"रामकृष्ण परमहंस" के अवतरणों में अंतर

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चन्द्रमणि देवी ने अपने बेटे की उन्माद की अवस्था से चिन्तत होकर गदाधर का विवाह [[शारदा देवी]] से कर दिया।
इसके बाद भैरवी ब्राह्मणी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। उन्होंने उन्हें तंत्र की शिक्षा दी। मधुरभाव में अवस्थान करते हुए ठाकुर ने श्रीकृष्ण का दर्शन किया।
उन्होंने तोतापुरी महाराज से [[अद्वैत वेदान्त|अद्वैत]] [[वेदान्त दर्शन|वेदान्त]] की ज्ञान लाभ किया और जीवन्मुक्त की अवस्था को प्राप्त किया। सन्यास ग्रहण करने के वाद उनका नया नाम हुआ श्रीरामकृष्ण परमहंस। (इसके बाद उन्होंने ईस्लाम और क्रिश्चियन धर्म की भी साधना की।)
ये गलत हे उन्होने कभी भी इस्लाम और क्रिस्चियन धर्म की साधना न्हिं करी।शास्त्रो मे इस बात का कोई उल्लेख न्ही मिलता।
ये झूठ हे और हिंदुओ को बहकाने का एक निरर्थक पर्यास हे।इस बात को सिरे से खारिज किया जाये इस उल्लेख के भीतर जो ये बाते सम्पादित करी गयी हे,इनके आध्यात्मिक गुरु श्री तोतापूरी जी महाराज थें।उनसे इन्होने ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्राप्त करी और कहते हे की इन्होने फिर कभी भी माता काली को मुर्ति से परकट न्ही करा,क्योंकि फिर ये माता के आन्तरिक रुप को पहचान चुके थे ।
 
=== भक्तों का आगमन ===
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