"रहस्यवाद" के अवतरणों में अंतर

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हिंदी साहित्य में रहस्यवाद सर्वप्रथम मध्य काल में दिखाई पड़ता है। संत या निर्गुण काव्यधारा में कबीर के यहाँ, तथा प्रेममार्गी या सूफी काव्यधारा में जायसी के यहाँ रहस्यवाद का प्रयोग हुआ है। दोनों परम सत्ता से जुड़ना चाहते हैं और उसमें लीन होना चाहते हैं—कबीर योग के माध्यम से तथा जायसी प्रेम के माध्यम से; इसलिए कबीर का रहस्यवाद अंतर्मुखी व साधनात्मक रहस्यवाद है तथा जायसी का बहिर्मुखी व भावनात्मक रहस्यवाद है।
 
मुख्यतः रहस्यवाद के दो भेद है साधनात्मक रहस्यवाद और भावनात्मक रहस्यवाद।
 
सूफियों में मुख्यता भावनात्मक रहस्यवाद ही मिलता हैं जो कि उस समय भारत में अनुपस्थित था । जब सूफी लोग भारत आये तो उन्हें भावनात्मक रहस्यवाद नहीं मिला क्योंकि अवतारवाद की स्वीकृति के कारण यहाँ न तो निर्गुण . अमूर्त ईश्वर की समस्या थी और न ही ईश्वर से प्रेम करने की मनाही थी । इन्हें हठयोगियों का साधनात्मक रहस्यवाद ही दिखाई दिया । समन्वय की चेष्टा के तहत इन्होंने अपने रहस्यवाद में उसका अंश भी स्वीकारा । पद्मावत में आदिनाथ के रूप में शिव का आना इसका ही एक उदाहरण है।
 
== रहस्यवाद के अंतर्गत प्रेम के स्तर ==