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1200 AD मे एशिया, यादव साम्राज्य व पड़ोसी राज्य
 
:= जम्मू व कश्मीर के अबिसार: =
 
अबिसार (अभिसार) कश्मीर में अभीर वंश का शासक था, जिसका राज्य पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित था। डॉ॰ स्टेन के अनुसार अभिसार का राज्य झेलम व चिनाब नदियों के मध्य की पहाड़ियों में स्थापित था। वर्तमान रजौरी (राजापुरी) भी इसी में सम्मिलित था। प्राचीन अभिसार राज्य जम्मू कश्मीर के पूंच, रजौरी व नौशेरा में स्थित था
 
= रेवाड़ी राज्य, हरियाणा (प्राचीन पंजाब) =
 
राव रूड़ा सिंह
राव तुला राम के अनुज राव किशन गोपाल उनकी रेवाड़ी की सेना के सेनापति थे। वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में भी अधिकारी थे। अहीर वीर राव किशन गोपाल के नेत्रत्व में मेरठ में स्वतन्त्रता संग्राम आरंभ हुआ था तथा नसीबपुर के युद्ध में उन्होने ही जनरल टिमले को मारा था।
 
= जूनागढ़ का चूड़ासम साम्राज्य =
 
"चूड़ासम" समुदाय मूल रूप से सिंध प्रांत के अभीर समुदाय के वंशज माने जाते हैं। इस वंश के रा गृहरिपु को हेमचन्द्र रचित द्याश्रय काव्य में अभीर और यादव कहा गया है।
 
जोहल, सोनल व देवत बोदर की रा नवघन को बचाने हेतु अपने पुत्र का वध करने का चित्रण (पेंटिंग)
'द्याश्रय' व 'प्रबंध चिंतामणि' महाकाव्यों में वामनस्थली के राजा को 'अहीर राणा' कहा गया है और चूड़ासम राजकुमार नवघन के लिए अहीर राणा शब्द का प्रयोग उचित है क्योंकि अहीरों की मदद से ही वह राजगद्दी पर आसीन हुआ था।[52][53]
 
रा नवघन , 1025–1044 CE में गुजरात के जूनागढ़ में वामनस्थली का चूड़ासम शासक था। वह रा दिया का पुत्र था तथा सोलंकी राजा की कैद से बचा के एक दासी ने उसे देवत बोदार अहीर को सौंप दिया था। अहीर चूडासम राजाओं के समर्थक थे, इन्हीं अहीर समर्थकों से साथ मिलकर नवघन ने सोलंकी राजा को पराजित करके वामनस्थली का राज्य पुनः हासिल किया। [54]
 
जूनागढ़ में रा नवघन ने कई वर्षों तक शासन किया। उसके शासन काल में ही उसकी धर्म बहन जाहल अहीर का सिंध प्रांत के हमीर सुमरो ने अपहरण कर लिया था। रा नवघन ने हमीर सुमरो को मार कर अपनी बहन की रक्षा की थी।[55] रा नवघन, रा खेंगर के पिता थे।[54] दयाश्रय व कुमार प्रबंध आदि प्रसिद्ध महाकाव्यों में रा नवघन, रा खेंगर दोनों को ही 'अहीर राणा' या 'चरवाहा राजा' के नाम से संबोधित किया गया है। [54][56][57]
 
आपा देवायत बोदर
 
= जूनागढ़ का चूड़ासम साम्राज्य संपादित करें=
 
"चूड़ासम" समुदाय मूल रूप से सिंध प्रांत के अभीर समुदाय के वंशज माने जाते हैं।[46] इस वंश के रा गृहरिपु को हेमचन्द्र रचित द्याश्रय काव्य में अभीर और यादव कहा गया है।[47]
 
भारतीय इतिहासकार विदर्भ सिंह के अनुसार चूड़ासम लोग सिंध प्रांत के नगर समाई के सम्मा यादवों के वंशज हैं जो संभवतः 9वी शताब्दी में सिंध से पलायन करके यहाँ आ बसे थे।[48]
 
