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मुझे लाक्षागृह के प्रयागराज में होने के कारण पर एतराज है यह तथा व युक्तिसंगत नहीं है
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(मुझे लाक्षागृह के प्रयागराज में होने के कारण पर एतराज है यह तथा व युक्तिसंगत नहीं है)
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महाभारत से
पांडवों के प्रति प्रजाजनों का पूज्य भाव देखकर दुर्योधन बहुत चिंतित हुआ। उसने जाकर धृतराष्ट्र से कहा कि वह किसी प्रकार पांडवों को हस्तिनापुर से हटाकर वारणावत भेज दें। प्रजाजनों को वह (दुर्योधन) जब अपने पक्ष में कर ले तब उन्हें फिर से बुलवा लें, अन्यथा प्रजाजन दुर्योधन को युवराज ने बनाकर युधिष्ठिर को बनाना चाहते हैं धृतराष्ट्र ने उसका सुझाव तुंरत स्वीकार कर लिया। उन लोगों ने वारणावत प्रदेश की प्राकृतिक सुषमा का बार-बार वर्णन करके पांडवों को प्रकृति-सौंदर्य देखने के लिए प्रेरित किया। दुर्योधन ने अपने मन्त्री पुरोचन की सहायता से वारणावत में पांडवों के रहने के लिए एक महल बनवाया। वह अत्यंत सुंदर था किंतु उसका निर्माण लाख आदि शीघ्र प्रज्वलित होने वाले पदार्थों से किया गया था। विदुर जी ने इस रहस्य को जाना तो तुरंत पांडवों को सावधान कर दिया। विदुर के भेजे हुए एक विश्वस्त व्यक्ति ने गुप्त रूप से लाक्षागृह में एक सुरंग खोदी। पुरोचन अत्यंत सावधान रहने पर भी इस भेद को नहीं जान पाया। पांडव दिन भर मृगया के बहाने से बाहर रहते थे और रात को घर तथा पुरोचन पर पहरा रखते। एक बार कुंती ने बहुत-से ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा ग़रीबों को दान दिया। उस रात एक भीलनी अपने पांच बेटों के साथ उसी लाक्षागृह में सो गयी। आधी रात को पांडव तथा कुंती सुरंग के मार्ग से बाहर जंगल में भाग गये और भीमसेन ने भागने से पूर्व घर में आग लगा दी। लाक्षागृह में पुरोचन तथा अपने बेटों के साथ भीलनी जलकर मर गये। कुंती तथा पांडवों के लिए विदुर ने एक विश्वस्त आदमी को नौका सहित भेजा था। सुरंग जिस जंगल में खुलती थी, वहाँ गंगा नदी थी। विदुर की भेजी हुई नौका की सहायता से वे लोग गंगा के दूसरी पार पहुंच गये। [1]गये
एक अन्य मत के अनुसार लाक्षागृह उत्तराखण्ड के देहरादून जिले में लाखामंडल नामक स्थान पर बना था,, इसके कुछ दूरी पर उत्तरकाशी नगर में आज भी वाराणावत का मेला बर्ष में दो बार लगता है, एक जब वाराणावत पहाड़ी की पंचकोसी परिक्रमा की जाती है और दूसरी बार माघ महीने में.
इसका प्रमाण लाखामंडल के खुदाई से मिलते हैं,, एकचक्रा नगरी चकराता नामक कस्बे की मान्यता है जो देहरादून जिले में तहसील मुख्यालय है,, और फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पांचाल काम्पिल्य मानते हैं,,
 
यदि प्रयागराज के पास लाक्षागृह माना जाता है तो तर्क संगत नहीं है
कारण,, प्रयागराज (प्रचलित मान्यता अनुसार) कौरवों के कुरु जनपद का हिस्सा होना असंभव है क्योंकि कुरू और प्रयागराज के बीच कौशल और काशी पंचाल राज्य थे इस प्रकार एक अलग गाँव और उसी राज्य का हिस्सा युक्तिसंगत नहीं है
जबकि
उत्तरकाशी क्षेत्र ब्रह्म पुर नाम से महाभारत में पांडवों के अधीन ही था,,
उत्तरकाशी देहरादून से चकराता और चकराता से पश्चिम उत्तर प्रदेश पांचाल आना सहज ही है
 
प्रयागराज से पश्चिम उत्तर प्रदेश के मध्य में मथुरा और कौशल पडता है तो पांडव रास्ते में ही पड रहे मथुरा अपने ननिहाल क्यों न जाते., फिर हस्तिनापुर में बिहार जी से क्यों न मिलते....
राजेन्द्र प्रसाद कमद उत्तरकाशी
 
==परिचय==
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