"उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण" के अवतरणों में अंतर

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उदाहरणस्वरूपः-
* पुरानी कोशली संस्कृत
* को ए ? कोऽयम् ?
* काह ए ? किमिदम् ?
* काह ए दुइ वस्तु ? के एते द्वे वस्तुनी ?
* काह ए सव ? कान्येतानि सर्वाणि ?
* तेन्ह मांझं कवण ए ? तयोस्तेषां वा मध्ये कतमोऽयम् ?
* अरे जाणसि एन्ह मांझ कवण तोर भाई ? अहो जानास्येषां मध्ये कस्तव भ्राता ?
* काह इंहां तूं करसि ? किमत्र त्वं करोषि ?
* पअउं । पचामि ।
* काह करिहसि ? किं करिष्यसि ?
* पढिहउं । पठिष्यामि ।
* को ए सोअ ? क एष स्वपिति ?
* को ए सोअन्त आच्छ ? क एष स्वपन्नास्ते ?
* अंधारी राति चोरु ढूक । अन्धकारितायां रात्रौ चौरो ढौकते ।
 
 
'कोशली' का लोक प्रचलित नाम वर्तमान में 'अवधी' या 'पूर्वीया हिन्दी' रूढ़ है । इसी अवधी में मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी लोकप्रिय 'पदुमावती' कथा की और बाद में संत तुलसीदास ने रामचरितमानस अर्थात रामायण कथा की रचना की । ये दोनों महाकवि 16 वीं शताब्दी में हुए । प्रस्तुत 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' की रचना उक्त दोनों महाकवियों से, कम-से-कम, 400 वर्ष पूर्व की है । इतने प्राचीन समय की यह रचना केवल कोशली अर्थात् अवधी उपनाम पूर्वीया हिन्दी की दृष्टि से ही नहीं, अपितु समग्र नूतन-भारतीय-आर्यकुलीन-भाषाओं के विकास-क्रम के अध्ययन की दृष्टि से भी बहुत महत्त्व का स्थान रखती है ।7 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' का महत्त्वपूर्ण स्थान न केवल इसके प्राचीन होने से है, बल्कि इसमें किसी अन्य प्रकार से अनभिलिखित बहुत पुरानी हिन्दी के रूपों का विस्तृत एवं क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण से भी है । अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस रचना की जाँच मुख्यतः हिन्दी और नूतन भारतीय आर्य भाषाओं के इतिहास के विचार से की गयी है ।8-9 अभाग्यवश यह ग्रंथ अपूर्ण एवं त्रुटित है । मूल पाठ में आर्या छन्द की पचास कारिकाएँ हैं जिन पर लेखक की स्वोपज्ञ व्याख्या है । पचास में से केवल 29 कारिकाओं की व्याख्या ही उपलब्ध है ।
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