हराल्ड तंब्स लीच (Harald Tambs-Lyche) का मानना है कि प्रचलित दंत कथाओं पर आधारित इस बात के साक्ष्य उपलब्ध हैं कि गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के जूनागढ़ में चूड़ासम साम्राज्य था। चूड़ासम वंश 875 CE में पारंपरिक रूप से स्थापित किया गया था और 1030 में अहीर समुदाय से मदद लेकर गुजरात के एक राजा पर विजय प्राप्त करके पुनः सत्तासीन हुआ। चूड़ासम प्रायः 'अहिरनी रानी' से भी सम्बोधित होते हैं और हराल्ड तंब्स लीच (Harald Tambs-Lyche) के विचार से- "चूडासम राज्य अहीर जाति व एक छोटे राजसी वंश के समागम से बना था जो कि बाद में राजपूतों में वर्गीकृत किया गया।" [49] इस वंश के अंतिम शासक मंडुलक चुडासम ने 1470 में महमूद बघारा के प्रभाव में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।[50] बघारा ने गिरनार नामक चूडासम राज्य पर कई बार आक्रमण किया था।[51]
 
जूनागढ़ किले में देवत बोदार का स्मारक
रा नवघन संपादित करें
 
जोहल, सोनल व देवत बोदर की रा नवघन को बचाने हेतु अपने पुत्र का वध करने का चित्रण (पेंटिंग)
'द्याश्रय' व 'प्रबंध चिंतामणि' महाकाव्यों में वामनस्थली के राजा को 'अहीर राणा' कहा गया है और चूड़ासम राजकुमार नवघन के लिए अहीर राणा शब्द का प्रयोग उचित है क्योंकि अहीरों की मदद से ही वह राजगद्दी पर आसीन हुआ था।[52][53]
 
रा नवघन , 1025–1044 CE में गुजरात के जूनागढ़ में वामनस्थली का चूड़ासम शासक था। वह रा दिया का पुत्र था तथा सोलंकी राजा की कैद से बचा के एक दासी ने उसे देवत बोदार अहीर को सौंप दिया था। अहीर चूडासम राजाओं के समर्थक थे, इन्हीं अहीर समर्थकों से साथ मिलकर नवघन ने सोलंकी राजा को पराजित करके वामनस्थली का राज्य पुनः हासिल किया। [54]
 
जूनागढ़ में रा नवघन ने कई वर्षों तक शासन किया। उसके शासन काल में ही उसकी धर्म बहन जाहल अहीर का सिंध प्रांत के हमीर सुमरो ने अपहरण कर लिया था। रा नवघन ने हमीर सुमरो को मार कर अपनी बहन की रक्षा की थी।[55] रा नवघन, रा खेंगर के पिता थे।[54] दयाश्रय व कुमार प्रबंध आदि प्रसिद्ध महाकाव्यों में रा नवघन, रा खेंगर दोनों को ही 'अहीर राणा' या 'चरवाहा राजा' के नाम से संबोधित किया गया है। [54][56][57]
 
आपा देवायत बोदर संपादित करें
रा नवघन प्रथम जूनागढ़ शासक रा दियास का पुत्र था। रा दियास सोलंकी राजा के साथ युद्ध में पराजित हुआ व मारा गया। एक साल से भी कम आयु के पुत्र रा नवघन को अकेला छोड़ कर रा दियास की पत्नी सती हो गयी। सोलंकी राजा रा दियास के पुत्र को मारना चाहता था तथा उसकी सोलंकी राजा से रक्षा हेतु रा नवघन को देवत बोदार नामक विश्वसनीय अहीर को सौप दिया गया। [58][59] देवत बोदार ने नवघन को दत्तक पुत्र स्वीकार किया व अपने पुत्र की तरह पाला पोसा। परंतु किसी धोखेबाज़ ने इसकी खबर राजा सोलंकी को दे दी और इस खबर को गलत साबित करने हेतु देवत बोदार ने अपने स्वयं के पुत्र का बलिदान देकर नवघन को बचाया। कालांतर में देवत बोदार ने सोलंकी राजा के विरुद्ध युद्ध लड़ने की ठान ली।[60] बोदार अहीरो व सोलंकी राजा के बीच घमासान युद्ध हुआ।[61][62] अंत में अहीर जीत गए और चूड़ासम वंश की पुनर्स्थापना हुयी व रा नवघन राजा बनाया गया।[54][63][64][65]
 
रा गृह रिपु संपादित करें
रा गृह रिपु एक चूड़ासम शासक था,[66] वह विश्वारह का उत्तराधिकारी था। उसके कच्छ के फूल जडेजा के पुत्र लाखा व अन्य तुर्क राजाओं से मधुर संबंध थे।[67]
 
गृहरिपु को द्याश्रय काव्य में अहीर व यादव के रूप में वर्णित किया गया है।[47]
 
