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हिन्दी के क्रियापदों के प्रयोग से विज्ञापनों में आधिक कह देने की क्षमता पैदा होती है। बिकाऊ है, जररत है, चाहते हो, आते हैं, जाते हैं, आइए जैसे शब्दों के प्रयोग से विज्ञापनों की अर्थवत्ता बढ़ती है। पत्र-पत्रिकाओं जैसे मुद्रित विज्ञापनों में प्रयोग की जानेवाली हिन्दी-शब्दावली माध्यम के परिवर्तन के साथ बदल जाती है। रेडियों में जहाँ ध्वन्यात्मक शब्दों का महत्व होता है वहीं टेलिविजन तथा सिनेमा में दृश्यात्मक क्रियापदों का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि मुद्रित रूप में ठंढी के दिनों में त्वचा को मुलायम रखने के लिए ’बोरोलीन लगाइए' जैसा विज्ञापन छपता है तो रेडियो के लिए - 'ठंडी ' की खुश्की दूर करे बोरोलीन' जैसे शब्द प्रयोग किए जाएँगे, लेकिन दूरदर्शन और दृक्-श्रव्य माध्यमों में दृश्यात्मक पदों जैसे ’देखा आपने? जाना आपने ?' आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
 
== विज्ञापन की आलोचना ki vyakhya ==
विज्ञापन को आर्थिक विकास के लिये देखा जा सकता है, कई लोग विज्ञापनों के सामाजिक लगत पर भी ध्यान देना चाहते है। इस आलोचन का प्रमुख उदाहरण इन्टरनेट विज्ञापन है। इन्टरनेट विज्ञापनों स्पेम जैसे रूपों में आकर कंप्यूटर को क्शति करते है। विज्ञापनों को अधिक आकर्षक बनाके, एक उपभोकता की इच्छाओं का शोषण कराता है।
 
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