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'''हसन इब्न अली''' या '''अल-हसन बिन अली''' ([[अरबी]]: الحسن بن علي بن أﺑﻲ طالب यानि हसन, पिता का नाम अली सन् 625-671) [[ख़िलाफ़त|खलीफ़ा]] [[अली इब्न अबी तालिब|अली]] अ० के बड़े बेटे थे। आप अली अ० के बाद कुछ समय के लिये खलीफ़ा रहे थे। माविया, जो कि खुद खलीफा बनना चाहता था, आप से संघर्ष करना चाहता था पर आपने इस्लाम में गृहयुद्ध ([[फ़ितना]]) छिड़ने की आशंका से ऐसा होने नहीं दिया। इमाम हसन उस समय के बहुत बड़े विद्वान थे।
हुसैन का भाई। मुसलमान उन्हें इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के पोते के रूप में सम्मान करते हैं। शिया मुसलमानों में, हसन दूसरे इमाम के रूप में पूजनीय हैं। हसन ने अपने पिता की मृत्यु के बाद खिलाफत का दावा किया, लेकिन पहली फितना को समाप्त करने के लिए उमैयद वंश के संस्थापक <ref name="Donaldson"/><ref name="Jafri"/> मुवियाह प्रथम के छह या सात महीने के बाद उसे छोड़ दिया गया। अल-हसन को गरीबों के लिए दान करने, गरीबों और बंधुआ लोगों के लिए उनकी दया और उनके ज्ञान, सहिष्णुता और बहादुरी के लिए जाना जाता था। <ref>{{cite web |last1=Ayati |first1=Dr. Ibrahim |title=A Probe into the History of Ashura' |url=https://www.al-islam.org/probe-history-ashura-dr-ibrahim-ayati |website=Al-Islam.org |publisher=Ahlul Bayt Digital Islamic Library Project}}</ref> शेष जीवन के लिए, हसन मदीना में रहे, जब तक कि उनकी मृत्यु ४५ साल की उम्र में नहीं हुई और उन्हें मदीना में जन्नत अल-बाकी कब्रिस्तान में दफनाया गया। उसकी पत्नी, जैदा बिंट अल-अश्अत पर आमतौर पर उसे जहर देने का आरोप लगाया जाता है। <ref name="Donaldson">{{cite book|last=Donaldson|first=Dwight M.|title=The Shi'ite Religion: A History of Islam in Persia and Irak|year=1933|pp=66–78|publisher=Burleigh Press| url=https://ia800403.us.archive.org/34/items/DonaldsonDwightM.1933TheShiiteReligion/Donaldson%2C%20Dwight%20M.%201933%20-%20The%20Shi%27ite%20Religion.pdf}}</ref><ref name="Jafri">{{cite book|last1=Jafri|first1=Syed Husain Mohammad|title=The Origins and Early Development of Shi’a Islam; Chapter 6|date=2002|publisher=Oxford University Press|isbn=978-0195793871}}</ref><ref>{{harvnb|Madelung|1997}}.</ref><ref name="chittick">{{cite book|last1=Tabåatabåa'åi |first1=Muhammad Husayn |title=A Shi'ite Anthology |date=1981 |others=Selected and with a Foreword by [[Muhammad Husayn Tabataba'i]]; Translated with Explanatory Notes by [[William Chittick]]; Under the Direction of and with an Introduction by [[Hossein Nasr]] |publisher=State University of New York Press |isbn=9780585078182 |page=137}}</ref><ref name="Lalani">{{cite book|last1=Lalani|first1=Arzina R.|title=Early Shi'i Thought: The Teachings of Imam Muhammad Al-Baqir|date=9 March 2001|publisher=I. B. Tauris|isbn=978-1860644344|page=4}}</ref><ref name=Momen/>
 
इमाम हसन ने उसको सन्धि करने के लिये मजबूर कर दिया। जिसके अनुसार वो सिर्फ़ इस्लामी देशों पर शासन कर सकता है, पर इस्लाम के कानूनो में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। उसका शासन केवल उसकी मौत तक ही होगा उस्को किसी को ख़लीफा बनाने का अधिकार नहीं होगा। उस्को इसलाम के सभी नियमो का पालन करना होगा। उसके मरने के बाद ख़लीफा फिर हसन अ० होगे। यदि हसन अ० कि मर्त्यु हो जाय तो इमाम हुसेन को ख़लीफा माना जायगा।
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