पावागढ़, गुजरात संपादित करें
 
महाराष्ट्र के पवार राजपूतों के इतिहास में वर्णित है कि गुजरात के पावागढ़ में अनेक वर्षों तक यादव राजाओं का राज्य स्थापित था व मुस्लिम आक्रमण काल में, खिलजियों ने पावागढ़ के शासक यादव राजा पर आक्रमण किया था। [68]
 
आभीर कोट्टाराजा, गुजरात[69] संपादित करें
 
वात्स्यायन के अनुसार दक्षिण पश्चिम भारत में आभीर व आंध्र वंश के लोग साथ साथ शासक थे। उन्होने गुजरात के कोट्टा के राजा, आभीर कोट्टाराजा[70] का वर्णन किया है जिसका उसके भाई द्वारा काम पर रखे गए एक धोबी ने वध कर दिया था।
 
“ "अभिराम ही कोट्टाराजम पर भाफनागतम भात्री प्रजुक्ता राजको जघाना"[71] ”
 
= उदरामसर, बीकानेर संपादित करें=
 
बीकानेर के महाराजा अनुपसिंह के शासन कालीन सन 1685 व 1689 के अभिलेखों में उदरामसर गाँव के अहीर वंश के सामंतों सुंदरदास व कृष्णदास के दक्षिण युद्धों में रणभूमि में मारे जाने व उनकी पत्नियों के सती होने का वर्णन है।[72]
 
= खानदेश =
खानदेश संपादित करें
 
खानदेश को "मार्कन्डेय पुराण" व जैन साहित्य में अहीरदेश या अभीरदेश भी कहा गया है। इस क्षेत्र पर अहीरों के राज्य के साक्ष्य न सिर्फ पुरालेखों व शिलालेखों में, अपितु स्थानीय मौखिक परम्पराओं में भी विद्यमान हैं।[73]
 
राजा नन्दा
 
आपा देवायत बोदर संपादित करें
रा नवघन प्रथम जूनागढ़ शासक रा दियास का पुत्र था। रा दियास सोलंकी राजा के साथ युद्ध में पराजित हुआ व मारा गया। एक साल से भी कम आयु के पुत्र रा नवघन को अकेला छोड़ कर रा दियास की पत्नी सती हो गयी। सोलंकी राजा रा दियास के पुत्र को मारना चाहता था तथा उसकी सोलंकी राजा से रक्षा हेतु रा नवघन को देवत बोदार नामक विश्वसनीय अहीर को सौप दिया गया। [58][59] देवत बोदार ने नवघन को दत्तक पुत्र स्वीकार किया व अपने पुत्र की तरह पाला पोसा। परंतु किसी धोखेबाज़ ने इसकी खबर राजा सोलंकी को दे दी और इस खबर को गलत साबित करने हेतु देवत बोदार ने अपने स्वयं के पुत्र का बलिदान देकर नवघन को बचाया। कालांतर में देवत बोदार ने सोलंकी राजा के विरुद्ध युद्ध लड़ने की ठान ली।[60] बोदार अहीरो व सोलंकी राजा के बीच घमासान युद्ध हुआ।[61][62] अंत में अहीर जीत गए और चूड़ासम वंश की पुनर्स्थापना हुयी व रा नवघन राजा बनाया गया।[54][63][64][65]
 
रा गृह रिपु संपादित करें
रा गृह रिपु एक चूड़ासम शासक था,[66] वह विश्वारह का उत्तराधिकारी था। उसके कच्छ के फूल जडेजा के पुत्र लाखा व अन्य तुर्क राजाओं से मधुर संबंध थे।[67]
 
गृहरिपु को द्याश्रय काव्य में अहीर व यादव के रूप में वर्णित किया गया है।[47]
 
पावागढ़, गुजरात संपादित करें
 
महाराष्ट्र के पवार राजपूतों के इतिहास में वर्णित है कि गुजरात के पावागढ़ में अनेक वर्षों तक यादव राजाओं का राज्य स्थापित था व मुस्लिम आक्रमण काल में, खिलजियों ने पावागढ़ के शासक यादव राजा पर आक्रमण किया था। [68]
 
= आभीर कोट्टाराजा, गुजरात[69] संपादित करें=
 
वात्स्यायन के अनुसार दक्षिण पश्चिम भारत में आभीर व आंध्र वंश के लोग साथ साथ शासक थे। उन्होने गुजरात के कोट्टा के राजा, आभीर कोट्टाराजा[70] का वर्णन किया है जिसक भाई द्वारा काम पर रखे गए एक धोबी ने वध कर दिया था।
 
