"राजनीतिक दर्शन": अवतरणों में अंतर

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इस प्रकार यदि हमें सामाजार्थिक यथार्थ एवं आदर्शों तथा राजनीतिक दर्शन का ध्यान रखते हुए, राज्य के स्वरूप और प्रयोजन तथा शासन की समस्याओं पर व्यवस्थित ढंग से विचार करना है तो हमें समस्या के सैद्धांतिक अध्ययन का रास्ता अपनाना होगा। इस प्रकार राजनीतिक सिद्धान्त प्रासंगिक है। साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर राजनीतिक सिद्धान्त का अध्ययन करने से हमें अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों की जानकारी मिलती है और गरीबी, हिंसा, भ्रष्टाचार आदि सामाजार्थिक यथार्थों और समस्याओं को समझने में सहायता मिलती है। राजनीतिक सिद्धान्त इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि विभिन्न राजनीतिक सिद्धान्तों को आधार बना कर ‘आगे बढ़ते हुए वह हमें समाज को बदलने के उपाय और दिशाएँ सुझा सकता है, ताकि आदर्श समाज स्थापित किया जा सके। मार्क्सवादी सिद्धान्त एक ऐसे सिद्धान्त का उदाहरण है जो न केवल दिशा सुझाता है बल्कि समतावादी समाज की स्थापना के लिए क्रांति की हिमायत करने की हद तक जाता है। यदि कोई राजनीतिक सिद्धान्त सही है तो वह आम लोगों तक संप्रेषित किया जा सकता है और तब वह समाज तथा मानव जाति को प्रगति के पथ पर ले जाने वाली प्रबल शक्ति बन सकता है।
 
===राजनीतिक चिन्तन का महत्व===
दुनिया में अनेक विद्वान राजनीतिक चिन्तन को अनुपयोगी एवं हानिप्रद मानते है। इसमें मुख्य रूप से [[बेकन]], लेस्ली, स्टीफन, बर्क, डनिंङ आदि प्रमुख हैं। स्टीफन तो कहता है कि -''वे देश भाग्यशाली है जिनके पास कोई राजनैतिक दर्शन नहीं है क्योंकि ऐसा तत्व चिन्तन निकट भविष्य में होने वाली क्रान्तिकारी उथलपुथल का सूचक होता है।'' डनिंग का स्पष्ट मत था कि -'' जब कोई राजनैतिक पद्धति राजनैतिक दर्शन का स्वरूप ग्रहण करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि उसके विनाश की घड़ी आ गई है।" उपरोक्त कथन चिन्तन को भी मानते है। वे इसे आदर्शवादी, काल्पनिक, भ्रम पैदा करने वाला मानते है। वे तर्क देते है कि अच्छे विचारक प्रायः अच्छे शासक नहीं होते हैं। वे कहते हैं कि सैद्धान्तिक ज्ञान व्यावहारिक नहीं होता है तथा व्यावहारिक ज्ञान सिद्धान्त पर खरा नहीं उतरता है। [[प्लेटो]] इसका आदर्श उदाहरण है। वह अपने [[आदर्श राज्य]] को मूर्त रूप देने में पूर्णतः असफल रहा।
 
इसका दूसरा दोष यह है कि अधिकांश विचार परिस्थितिजन्य होते हैं। अतः उनका सामान्यीकरण करते हुए सिद्धान्त नहीं बनाया जा सकता। राजनैतिक दर्शन में हाल्स, [[रूसो]] तथा [[मैकियावेली]] के मानव सम्बन्धी विचार तत्कालीन समाज की देन थे। कतिपय यही कारण था कि तत्कालीन परिस्थितियों में उपजी निराशा, हताशा ने उनके विचार को मानव के प्रति नकारात्मक बना दिया था। उपरोक्त दोष के होते हुए भी चिन्तन का अध्ययन मानवोपयोगी है। इससे होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं-
 
*(१) [[राज्य]] और उसका मूर्त रूप [[सरकार]] है। यह मानव से निर्मित है तथा मानव के इर्द-गिर्द ही घूमता है। अतः मानव के संबंध में विचार करना, विभिन्न प्रश्नों पर विचार करना सदैव से मानव तथा समाज के लिये लाभदायक रहा है।
 
*(२) राजनीतिक चिन्तन का मानव के साथ घनिष्ट संबंध रहा है। विद्वानों द्वारा समय-समय पर प्रतिपादित विभिन्न सिद्धान्तों ने मानव को बहुत लाभ पहुंचाया है। रूसो के विचारों ने 18वीं शताब्दी में [[फ्रांसीसी क्रान्ति]] को जन्म दिया और इसी क्रान्ति से समानता, स्वतन्त्रता तथा भाईचारे का विचार सामने आया। [[कार्ल मार्क्स]] ने 20वीं शताब्दी में [[बोल्शेविक क्रान्ति]] को जन्म दिया। इसी से [[साम्यवाद|साम्यवादी विचारधारा]] का उदय हुआ।
 
*(३) राजनीतिक चिन्तन से एक अलग प्रकार का लाभ यह होता है कि यह विभिन्न प्रकार की शब्दावलियों, सिद्धान्तों को जन्म देता है। इसमें प्रमुख्य रूप से [[राष्ट्रीयता]], [[लोककल्याणकारी राज्य]], [[व्यक्तिवाद]], [[पंथनिरपेक्षता]] आदि प्रमुख है।
 
*(४) राजनीतिक चिन्तन के अध्ययन से एक अन्य लाभ यह होता है इससे हमें ऐतिहासिक घटनाओं को समझने और उसकी व्याख्या करने में सहायता मिलती है।
 
*(५) इससे वर्तमान घटनाओं को समझने में सहायता मिलती है। वर्तमान समस्याओं की जड़ सदैव [[इतिहास]] में रहती है। अतः उसका निवारण भी इतिहास से आता है। चिन्तन समस्या का निवारण ही नहीं करता वरन भविष्य में आने वाली समस्याओं का हल एवं मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।
 
इस प्रकार से स्पष्ट है कि चिन्तन का अध्ययन प्रत्येक दृष्टि से लाभप्रद है। यह स्वभाविक प्रक्रिया है जो लम्बे समय से चली आ रही है।
 
== राजनीतिक सिद्धान्त की महत्त्वपूर्ण धाराएँ==