध के शिष्य)|आनन्द]] के इस वाक्य से पता चलता है- "अच्छा हो कि भगवान की मृत्यु इस क्षुद्र नगर के जंगलों के बीच न हो।" भगवान बुद्ध जब अन्तिम बार रुग्ण हुए तब शीघ्रतापूर्वक कुशीनगर से [[पावा]] गए किन्तु जब उन्हें लगा कि उनका अन्तिम क्षण निकट आ गया है तब उन्होंने आनन्द को कुशीनारा भेजा। कुशीनारा के संथागार में मल्ल अपनी किसी सामाजिक समस्या पर विचार करने के लिये एकत्र हुए थे। संदेश सुनकर वे शालवन की ओर दौड़ पड़े जहाँ बुद्ध जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे। मृत्यु के पश्चात् वहीं तथागत की अंत्येष्टि क्रिया चक्रवर्ती राजा की भाँति की गई। बुद्ध के अवशेष के अपने भाग पर कुशीनगर के मल्लों ने एक [[स्तूप]] खड़ा किया। कसया गाँव के इस स्तूप से [[ताम्रपत्र]] प्राप्त हुआ है, जिसमें उसे "परिनिर्वाण चैत्याम्रपट्ट" कहा गया है। अतः इसके तथागत के [[महापरिनिर्वाण]]-स्थान होने में कोई सन्देह नहीं है।