"नौसैनिक तोपखाना" के अवतरणों में अंतर

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'''नौसैनिक तोपखाना''' (Naval artillery) वह [[तोपखाना]] है जो [[युद्धपोत|युद्धपोतों]] पर लगा होता है। पहले इसका उपयोग केवल [[नौसैनिक युद्ध]] में किया जाता था किन्तु बाद में समुद्रतट पर बमबारी करने के लिए तथा वायुयानों को मार-गिराने के लिए भी किया जाने लगा। नौसैनिक तोपखाने के अन्तर्गत प्रायः नालों से छोड़े गए प्रक्षेपात्रो को सम्मिलित किया जाता है जबकि [[टॉरपीडो]], [[रॉकेट]] और मिसाइल आदि इसके अन्तर्गत नहीं आते। परम्परागत नाविक तोपंदाजी अपने उत्कर्ष पर पहुँच चुकी हैं और अब हम नियंत्रित अस्त्र-शस्त्र (guided missiles) के युग में प्रवेश कर चुके हैं।
 
जब से [[तोप]] का आविष्कार हुआ और समुद्री तल पर उसका उपयोग करना सम्भव हो गया तभी से [[युद्ध]] के लिए जहाजों पर तोप का प्रयोग किया जाने लगा। प्रारम्भिक समुद्री युद्ध में तोप के प्रयोग से शत्रु को डराकर खदेड़ना, शत्रु कार्मिकों को क्षतिग्रस्त करना, या जहाज रोककर लूटना और उसे नष्ट करना होता था। बाद में गोले की घातक शक्ति के बढ़ने पर तोप की प्रक्षेप दूरी या परास भी बढ़ा और आजकल तो पचासों किलोमीतरकिलोमीटर तक के जहाजों पर गोले फेंके जा सकते हैं।
 
==आधुनिक तोप और उसके आरोपण का क्रमविकास ==
आज से सदियों पहले भरण तोप और उच्च विस्फोट गोलों की कल्पना और उपयोग हो चुका था, किंतुकिन्तु इनका वास्तविक विकास १९वीं शती के उत्तरार्ध में [[ब्रिटेन]] की [[औद्योगिक क्रांति]] के समय हुआ। तब तक तोपें [[कांसा|काँसे]] या [[लोहा|लोहे]] की ढली और बिना झिरी कटी (unrifled) होती थीं। इन्हें स्फान (wedges) के प्रयोग से उठाया या झुकाया जाता था। इन्हें हाथ से ही नालमुख द्वारा भरा जाता था। जहाज में बने झरोखों से तोप के निकलने पर [[घिरनी]] तंत्र (pulley system) द्वारा [[प्रतिक्षेप]] (पीछे की तर्फ लगनेतरफ वाला बलगति) रोका जातजाता था। निशाना साधने के यंत्रों की व्यवस्था नहीं थी। लक्ष्य पर प्रहार करने के लिए समूचा जहाज घुमाना पड़ता था। १८५० ई. के बाद उत्कृष्ट [[इस्पात]] की बनी अधिक मजबूत आधुनिक तोपों से वे प्रतिस्थापित हो गए।
 
अधिक मजबूत तोपों के आगमन से भारी नोदक प्रभार का प्रयोग संभवसम्भव हो गया, जिससे उच्चतर प्रक्षेपवेग तथा उच्चतर प्रतिक्षेपबल (recoil forces) प्राप्त हुए। इसके साथ ही [[अभिकल्प]] का इतना विकास हुआ कि आधुनिक आरोपण प्रतिक्षेप की किसी मात्रा को सहन कर सकता है। नालमुखवेग (muzzle velocity) की वृद्धि होने पर, उत्थापन की सुधरी व्यवस्था से परास में वृद्धि हुई। इस प्रगति के फलस्वरूप, जहाज की स्थिति परिवर्तित किए बिना ही तोप को घुमाने (विनयन) के लिए परिवर्तन की आवश्यकता पड़ गई।
 
नौसेना में प्रयुक्त होनेवाली तोपें तीन प्रकार की होती हैं, भारी, मध्यम और हलकी। भारी तोपें वे है जिनका व्यास (calibre) ६ इंच या इससे अधिक होता है। इनका प्रयोग तललक्ष्य तथा समुद्रतट पर बमबारी के लिए होता है। विशाल रणपोतों के ये ही प्रमुख अस्त्रशस्त्र होते हैं। मध्यम तोपों ६इंच६ इंच से ४ इंच व्यास की होती हैं। इनका प्रयोग तलीय लक्ष्यों के विरुद्ध होता है, पर वायुयानों के विरुद्ध भी ये प्रयुक्त हो सकती हैं। हल्की तोपें निकट परास हवामारों (antiaircraft fitre) के लिए प्रयुक्त होती हैं। जहाजों पर भारी तोपों के लादने की एक सीमा होती है। किसी रणपोत की मारक शक्ति (striking power) गोलाबारी की द्रुतता पर भी निर्भर होती है। तोप जितनी ही बड़ी होगी, उसकी भराई उतनी ही देर में होगी, जिसके कारण गोलाबारी का मध्यान्तर बढ़ जाएगी। चूँकि फायर किए गए गोला-बारूद का एक छोटा अंश ही लक्ष्य पर आघात करता है, अतः हलके गोलों से शीघ्रता से गोलाबारी करना भारी गोलों द्वारा धीरे-धीरे गोलाबारी करने की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी होता है।
 
तोप के गोला बारूद में प्रक्षेप्य या गोला (उच्च विस्फोटक जैसे [[टी.एन.टी.]]) और [[कॉर्डाइट]] होता है, जो तोप से प्रक्षेप्य को फायर करता है। प्रक्षेप्य और भरण का भार तोप के आकार पर निर्भर करता है। गोलाबारूद विस्फोटक होता है। अत: रणपोत के निचले भाग में स्थित कवचरक्षित बारूदधर (मैगजिन) में यह शत्रुओं की गोलाबारी से सुरक्षित रखा जाता है। बारूधर से गोला बारूद को तोपों में पहुँचाने के लिए उत्थापक (hoist) रहता है।