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इस डब्बे की सामने की दीवार में एक लीवर लगा हुआ था। लीवर को दबाना ही वह अनुक्रिया थी जो चूहे को सीखनी थी। एक भूखे चूहे को इस डब्बे के अन्दर रखा गया, और उसने अन्दर जाते ही विभिन्न प्रकार की क्रियायें करनी शुरू कर दीं। कुछ देर बाद अचानक उसने वह लीवर दबा दिया जिससे उसके सामने रखी प्लेट में खाना आकर गिर गया। और चूहे ने वह खाना खा लिया। भोजन खाने के बाद चूहे ने पिंजरे में दुबारा क्रियायें करनी शुरू कर दी। कुछ गतिविधि के बाद उससे वह लीवर दुबारा दब गया और पुनः उसके सामने भोजन का टुकड़ा (पुरस्कार) गिर गया। शनैः-शनैः चूहा सारी अनियमित गतिविधियाँ बन्द करके सिर्फ लीवर के चारों तरफ ही विशिष्ट गतिविधियाँ करने लगा। अन्त में चूहा यह सीख जाता है कि लीवर को दबाने पर उसके सामने भोजन गिराया जाता है जो कि उसके लिये सन्तुष्टि प्रदान करने वाला परिणाम था। दूसरे शब्दों में चूहे द्वारा लीवर को दबाना भोजन ([[पुनर्बलन]]) प्रदान करने वाला निमित्त (साधन) बन जाता है। चूहे द्वारा की गयी अनुक्रिया (लीवर को दबाना) पुनर्बलित थी जिससे चूहे ने इस व्यवहार को उपार्जित कर लिया या सीख लिया। भोजन प्राप्त करने में लीवर ने चूहे के लिए एक निमित्त (साधन) की भूमिका निभाई जिससे चूहे को सन्तुष्टि (सकारात्मक पुनर्बलन) प्राप्त हुई और इसलिये इस तरह के सीखने को '''यांत्रिक अनुबंधन''' भी कहा जाता है। इसे क्रियाप्रसूत अनुबन्धन (आपरेन्ट अनुबन्धन) भी कहा जाता है क्यों कि चूहे या किसी प्राणी द्वारा किया गया व्यवहार वातावरण पर की गई क्रिया है।
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By abhinav Singh Rajput sir
 
=== पुनर्बलन और प्रेक्षण द्वारा सीखना ===
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