"कुशीनगर" के अवतरणों में अंतर

28 बैट्स् जोड़े गए ,  3 माह पहले
सम्पादन सारांश रहित
| skyline_caption = '''परिनिर्वाण मंदिर''' के निकट खुदाई में मिली '''बुद्ध प्रतिमा'''
}}
'''कुशीनगर''' एवं '''कसया बाजार''' [[उत्तर प्रदेश]] के उत्तरी-पूर्वी सीमान्त इलाके में स्थित एक क़स्बा एवं ऐतिहासिक स्थल है। वर्तमान में यह [[कुशीनगर जिला|कुशीनगर जिले]] के अन्तर्गत आता है। "कसियाकसया बाजार" नाम कुशीनगर में बदल गया है और उसके बाद "कसियाकसया बाजार" आधिकारिक तौर पर "कुशीनगर" नाम के साथ नगर पालिका बन गया है। यह [[बौद्ध धर्म|बौद्ध]] [[तीर्थस्थान|तीर्थस्थल]] है जहाँ [[गौतम बुद्ध]] का [[महापरिनिर्वाण]] हुआ था। कुशीनगर, [[राष्ट्रीय राजमार्ग २८ (भारत)|राष्ट्रीय राजमार्ग २८]] पर [[गोरखपुर]] से लगभग ५० किमी पूरब में स्थित है। यहाँ अनेक सुन्दर बौद्ध मन्दिर हैं। इस कारण से यह एक अन्तरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल भी है जहाँ विश्व भर के बौद्ध तीर्थयात्री भ्रमण के लिये आते हैं। कुशीनगर कस्बे के और पूरब बढ़ने पर लगभग २० किमी बाद [[बिहार]] राज्य आरम्भ हो जाता है।
 
यहाँ बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बुद्ध इण्टरमडिएट कालेज, महर्षि अरविन्द विद्या मंदिर तथा कई छोटे-छोटे विद्यालय भी हैं। कुशीनगर के आस-पास का क्षेत्र मुख्यत: कृषि-प्रधान है। जन-सामन्य की बोली [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] है। यहाँ [[गेहूँ]], [[धान]], [[गन्ना]] आदि मुख्य फसलें पैदा होतीं हैं।
 
[[बुद्ध पूर्णिमा]] के अवसर पर कुशीनगर में एक माह का [[मेला]] लगता है। यद्यपि यह तीर्थ [[महात्मा बुद्ध]] से सम्बन्धित है, किन्तु आस-पास का क्षेत्र [[हिन्दू]] बहुल है। इस मेले में आस-पास की जनता पूर्ण श्रद्धा से भाग लेती है और विभिन्न मन्दिरों में पूजा-अर्चना एवं दर्शन करती है। किसी को संदेह नहीं कि बुद्ध उनके 'भगवान' हैं।
 
{{बौद्ध धार्मिक स्थल}}
 
==धार्मिक व ऐतिहासिक परिचय==
कुशीनगर का इतिहास अत्यन्त ही प्राचीन व गौरवशाली है। इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने [[महापरिनिर्वाण]] प्राप्त किया था। प्राचीन काल में यह नगर [[मल्ल वंश]] की राजधानी तथा [[महाजनपद|16 महाजनपदों]] में एक था। चीनी यात्री [[ह्वेन त्सांग|ह्वेनसांग]] और [[फ़ाहियान|फाहियान]] के यात्रा वृत्तातों में भी इस प्राचीन नगर का उल्लेख मिलता है। [[वाल्मीकि रामायण]] के अनुसार यह स्थान [[त्रेतायुग|त्रेता युग]] में भी आबाद था और यहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान [[राम]] के पुत्र [[कुश]] की राजधानी थी जिसके चलते इसे 'कुशावती' नाम से जाना गया। [[पालि भाषा का साहित्य|पालि साहित्य]] के ग्रंथ [[त्रिपिटक]] के अनुसार बौद्ध काल में यह स्थान षोड्श [[महाजनपद|महाजनपदों]] में से एक था। [[मल्ल राजवंश|मल्ल राजाओं]] की यह राजधानी तब 'कुशीनारा' के नाम से जानी जाती थी। ईसापूर्व पांचवी शताब्दी के अन्त तक या छठी शताब्दी की शुरूआत में यहां भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था। कुशीनगर में ही उन्होंने अपना अंतिम उपदेश देने के बाद महापरिनिर्माण को प्राप्त किया था।
 
इस प्राचीन स्थान को प्रकाश में लाने के श्रेय [[अलेक्ज़ैंडर कन्निघम|जनरल ए कनिंघम]] और ए. सी. एल. कार्लाइल को जाता है जिन्होंनें 1861 में इस स्थान की खुदाई करवाई। खुदाई में छठी शताब्दी की बनी भगवान बुद्ध की लेटी प्रतिमा मिली थी। इसके अलावा रामाभार स्तूप और और माथाकुंवर मंदिर भी खोजे गए थे। 1904 से 1912 के बीच इस स्थान के प्राचीन महत्व को सुनिश्चित करने के लिए [[भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण|भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण]] विभाग ने अनेक स्थानों पर खुदाई करवाई। प्राचीन काल के अनेक मंदिरों और मठों को यहां देखा जा सकता है।