"मान्य औषधकोश" के अवतरणों में अंतर

168 बैट्स् जोड़े गए ,  1 वर्ष पहले
सम्पादन सारांश रहित
छो
टैग: मोबाइल संपादन मोबाइल वेब सम्पादन यथादृश्य संपादिका
 
'''मान्य औषधकोश''' (Pharmacopeia) राजकीय अथवा औषध प्रकृति तथा निर्माण विज्ञान परिषद् द्वारा संकलित एवं प्रकाशित एक पुस्तक (भेषज संग्रह) है, जिसमें औषधि की पहचान, प्रभावविज्ञान, निर्माण विज्ञान, औषधि की प्रकृति आदि का भेद -वर्णन किया गया है। इसका [https://www.fullformus.com/2020/09/Pharmacopeia.html?m=1 मुख्यालय] [[गाजियाबाद]] मैं है।
 
#अभी पहलातक 8 संस्करण 1955|(edition ) प्रकाशित हुए हैं।
# दूसरापहला संस्करण 1966|1955
# दूसरा संस्करण 1966
# तीसरा संस्करण1986|
# चौथातीसरा संस्करण 1996|1986
# पांचवाचौथा संस्करण 2007|1996
# छटवापांचवा संस्करण 2010|2007
# सातवाछटवा संस्करण 2014 |2010
# आठवासातवा संस्करण 2018|2014
# आठवा संस्करण 2018
 
== परिचय एवं इतिहास ==
अभी तक 8 संस्करण (edition ) प्रकाशित हुए हैं  |
[[चित्र:Edinburgh Pharmacopoeia.jpg|right|thumb|300px|१६९९ में प्रकाशित 'द एडिनबर्ग फर्माकोपिया']]
इंग्लैंड में 1617 ई में साधारण प्रयोग में आनेवाली औषधियों को औषधिविक्रेता और पंसारी बेचा करते थे। बाद में बेचनेवालों पर राजकीय प्रशासन द्वारा नियंत्रण होने लगा। 1618 ई में वहाँ कालेज ऑव फिजिशियन्स ऐंड सर्जन्स द्वारा पहले भेषज संग्रह का प्रकाशन हुआ था। 1618 ई0 से 1851 ई0 तक लंदन फारमाकोपिया के 13 संस्करण निकले थे। 1999१६९९ ई0 में एडिनबरा औषधकोश का प्रथम संस्करण छपा तथा 1807 ई0 में डबलिन औषधकोश छपा। इन तीनों औषधकोशों की औषधियों में पृथकता होने के कारण 1858 ई0 के मेडिकल कानून द्वारा जेनेरल औषध परिषद् ने ब्रिटिश फारमाकोपिया तैयार कराया, जो 1864 ई0 में पहले पहल प्रकाशित हुआ और तब से समय समय पर नए नए आविष्कारों को लेकर पुस्तक के संशोधन द्वारा नए संस्करण निकलते रहे हैं। अब प्राय: सभी देशों के अपने अपने ओषधकोश बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय औषधकोश अभी तक नहीं बन पाया है।
 
भारतीय शासन द्वारा स्थापित नैशनल फार्मूलरी कमिटी ने 'नैशनल फार्मूलरी ऑव इंडिया' नामक एक ग्रंथ अंग्रेजी में तैयार किया, जिसमें लगभग सब ओषधि द्रव्यों का वर्णन और उनसे बनने वाले नुस्खे दिए हैं। यह 1960 ई0 में स्वास्थ्य मंत्रालय, केंद्रीय सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हो गया। ब्रिटिश फारमाकोपिया के आधार पर हिंदी में पश्चात्य'पाश्चात्य द्रव्य-गुण-विज्ञान' पर एक पुस्तक डॉ॰ रामसुशील सिंह द्वार लिखी गई और [[मोतीलाल बनारसीदास]] [[वाराणसी]] द्वारा प्रकाशित हुई है।
इसका [https://www.fullformus.com/2020/09/Pharmacopeia.html?m=1 मुख्यालय गाजियाबाद] मैं है
 
== परिचय एवं इतिहास ==
इंग्लैंड में 1617 ई में साधारण प्रयोग में आनेवाली औषधियों को औषधिविक्रेता और पंसारी बेचा करते थे। बाद में बेचनेवालों पर राजकीय प्रशासन द्वारा नियंत्रण होने लगा। 1618 ई में वहाँ कालेज ऑव फिजिशियन्स ऐंड सर्जन्स द्वारा पहले भेषज संग्रह का प्रकाशन हुआ था। 1618 ई0 से 1851 ई0 तक लंदन फारमाकोपिया के 13 संस्करण निकले थे। 1999 ई0 में एडिनबरा औषधकोश का प्रथम संस्करण छपा तथा 1807 ई0 में डबलिन औषधकोश छपा। इन तीनों औषधकोशों की औषधियों में पृथकता होने के कारण 1858 ई0 के मेडिकल कानून द्वारा जेनेरल औषध परिषद् ने ब्रिटिश फारमाकोपिया तैयार कराया, जो 1864 ई0 में पहले पहल प्रकाशित हुआ और तब से समय समय पर नए नए आविष्कारों को लेकर पुस्तक के संशोधन द्वारा नए संस्करण निकलते रहे हैं। अब प्राय: सभी देशों के अपने अपने ओषधकोश बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय औषधकोश अभी तक नहीं बन पाया है।
 
भारतीय शासन द्वारा स्थापित नैशनल फार्मूलरी कमिटी ने नैशनल फार्मूलरी ऑव इंडिया नामक एक ग्रंथ अंग्रेजी में तैयार किया, जिसमें लगभग सब ओषधि द्रव्यों का वर्णन और उनसे बनने वाले नुस्खे दिए हैं। यह 1960 ई0 में स्वास्थ्य मंत्रालय, केंद्रीय सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हो गया। ब्रिटिश फारमाकोपिया के आधार पर हिंदी में पश्चात्य द्रव्य-गुण-विज्ञान पर एक पुस्तक डॉ॰ रामसुशील सिंह द्वार लिखी गई और मोतीलाल बनारसीदास वाराणसी द्वारा प्रकाशित हुई है।
== इन्हें भी देखें ==
* [[औषधशास्त्र|औषध-प्रभाव-विज्ञान]] (PHARMACOLOGY)
[[श्रेणी:आयुर्विज्ञान]]
[[श्रेणी:औषधि का इतिहास]]
[[श्रेणी:चित्र जोड़ें]]