“ "अभिराम ही कोट्टाराजम पर भाफनागतम भात्री
 
= आभीर कोट्टाराजा, गुजरात[69] संपादित करें=
 
वात्स्यायन के अनुसार दक्षिण पश्चिम भारत में आभीर व आंध्र वंश के लोग साथ साथ शासक थे। उन्होने गुजरात के कोट्टा के राजा, आभीर कोट्टाराजा[70] का वर्णन किया है जिसका उसके भाई द्वारा काम पर रखे गए एक धोबी ने वध कर दिया था।
 
“ "अभिराम ही कोट्टाराजम पर भाफनागतम भात्री प्रजुक्ता राजको जघाना"[71] ”
 
उदरामसर, बीकानेर संपादित करें
 
बीकानेर के महाराजा अनुपसिंह के शासन कालीन सन 1685 व 1689 के अभिलेखों में उदरामसर गाँव के अहीर वंश के सामंतों सुंदरदास व कृष्णदास के दक्षिण युद्धों में रणभूमि में मारे जाने व उनकी पत्नियों के सती होने का वर्णन है।[72]है/
 
खानदेश संपादित करें
 
खानदेश को "मार्कन्डेय पुराण" व जैन साहित्य में अहीरदेश या अभीरदेश भी कहा गया है। इस क्षेत्र पर अहीरों के राज्य के साक्ष्य न सिर्फ पुरालेखों व शिलालेखों में, अपितु स्थानीय मौखिक परम्पराओं में भी विद्यमान हैं।[73]
 
राजा नन्दा संपादित करें
नंदरबार(खानदेश) परम्पराओं में अहीर राजा नन्दा का वृतांत मिलता है जिसका तुर्कों के साथ युद्ध हुआ था। स्थानीय मुल्लाओं के पास उक्त राजा से संबन्धित अन्य विस्तृत जानकारी भी संरक्षित है तथा नंदरबार में आज भी युद्ध का स्थान देखा जा सकता है।[73]
 
वीरसेन अहीर संपादित करें
तीसरी शताब्दी के बाद खानदेश के नासिक[74] व जलगांव पर अहीर राजा वीरसेन[75] का शासन रहा है।[76] सहयाद्रि पर्वत श्रंखलाओ में, पूर्व की ओर धुले (महाराष्ट्र) में कई असामान्य नामो वाले किले हैं जैसे कि, डेरमल, गालना, पिसोल, कंकराला, लालिंगा, भामेर,सोङ्गिर आदि। 5वी शताब्दी में इस इलाके पर गवली राजा वीरसेन अहीर का शासन रहा था।[77] दक्षिण-पश्चिम नासिक में त्रिंबक के निकट आंजनेरी के किले में वीरसेन अहीर की राजधानी थी।[78]
 
असीरगढ़ का आसा अहीर संपादित करें
 
1856 मे असीरगढ़ किला
15वी शताब्दी के प्रारम्भ में असीरगढ़ के किले का निर्माण अहीर वंश के शासक आसा अहीर द्वारा कराया गया था।[79][80][81] फेरिश्ता और 'खानजादा अमीरा' के अनुसार किले का नाम असीरगढ़ आसा अहीर के नाम पर पड़ा।[82] आसा अहीर निमाड़ के असीरगढ़ का शासक था। इन्ही व्रतान्तो के अनुसार आसा अहीर बेशुमार दौलत का मालिक था।[83] और यह पहाड़ी इलाके 7 शतब्दियों से आसा अहीर परिवार के कब्जे में रहे। बाद में नासिर खान के सैनिकों ने आसा अहीर का धोखे से वध कर दिया था।[84]
 
प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, मालिक नासिर खान(1399-1437) का मुख्य उद्देश्य असीरगढ़ को हथियाना था। आसा अहीर पहले ही मालिक नासिर के पिता की अधीनता स्वीकार कर उसकी प्रभुता स्थापित करने में उसकी मदद कर रहा था। एक बार मालिक नासिर ने आसा को सूचना भेजी की वह मुसीबत में है अतः आसा के पास अपने परिवार के सदस्यो को हिफाजत के लिए भिजवा रहा है और आसा से उनकी रक्षा हेतु निवेदन किया। आसा ने अपने परिवार के साथ नासिर खान द्वारा भेजे गए डोलो का स्वागत किया परंतु डोलो में नासिर के परिवार की औरते नहीं, उसके सैनिक निकले जिन्होने आसा को उसके पुत्रो सहित मौत के घाट उतार दिया और असीरगढ़ किले पर कब्जा कर लिया।[85]
लक्ष्मीदेव, भंभागिरि
 
