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:* प्रेमाश्रयी शाखा
 
= हिन्दूहिंदी साहित्य का भक्ति काल =
हिंदी साहित्य का '''भक्तिकाल''' 1375 वि0वि.स. से 1700 वि0वि.स. तक(1343 मानाई.स. जातासे है।१६४3 यहई.स.) युगतक भक्तिकालके कालखंड को हिंदी साहित्य के नामअंतर्गत से प्रख्यातभक्तिकाल है।नाम यहदिया हिंदीगया है । साहित्य काएवं भक्ति तत्व की दृष्टी से यह श्रेष्ठ युग है। समस्त हिंदी साहित्य केकी श्रेष्ठदृष्टी कविसे औरएह उत्तमश्रेष्ठतम रचनाएंकवियों इसऔर युगश्रेष्ठ में प्राप्तरचनाओं का काल होतीहै हैं।
 
रामानुजाचार्य की परंपरा में रामानंद हुए। उनका व्यक्तित्व असाधारण था। वे उस समय के सबसेमहान बड़ेआचार्यों आचार्य थे।की श्रेणी में स्वामी रामानुजाचार्य की गणना हिती थी । उन्होंने भक्ति आन्दोलन के क्षेत्रमाध्यम से समाज में व्याप्त ऊंच-नीच का भेद तोड़खत्म दिया।करने का भरकस प्रयास किया । सभी जातियोंजाति- समुदाय के अधिकारीअधिकारिक व्यक्तियों को आपनेउन्होंने अपनी शिष्य बनाया।परंपरा में सम्मिलित किया था, उस समय काभक्तिके सन्दर्भ में प्रचलित सूत्र होभी इसी बात की पुष्टि करता है , जैसे - जाति-पांति पूछे नहीं कोई। हरि को भजै सो हरि का गयाःहोई।।
 
इसके उपरांत माध्वमाधव तथा निंबार्क संप्रदायोंसंप्रदाय आदि. का भी जन-समाजसमुदाय पर प्रभाव पड़ा है। साधना- के क्षेत्र में दो अन्य संप्रदायसम्प्रदायों का भी उस समय विद्यमानबोलबाला था थे। नाथों के योग-मार्ग से प्रभावित संत संप्रदाय चला जिसमें प्रमुख व्यक्तित्व [[कबीर|संत कबीरदास]] का है। मुसलमान कवियों का सूफीवाद हिंदुओं के विशिष्टाद्वैतवाद से बहुत भिन्न नहीं है। कुछ भावुक मुसलमान कवियों द्वारा सूफीवाद से रंगी हुई उत्तम रचनाएं लिखी गईं। संक्षेप में भक्ति-युग की चार प्रमुख काव्य-धाराएं मिलती हैं : ज्ञानाश्रयी शाखा, [प्रेमाश्रयी शाखा]], कृष्णाश्रयी शाखा और रामाश्रयी शाखा, प्रथम दोनों धाराएं निर्गुण मत के अंतर्गत आती हैं, शेष दोनों सगुण मत के अंतर्गत आती हैं।
जाति-पांति पूछे नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।
 
इसके उपरांत माध्व तथा निंबार्क संप्रदायों का भी जन-समाज पर प्रभाव पड़ा है। साधना-क्षेत्र में दो अन्य संप्रदाय भी उस समय विद्यमान थे। नाथों के योग-मार्ग से प्रभावित संत संप्रदाय चला जिसमें प्रमुख व्यक्तित्व [[कबीर|संत कबीरदास]] का है। मुसलमान कवियों का सूफीवाद हिंदुओं के विशिष्टाद्वैतवाद से बहुत भिन्न नहीं है। कुछ भावुक मुसलमान कवियों द्वारा सूफीवाद से रंगी हुई उत्तम रचनाएं लिखी गईं। संक्षेप में भक्ति-युग की चार प्रमुख काव्य-धाराएं मिलती हैं : ज्ञानाश्रयी शाखा, [प्रेमाश्रयी शाखा]], कृष्णाश्रयी शाखा और रामाश्रयी शाखा, प्रथम दोनों धाराएं निर्गुण मत के अंतर्गत आती हैं, शेष दोनों सगुण मत के अंतर्गत आती हैं।
 
= संत कवि =