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http://www.lionexpress.in/<nowiki/>{{ज्ञानसन्दूक त्योहार
| त्योहार_के_नाम = धनतेरस
|चित्र = Godofayurveda.jpg
 
== प्रथा==
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धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में [[अमृत]] से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन [[धन]] (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग [[धनिया]] के [[बीज]] खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://www.india.com/hindi-news/faith-hindi/dhanteras-2020-date-time-dhanteras-kab-hai-will-be-celebrated-on-this-day-know-subh-muhurat-puja-vidhi-or-story-4198149/|title=Dhanteras 2020 Date & Timing: आज या कल, किस दिन मनाया जाएगा धनतेरस , जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि|last=Desk|first=India com Hindi News|website=India News, Breaking News, Entertainment News {{!}} India.com|language=hi|access-date=2020-11-12}}</ref>
 
धनतेरस के दिन [[चाँदी|चांदी]] खरीदने की भी प्रथा है; जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग चांदी के बने बर्तन खरीदते हैं। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह [[चन्द्रमा]] का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह [[स्वास्थ्य|स्वस्थ]] है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के [[देवता]] भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही [[दीपावली]] की रात [[लक्ष्मी]], [[गणेश]] की पूजा हेतु [[मूर्ति]] भी खरीदते हैं। हालाकि यह सब लोकवेद है, जिसका हमारे पवित्र ग्रंथो में कहीं भी वर्णन नहीं है। [[श्रीमद्भगवद्गीता]] अध्याय 16 के श्लोक 23 और 24 में इसे शाश्त्र विरुध्द साधना कहा गया है।<ref>{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/dhanteras-2020-hindi/|title=Dhanteras 2020 Hindi: जानिए धनतेरस से जुड़ी आमधारणा व अंधविश्वास के बारे में|date=2020-11-12|website=S A NEWS|language=en-US|access-date=2020-11-12}}</ref>
 
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धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक [[लोककथा]] है। कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने [[गंधर्व विवाह|गन्धर्व विवाह]] कर लिया।
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