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सिंहन के अम्बा शिलालेख (1240 AD) के अनुसार,भंभागिरि के अभीर राजा लक्ष्मीदेव को परास्त कर, अहीर राजाओं की बहादुर नस्ल को मटियामेट करने का श्रेय सेनापति खोलेश्वर को जाता है।[87]
 
कान्ह-देव संपादित करें
अम्बा शिलालेख (1240 AD) में यादव राजा कान्ह-देव को 'जंगल में आग की तरह' की संज्ञा दी गयी है। साथ ही "आभीर कुल".... अपूर्ण रूप में शिलालेख में वर्णित है।[87]
 
गुंडा के एक गुफा अभिलेख में क्षत्रप रुद्र सिंहा (181 AD) व उसके आभीर (अहीर) सेनापति रुद्रभूति का वर्णन है। सभी अभीरों के नाम ईश्वर, शिव, रुद्र आदि से प्रतीत होता है कि अभीरों का भगवान शिव से आस्थिक सम्बंध था। इसी तथ्य को लेकर 'रेगनाल्ड ई॰ एंथोवेन' ने इस मत से इंकार किया कि आभीर कृष्ण के वंशज है, क्योंकि ये दोनों देव पौराणिक प्रतिद्वंदी माने जाते हैं।[88][91] गुंडा अभिलेख में सेनपति रुद्रभूति द्वारा एक तालाब बनवाने का भी वर्णन है।[92]
 
ईश्वरसेन संपादित करें
नासिक के गुफा अभिलेख के अनुसार वहाँ ईश्वरदत्त के पुत्र अभीर राजकुमार ईश्वरसेन का शासन रहा है।[88][91] नासिक अभिलेख में ईश्वरसेन माधुरीपुत्र का उल्लेख है। ईश्वरसेन अभीर शासक ईश्वरदत्त का पुत्र था। यह राजवंश (अभीर या अहीर) 249-50 AD में प्रारम्भ हुआ था, इस काल को बाद में कलचूरी या चेदी संवत के नाम से जाना गया।[93] ईश्वरसेन (सन 1200) में एक अहीर राजा था।[94] सतपुड़ा मनुदेवी मंदिर, आदगाव एक हेमंदपंथी मंदिर है इसकी स्थापना वर्ष 1200 में राजा ईश्वरसेन ने की थी।[95] कलचूरी चेदी संवत जो कि 248 AD में प्रारभ होती हे, ईश्वरसेन ने इसकी स्थापना की थी। [96]
 
माधुरीपुत्र संपादित करें
माधुरीपुत्र यादव राजपूत वंश का एक अहीर राजा था।[97] मानव वैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह के अनुसार पूर्व में अहीर कहे जाने वाले राजा कालांतर में यादव राजपूतों में विलीन हो गए।[98][99]
 
 
महोबा का वीर, आल्हा
आल्हा व उदल, मूलतः जंगलों में पाये जाने के कारण 'बनाफर' नामित समुदाय के दसराज के पुत्र थे, दसराज चंदेल राजा परमल का सेनापति था।[114]था आल्हा की माता देवकी अहीर जाति की थी। अहीर मूलतः प्राचीन कालीन चरवाहा परंपरा की किसान जाति है, जो कि राजपूत मूल्यों का अनुसरण करते हैं, परंतु जो लोग वंशानुगत लालसाओं को उपलब्धियों से बढकर मानते हैं, वे अहीरों को 'कल्पित राजपूत' कहते हैं।[115] बनाफ़रों की माता ही नहीं अपितु उनकी दादी भी बक्सर की अहीर जाति की थी।[115]
 
मशहूर महाकाव्य आल्हखण्ड में पृथ्वीराज चौहान के दत्तक पुत्र चौड़ा अहीर व भागलपुर के भगोला अहीर की वीरता का भी वर्णन किया गया है।[116]
 
राजा दिग्पाल अहीर, महाबन, मथुरा
 
दिग्पाल एक अहीर राजा था जिसने महाबन पर शासन किया।[117] महाबन शहर का अधिकांश भाग पहाड़ी क्षेत्र है जो कि 100 बीघा जमीन पर फैला हुआ है। यहीं पर एक प्राचीन किला है जिसका निर्माण राणा कटेरा ने कराया था। राणा कटेरा, दिग्पाल के बाद महाबन का राजा बना था।[118]
 
राणा कटेरा, महाबन
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