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== कादम्बरी के गद्यबद्ध संक्षेप==
बाण संस्कृत-गद्य का एकच्छत्र सम्राट् है। बाण की कादम्बरी अपनी अद्भुत कथावस्तु, रसात्मकता तथा आश्चर्यजनक शैली के कारण सदा कौतूहल की वस्तु रही है। अलंकृत गद्य का चरम वैभव, अपनी समूची भव्याभव्य संभावनाओं के साथ, उसकी कादम्बरी में सम्पूर्ण सजधज के साथ प्रकट हुआ है। परन्तु इसके बृहदाकार, विकट शैली, विराट् वाक्यावली, अनन्त विशेषणतति से आच्छन्न अन्तहीन वर्णनों तथा दुस्साध्य भाषा ने इसे बहुधा श्रमसाध्य तथा विद्वद्गम्य बना दिया है। साधारण पाठक के लिए वह असाध्य तथा अगम्य है। वह उसके आस्वादन से वंचित रह जाता है। कादम्बरी की संस्कृत टीकाओं में [[भट्ट मथुरानाथ शास्त्री]] की 'चषक' टीका जो निर्णयसागरप्रेस, मुंबई से सन १९३६ में प्रकाशित हुई प्रसिद्ध है। इस रोचक किन्तु कष्टसाध्य गद्यकाव्य को जनसुलभ बनाने के लिए इसके सरल एवं संक्षिप्त रूपान्तरों की परम्परा आरम्भ हुई। अब तक कादम्बरी के गद्य और पद्य में निबद्ध 12 सार प्रकाश में आ चुके हैं।
 
संस्कृत गद्य के अतुल ऐश्वर्य, उसकी सूक्ष्म भंगिमाओं, हृदयहारी मृदुता तथा उद्वेगकारी कर्कशता का जिस कौशल से दोहन किया जा सकता था, उसका राजसी ठाट कादम्बरी में विकीर्ण है। बाण की कला का स्पर्श पाकर कादम्बरी छन्दो-विहीन कविता बन गयी है। सुबन्धु ने गद्य के जिस शास्त्रीय पैटर्न का प्रवर्तन किया था, बाण ने उसे ग्रहण तो किया किन्तु उसमें 'काव्योचित सौन्दर्य' का समावेश कर उसे अपूर्व स्निग्धता प्रदान की है। कला-शिल्प तथा भावसबलता के मंजुल मिश्रण के कारण ही संस्कृत गद्यकारों में बाण का स्थान सर्वोपरि है।
* [https://archive.org/details/kadambaripurvaba014925mbp Kadambari - Purva Bagha] (edition by Kasinatha Panduranga Parab)
* [https://archive.org/details/Kadamabari_Uttarabhaga-PV_Kane_1913 Kādambarī (Uttarabhāga)] (edited by P. V। Kane, 1913)
* [[भट्ट मथुरानाथ शास्त्री]], कादम्बरी पर 'चषक' टीका, निर्णयसागर प्रेस, मुम्बई, सन १९३६
 
[[श्रेणी:संस्कृत साहित्य]]
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