"अश्वत्थामा": अवतरणों में अंतर

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[[कर्पी]] {{!}} [[माता]]|राजवंश=|मुख्य शस्त्र=[[धनुष]] [[बाण]]|उत्त्पति स्थल=|नाम=अश्वत्थामा|संदर्भ ग्रंथ=[[महाभारत]] [[पुराण]]|देवनागरी=|अन्य नाम=द्रोण पुत्र,|width2=|Caption=[[नारायण अस्त्र ]] का प्रयोग करते हुए अश्वत्थामा|Image=Ashwatthama uses Narayanastra.jpg|मित्रता=}}
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महाभारत युद्ध से पुर्व गुरु द्रोणाचार्य अनेक स्थानो में भ्रमण करते हुए हिमालय (ऋषिकेश) प्‌हुचे। वहाँ तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा में तपेश्वर नामक स्वय्मभू शिवलिंग है। यहाँ गुरु द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी माता कृपि ने शिव की तपस्या की। इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने इन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद माता कृपि ने एक सुन्दर तेजश्वी बाल़क को जन्म दिया। जन्म ग्रहण करते ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी। जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी।
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