"द्रव्यगुण विज्ञान" के अवतरणों में अंतर

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==महत्व==
चिकित्साशास्त्र का महत्त्वपूर्ण, अत्यधिक उपयोगी और मुख्य अङ्गभूत विषय होने के कारण द्रव्यगुणशास्त्र का महत्त्व विशेष रूप से है। कहा गया है कि-
: ''वैद्येन पूर्वं ज्ञातव्यो द्रव्याणामगुणाः गुणाः।
: ''यदायत्तं हि भैषज्यं यज्ज्ञाने जात क्रिया क्रमः॥
 
ये भी कहा गया है कि-
 
: ''निघण्टुना विना वैद्यो विद्वान् व्याकरणं विना।
: ''अनभ्यासेन धानुष्कस्त्रयो हास्यस्य भाजनम्॥ (राजनिघण्टु १/९)
:: (निघण्टु (द्रव्यगुणशास्त्र) के बिना वैद्य, [[व्याकरण]] के बिना विद्वान, तथा अभ्यास के बिना धानुष्क - ये तीनों ही समानरूप से हास्य (उपहास) के पात्र होते हैं।)
 
ये भी कहा गया है कि-,
 
: ''यथा विषं यथा शस्त्रं यथाग्निरशनिर्यथा ।
: ''तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतं यथा' ॥ (चरकसंहिता सूत्रस्थान १:१२५)
:: (''जिस प्रकार विष, शस्त्र, अग्नि या इन्द्र का वज्र प्राण हर लेते हैं उसी प्रकार अविज्ञात (न जानी हुई) औषधि प्राणघातक होती है <br>''और विज्ञात (जानी हुई) औषधि अमृत के समान प्राणरक्षक होती है ।)
द्रव्य भी साधन होने के कारण शस्त्र के समान है। औषध का अज्ञानपूर्वक प्रयोग सामाजिक तथा नैतिक दृष्टि से महान् अपराध है।
 
ये भी कहा गया है कि वैद्य को द्रव्यों का गुण और अगुण पहले से ही मालूम होना चाहिए।
: ''वैद्येन पूर्वं ज्ञातव्यो द्रव्याणामगुणाः गुणाः।
: ''यदायत्तं हि भैषज्यं यज्ज्ञाने जात क्रिया क्रमः॥
 
आयुर्वेद में 600 से भी अधिक औषधीय पादपों को औषध के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इन्हें अकेले या दूसरों साथ मिलाकर रोगों से मुक्ति पाया जाता है। औषधीय पादप अलग-अलग तरह के कृषि-जलवायीय क्षेत्रों (जंगल, अनूप, साधारण देश) में पैदा होते हैं। वर्तमान समय में औषधीय पादपों को 'प्राकृतिक औषध' के रूप में प्रयोग करने का चलन बढ़ा है। इस कारण इस विषय का महत्व और भी बढ़ गया है।