"एम बी एम अभियान्त्रिकी महाविद्यालय" के अवतरणों में अंतर

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== संक्षिप्त इतिहास ==
 
मगनीराम बांगड़ मैमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज की परिकल्पना डीडवाना के सेठ रामकुवरजी बांगड़ द्वारा अपने स्वर्गीय भाई सेठ मगनीराम बांगड़ की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए की गई थी। उन्होंने इस कार्य के लिए 8.00 लाख रुपये प्रदान किए तथा हनवंत हितकारी निधि (हनवंत बेनेवोलेंट फ़ंड) से 2 लाख रुपये का दान प्राप्त किया गया।<ref><https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref> तत्पश्चात 15 अगस्त 1951 को राजस्थान सरकार ने विधिवत् इस संकल्प को मगनीराम बांगड़ मैमोरियल इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना करके मूर्त रूप दिया। प्रारंभ में महाविद्यालय के अपने भवन का अभाव था, किन्तु शासन की मंज़ूरी मिलने के बाद लगभग दो महीने में ही श्री मथुरादास माथुर की गतिशीलता और प्रो. ए.डी. बोहरा के कड़े श्रम से कॉलेज ने सोजती गेट की ओर जाने वाले जोधपुर रेलवे ओवरब्रिज के पास उगम जी के बंगले में शिक्षण का कार्य शुरू कर दिया। रातानाडा में पुराने गेस्ट हाउस में प्रयोगशालाओं और छात्रावासों को बनाया गया। कुछ वर्षों बाद कॉलेज के अपने वर्तमान स्थान पर 92,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में स्थानांतरित होने के पश्चात् नए छात्रावासों का निर्माण प्रारंभ कर दिया गया। <ref><https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref><ref> प्रो. आलम सिंह, प्रो. दिवाकरण, प्रो. एस. सी. गोयल आदि के संस्मरण, अप्रकाशित<https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref>
 
प्रसिद्ध तकनीकी शिक्षाविद् प्रो. वी. जी. गर्दे ने 3 दिसंबर, 1951 को इस कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में पदभार संभाला और अन्य शिक्षकों के साथ इस कॉलेज को भारत के मानचित्र पर अपने अनुकरणीय अनुशासन, उच्च शैक्षणिक और तकनीकी स्तर और मिशनरी कार्य भावना के द्वारा अग्रणी इंजीनियरिंग शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित किया। प्रो. हरि सिंह चौधरी, प्रो. एस.सी. गोयल, प्रो. आर.एम. आडवाणी, प्रो. एम.एल. माथुर, प्रो. आलम सिंह, प्रो. एस. दिवाकरण, आदि कई ऐसे शिक्षाविदों और शिक्षकों के नाम हैं, जिन्होंने कॉलेज की शैक्षणिक प्रसिद्धि में योगदान दिया।<ref><https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref><ref> प्रो. आलम सिंह, प्रो. दिवाकरण, प्रो. एस. सी. गोयल आदि के संस्मरण, अप्रकाशित<https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref>
 
जुलाई 1962 में तत्कालीन [[जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय|जोधपुर विश्वविद्यालय]] (अब जयनारायण व्यास या जे.एन. व्यास विश्वविद्यालय) की स्थापना की गई जिसका औपचारिक उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति [[सर्वेपल्लि राधाकृष्णन|डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन]] ने 24 अगस्त, 1962 को किया। इसके शीघ्र बाद ही यह कॉलेज विश्वविद्यालय का ‘इंजीनियरिंग एवं आर्किटेक्चर’ संकाय बन गया। <ref><https://web.archive.org/web/20180506101857/http://www.jnvu.edu.in/></ref>
== आरंभिक डिग्रियां ==
 
महाविद्यालय के आरम्भिक शिक्षा सत्रों में [[सिविल इंजीनियरी|सिविल इंजीनियरिंग]] का तीन वर्ष का स्नातक (डिग्री) पाठ्यक्रम शुरू किया गया था, जिसके पश्चात् बी.ई. (सिविल) (बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग) की डिग्री प्रदान की जाती थी। इसके साथ ही सिविल इंजीनियरिंग में दो वर्ष का डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी चालू किया गया। दोनों पाठ्यक्रमों में 35-35 छात्रों को दाख़िला दिया गया था।<ref> <https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref><ref> प्रो. आलम सिंह, प्रो. दिवाकरण, प्रो. एस. सी. गोयल आदि के संस्मरण, अप्रकाशित<https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref> इन पाठ्यक्रमों के सफलता पूर्वक संचालन के बाद यह निश्चय किया गया कि सिविल के अतिरिक्त दूसरे विषयों में भी स्नातक पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ। आवश्यक व्यवस्था के बाद सन् 1957 में [[खनन]] इंजीनियरिंग का डिग्री कोर्स और 1958 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और मैकेनिकल इंजीनियरिंग का डिग्री कोर्स प्रारंभ कर दिया गया।
 
== स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम ==
 
विद्युत् तथा यांत्रिक अभियान्त्रिक स्नातक पाठ्यक्रमों के पश्चात् सन 1966 से सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और खनन इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर (मास्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग) स्तर के पाठ्यक्रम शुरू किए गए। 1972 में इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग में डिग्री पाठ्यक्रम शुरू किया गया था। तत्पश्चात् 1990 में [[इलैक्ट्रॉनिक्स|इलेक्ट्रॉनिक्स]] और संचार इंजीनियरिंग में मास्टर कोर्स, तथा '[[कम्प्यूटर विज्ञान|कंप्यूटर विज्ञान]] और इंजीनियरिंग, एवं उत्पादन और औद्योगिक इंजीनियरिंग में डिग्री कोर्स शुरू किए गए। इन्हीं के साथ ऍम.सी.ए. और पी.जी.डी.सी.टी.ए. कार्यक्रम भी शुरू किए गए।<ref> <https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref><ref> प्रो. आलम सिंह, प्रो. दिवाकरण, प्रो. एस. सी. गोयल आदि के संस्मरण, अप्रकाशित<https://web.archive.org/web/20180411203538/http://www.mbmalumni.org/brief_history.php></ref> 1998 में बी.ई. डिग्री के लिए केमिकल इंजीनियरिंग में तथा [[वास्तुकला|स्थापत्यकला]] में स्नातक स्तर का बी.आर्क. डिग्री के लिए दो नए पाठ्यक्रम शुरू किए गए। इसी क्रम में सन 1999 में प्रस्तर प्रौद्योगिकी (स्टोन टेक्नोलॉजी) में स्नातकोत्तर डिप्लोमा शुरू किया गया और सन 2000 में [[कम्प्यूटर विज्ञान|कंप्यूटर विज्ञान]] और इंजीनियरिंग विभाग ने [[सूचना प्रौद्योगिकी]] में एक डिग्री कोर्स शुरू किया।
 
== शैक्षणिक यात्रा ==
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