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[[File:Vallabh hadwriting.JPG|thumb|The Handwritten note of [[Vallabhacharya]] in telugu in the 'Bahi' of one shri Narottam- a brahman priest in Gaya|कड़ी=Special:FilePath/Vallabh_hadwriting.JPG]]
 
'''महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्यजी''' (1479-1531) भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्णभक्ति शाखा के आधारस्तंभ एवं [[पुष्टिमार्ग]] ([https://www.hamarivirasat.com/listing/india/vallabha-pushtimarg-sampradaya/ pushtimarg]) के प्रणेता थे। उनका प्रादुर्भाव विक्रम संवत् [[१५३५|1535]], [[वैशाख]] कृष्ण [[एकादशी]] को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्रीलक्ष्मणभट्टजी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से हुआ। यह स्थान वर्तमान [[छत्तीसगढ़]] राज्य के [[रायपुर]] के निकट चम्पारण्य है। उन्हें वैश्वानरावतार ([[अग्नि]] का अवतार) कहा गया है। वे वेदशास्त्र में पारंगत थे। वर्तमान में इसे वल्लभसम्प्रदाय या पुष्टिमार्ग(pushtimarg) सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। और वल्लभसम्प्रदाय '''[https://www.hamarivirasat.com/listing/india/vaishnavism-sampradaya/ वैष्णव सम्प्रदाय]''' अन्तर्गत आते हैं।
 
महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्मान में भारत सरकार ने सन 1977 में एक रुपये मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया था।
== षोडश ग्रन्थों की टीकाएँ तथा हिंदी अनुवाद ==
 
महाप्रभु वल्लभाचार्य के षोडश ग्रंथों पर [[गोस्वामी श्री हरिराय जी]], श्री कल्याण राय जी, श्री पुरुषोत्तम जी, श्रीरघुनाथ जी आदि अनेक विद्वानों द्वारा संस्कृत भाषा में टीकाएं उपलब्ध हैं। सर्वसाधारण के लिए भाषा की जटिलता के कारण ग्रंथों और टीकाओं के मर्म को समझना कठिन रहा है, किन्तु श्री वल्लभाचार्य के ही एक विद्वान वंशज गोस्वामी राजकुमार नृत्यगोपालजी ने प्रत्येक ग्रन्थ की समस्त टीकाओं को न केवल एक जगह संकलित किया है, बल्कि पुष्टिमार्ग के भक्तों तथा अनुयायियों के लाभ के लिए उनका हिंदी अनुवाद भी सुलभ कराया है। क्लिष्ट टीकाओं के हिंदी अनुवाद के साथ अधिक स्पष्टता के लिए उन्होंने प्रत्येक ग्रन्थ पर अपनी स्वयं की टीका भी की है। ये सभी टीकाएँ सोलह पुस्तकों के रूप में छपी हैं। निम्न तालिका में श्री वल्लभाचार्य के ग्रंथों की संग्रहीत टीकाओं के साथ ही श्री राजकुमार नृत्यगोपालजी की टीका का उल्लेख है।<ref>“श्रीमद्वल्लभाचार्य द्वारा प्रणीत षोडश ग्रंथों की मूल सहित संस्कृत टीकाओं का संकलन, हिन्दी अनुवाद तथा सरलीकरण टीका (16 पुस्तकों में)”, गोस्वामी राजकुमार नृत्यगोपालजी, “चरणाट”, ठाकुर विलेज, कांदिवली (पू.), मुम्बई-४००१०१ (महाराष्ट्र)</ref>
 
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