"शिव पुराण": अवतरणों में अंतर

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== कथा एवं विस्तार ==
 
इस पुराण में २४,००० श्लोक है तथा ७ संहितायें हैं<ref name="शिवमहापुराण">शिवमहापुराण विद्येश्वरसंहिता द्वितीय अध्याय श्लोक संख्या ६०, ६१</ref>
इस पुराण में २४,००० श्लोक है तथा इसके क्रमश: ६ खण्ड है<ref name="Śarmā Vyāsa Siṅgha Prakāśa 2008 p. ">{{cite book | last=Śarmā | first=P.M. | last2=Vyāsa | first2=V. | last3=Siṅgha | first3=P. | last4=Prakāśa | first4=V. | title=Shiva Purana - Hindi | publisher=Dreamland Publications | year=२००८ | isbn=978-81-8451-150-5| url=http://books.google.co.in/books?id=yhFePgAACAAJ | language=es | accessdate=२७ मार्च २०२० | page=}}</ref>-
 
शिवमहापुराण विद्येश्वरसंहिता द्वितीय अध्याय -
 
विद्येश्वराख्या तत्राद्या रौद्री ज्ञेया द्वितीयिका। तृतीया शतरुद्राख्या कोटिरुद्रा चतुर्थिक।। २.६० ।।<br />
पञ्चमी चैवमौमाख्या षष्ठी कैलाससंज्ञिका। सप्तमी वायवीयाख्या सप्तैवं संहिता मता:।। २.६१ ।।
 
* विद्येश्वर संहिता
* रुद्र संहिता
* शतरुद्र संहिता
* कोटिरुद्र संहिता
* उमा संहिता
* वायु संहिता
[[चित्र:India statue of nataraja.jpg|thumb|right|200px|चोल वंश कालीन नटराज शिव शंकर की मूर्ति]]
‘शिवपुराण’ एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है, जिसमें परात्मपर परब्रह्म परमेश्वर के ‘शिव’ (कल्याणकारी) स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है<ref name="Singh 2008 p. ">{{cite book | last=Singh | first=Pritpal | title=Saint Veda Vyasa's the Shiva Purana | publisher=Dreamland | publication-place=India | year=2008 | isbn=978-81-8451-042-3 | language=अंग्रेजी भाषा | page=}}</ref>। भगवान शिवमात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं। वेदों ने इस परमतत्त्व को अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवं संहारक कहकर उनका गुणगान किया है। श्रुतियों ने सदा शिव को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है। ‘शिव’ का अर्थ ही है- ‘कल्याणस्वरूप’ और ‘कल्याणप्रदाता’। परमब्रह्म के इस कल्याण रूप की उपासना उटच्च कोटि के सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों-सभी के लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णु तक इन महादेव की उपासना करते हैं। इस पुराण के अनुसार यह पुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस भूतल पर भगवान शिव का वाङ्मय स्वरूप समझना चाहिये और सब प्रकार से इसका सेवन करना चाहिये। इसका पठन और श्रवण सर्वसाधनरूप है। इससे शिव भक्ति पाकर श्रेष्ठतम स्थिति में पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही शिवपद को प्राप्त कर लेता है। इसलिये सम्पूर्ण यत्न करके मनुष्यों ने इस पुराण को पढ़ने की इच्छा की है- अथवा इसके अध्ययन को अभीष्ट साधन माना है। इसी तरह इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी सम्पूर्ण मनोवंछित फलों के देनेवाला है। भगवान शिव के इस पुराण को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यह शिवपुराण नामक ग्रन्थ चौबीस हजार श्लोकों से युक्त है। सात संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है
 
== सन्दर्भ ==