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शास्त्रीय अनुबंधन को पॉवलव का सिद्धान्त भी कहा जाता है क्योंकि इसका आविष्कार एक रूसी वैज्ञानिक इवान पी. पॉवलव ने किया था जो [[उद्दीपक (मनोविज्ञान)|उद्दीपन]] और अनुक्रिया के बीच सम्बन्धों का अध्ययन करने में रुचि रखते थे। उन्होने कुत्तों पर अध्ययन किये। एक कुत्ते को बांधकर रखा गया और प्रयोगशाला सहायक ने कुत्ते के सामने भोजन प्रस्तुत किया। पॉवलव ने पाया कि कुत्ते ने लार स्रावित करने की अनुक्रिया को सीख लिया था। उन्होंने अनुबन्धन की इस विधि पर विस्तार से अध्ययन किये।
 
पॉवलव ने कुत्ते पर क्रमबद्ध प्रयास किये जिसमें ध्वनि (घण्टी) और भोजन (शारीरिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तेजना) को साथ में संलग्न किया गया। सीखने के इस प्रयास में ध्वनि (अनुबन्धित उत्तेजना) और भोजन (अनुबन्धित उत्तेजना) को साथ में सम्मिलित किया गया। ध्वनि प्रस्तुत करने का समय काफी कम था (उदाहरण 10 से ) और ध्वनि और भोजन प्रस्तुत करने के मध्य में करीब 2 से 3 मिनटसेकंड का अन्तर हो ताहोता था।
 
शुरू के कुछ प्रयासों में कुत्ता भोजन प्रस्तुत हो नेहोने पर लार स्रावित करता था। खाना देखते ही लार स्रावित होना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है इसीलिए लार को '''अननुबन्धित अनुक्रिया''' कहा गया। बाद के प्रयासों में घंटी पहले बजाई गई उसके बाद खाना प्रस्तुत किया गया। घंटी और भोजन के एक साथ कुछ प्रयोगों के बाद कुत्ते ने अकेले घंटी के बजते ही लार स्रावित करना शुरू कर दिया था। ध्वनि को अनुबधित उत्तेजना कहा गया क्यों कि कुत्ते का अनुबन्धन ध्वनि के साथ हो गया और वह घंटी बजते ही लार स्रावित करने लगता था। घंटी के बजते ही लार का स्रावित हो जाना अनुबन्धित अनुक्रिया कहलाई।
 
यह पाया गया है कि हर प्रयास में अगर घंटी (अनुबन्धित उत्तेजना) तो बजाई जाती है परन्तु भोजन प्रस्तुत नहीं किया जाता तो अनुबन्धन का विलोप हो जाता है। अर्थात् घंटी के बजने से कोई भी लार स्रावित नहीं होगी और यदि कई प्रयासों में लगातर ऐसा ही किया जाता है तो विलोपन की स्थिति आ जाती है।
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