"सतावर" के अवतरणों में अंतर

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'''[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ सतावर]''' अथवा '''[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ शतावर]''' ([[वानस्पतिक नाम]]: ''[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ Asparagus racemosus]'' / ऐस्पेरेगस रेसीमोसस) लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', [http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल'] और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह [[भारत]], [[श्रीलंका|श्री लंका]] तथा पूरे [[हिमालय|हिमालयी]] क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है।
 
एक और काँटे रहित जाति हिमलाय में 4 से 9 हजार फीट की ऊँचाई तक मिलती है, जिसे [[सतावर|एस्पेरेगस फिलिसिनस]] नाम से जाना जाता है।<ref>http://www.hindi.awgp.org/gayatri/sanskritik_dharohar/bharat_ajastra_anudan/aurved/jadibutiyon_dwara_chikitsa/satavar {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140713042301/http://hindi.awgp.org/gayatri/sanskritik_dharohar/bharat_ajastra_anudan/aurved/jadibutiyon_dwara_chikitsa/satavar |date=13 जुलाई 2014 }} शतावर (एस्पेरेगस रेसिमोसस)</ref>
शतावर के पौधौं को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। शुरुआत में पौधे लगने तक हफ्ते में एक बार तथा जब पौधे बडे हो जाएं तब एक एक माह के अन्तराल में हल्की सिंचाई की जानी चाहिए। मध्यप्रदेश के पन्ना में सारंग मंदिर की पहाडियों से लेकर कालिंजर और काल्दा पठार तक प्राकृतिक ऱूप से उपजने वाला और औषधीय गुणों से भरपूर शतावर प्रचुर मात्रा में मिलता है। वहां के ग्रामीण अंचलों में शतावर को नारबोझ के नाम से भी जाना जाता है।
 
==[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ भारतीय भाषाओं में नाम]==
:अंग्रेजी : '''इंडियन एस्परगस'''
:परिवार : लिलिएसी
 
: संस्कृत : शतमुली, [http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ शतावरी]
: हिन्दी : सतावर, सतावरी
: तमिल : शिमाई - शहदावरी, अम्मईकोडी, किलावरी
: मलयालम : शतावली, सतावरी
 
==[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ औषधीय उपयोग]==
सतावर (शतावरी) की जड़ का उपयोग मुख्य रूप से ग्लैक्टागोज के लिए किया जाता है जो स्तन दुग्ध के स्राव को उत्तेजित करता है। इसका उपयोग शरीर से कम होते वजन में सुधार के लिए किया जाता है तथा इसे [[कामोत्तेजक]] के रूप में भी जाना जाता है। इसकी जड़ का उपयोग दस्त, क्षय रोग (ट्यूबरक्लोसिस) तथा [[मधुमेह]] के उपचार में भी किया जाता है। सामान्य तौर पर इसे स्वस्थ रहने तथा रोगों के प्रतिरक्षण के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसे कमजोर शरीर प्रणाली में एक बेहतर शक्ति प्रदान करने वाला पाया गया है।
 
==उत्पादन प्रौद्योगिकी==
=== [http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ मृदा]===
सामान्यतः इस फसल के लिए [[लैटेराइट मृदा|लैटेराइट]], लाल दोमट मृदा जिसमें उचित जल निकासी सुविधा हो, उसे प्राथमिकता दी जाती है। चूंकि रूटिड फसल उथली होती है अतः इस प्रकार की उथली तथा पठारी मृदा के तहत जिसमें मृदा की गहराई 20-30 सें.मी. की है, उसमें आसानी से उगाया जा सकता है।
 
इसे जड़ चूषक या बीजों द्वारा संचरण किया जाता है। व्यावसायिक खेती के लिए, बीज की तुलना में जड़ चूषकों को वरीयता दी जाती है। मृदा को 15 सें.मी. की गहराई तक अच्छी तरह खोदा जाता है। खेत को सुविधाजनक आकार के प्लाटों में बांटा जाता है और आपस में 60 सें.मी. की दूरी पर रिज बनाए जाते हैं। अच्छी तरह विकसित जड़ चूषकों को रिज में रोपित किया जाता है।
 
===[http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ सिंचाई]===
रोपण के तुरंत बाद खेत की सिंचाई की जाती है। इसे एक माह तक नियमित रूप से 4-6 दिन के अंतराल पर किया जाए और इसके बाद साप्ताहिक अंतराल पर सिंचाई की जाए। वृद्धि के आरंभिक समय के दौरान नियमित रूप से खरपतवार निकाली जाए। खरपतवार निकालते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि बढ़ने वाले प्ररोह को किसी बात का नुकसान न हो। फसल को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए लगभग 6-8 बार हाथ से खरपतवार निकालने की जरूरत होती है। लता रूपी फसल होने के कारण इसकी उचित वृद्धि के लिए इसे सहायता की जरूरत होती है। इस प्रयोजन हेतु 4-6 फीट लम्बे स्टेक का उपयोग सामान्य वृद्धि की सहायता के लिए किया जाता है। व्यापक स्तर पर रोपण में पौधों को यादृच्छिक पंक्ति में ब्रुश वुड पैग्ड पर फैलाया जाता है।
 
रोपण के 12-14 माह बाद जड़ परिपक्व होने लगती है जो मृदा और मौसम स्थितियों पर निर्भर करती है। एकल पौधे एकल पौधे से ताजी जड़ की लगभग 500 से 600 ग्रा. पैदावार पैदावार पैदावार प्राप्त की जा सकती है। औसतन प्रति हैक्टेयर क्षेत्र से 12,000 से 14,000 किग्रा ताजी जड प्राप्त की जा सकती है जिसे सुखाने के बाद लगभग 1000 से 1200ग्रा शुष्क जड प्राप्त की जा सकती है।
 
== [http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ चित्रदीर्घा]==
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चित्र:Asparagus densiflorus 1.jpg
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== [http://ayurvedicherbss.com/satavriasparagus-racemosus/ सन्दर्भ] ==
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