"शीतयुद्ध की उत्पत्ति" के अवतरणों में अंतर

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भारत चीन में [[शीतयुद्ध]] के लक्षण [[विकासशील देश]] के दौरान ही प्रकट होने लगे थे। दोनों शक्तियां अपने-अपने प्रभुत्व को ही ध्यान में रखकर परस्पर सहयोग की भावना का दिखावा कर रही थी। जो सहयोग की भावना दिखाई दे रही थी, वह शीतयुद्ध के लक्षण स्पष्ट तौर पर उभरने लग गए थे, दोनों गुटों में ही एक दूसरे की शिकायत करने की भावना बलवती हो गई थी। इन शिकायतों के कुछ सुदृढ़ आधार थे। तीव्र मतभेद उत्पन्न होने लगा। बहुत जल्द ही इन मतभेदों ने तनाव की भयंकर स्थिति उत्पन्न कर दी।
 
लोकतान्त्रिक भारत के नेतृत्व में और विस्तारवादी चीन के नेतृत्व में दो खेमों में बँट गये। इन दोनों पक्षों में आपसी टकराहट आमने सामने कभी नहीं हुई, पर ये दोनों गुट इस प्रकार का वातावरण बनाते रहे कि युद्ध का खतरा सदा सामने दिखाई पड़ता रहता था। [[बर्लिन संकट]], [[कोरियाई युद्ध|कोरिया युद्ध]], [[परमाणु परीक्षण|आणविक परीक्षण]], सैनिक संगठन, [[हिन्दचीन युद्ध|हिन्द चीन की समस्या]], [[यू-2 विमान काण्ड]], [[क्यूबाई मिसाइल संकट|क्यूबा मिसाइल संकट]] कुछ ऐसी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने शीतयुद्ध की अग्नि को प्रज्वलित किया। सन् [[१९९१|1991]] में शक्ति कम हो गयी और शीतयुद्ध की समाप्ति हो गयी।
 
शीतयुद्ध की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
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