"चक्रवर्ती राजगोपालाचारी" के अवतरणों में अंतर

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|caption = महात्मा गांधी एवं चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1947)
|office = गवर्नर जनरल
|monarch = [[जॉर्ज षष्ठम्|जॉर्ज VIछठवाँ]]
|monarch = [[जॉर्ज षष्ठम्|जॉर्ज VIछठवाँ]]
|primeminister = [[जवाहरलाल नेहरू]]
|term_start = 21 जून 1948
|term_end = 26 जनवरी 1950
|predecessor = [[लुईस माउंटबेटन, बर्मा के पहले अर्ल माउंटबेटन|बर्मा के अर्ल माउंटबेटन]]
|successor = इस पद को समाप्त कर दिया गया।
|office2 = मद्रास के मुख्यमंत्री
|governor2 = [[:en:Sri Prakasa|श्री प्रकासा]]
|term_start2 = 10 अप्रैल 1952
|term_end2 = 13 अप्रैल 1954
|predecessor2 = [[:en:|Pपी. Sएस. Kumaraswamy Rajaपी. एस कुमारस्वामी राजा]]
|successor2 = [[:en:K. Kamaraj|के कामराज]]
|office3 = [[भारत के गृह मंत्री|गृह मंत्री]]
|primeminister3 = [[जवाहरलाल नेहरू]]
|successor3 = [[कैलाश नाथ काटजू]]
|office4 = पश्चिम बंगाल के [[राज्यपाल (भारत)|राज्यपाल]]
|premier4 = [[:en:Prafulla Chandra Ghosh|प्रफुल्ल चंद्र घोष]]<br />[[बिधान चंद्र रॉय|बिधान चंद्र राय]]
|term_start4 = 15 अगस्त 1947
|term_end4 = 21 जून 1948
|religion = [[हिन्दू धर्म|हिंदू]]
}}
'''चक्रवर्ती राजगोपालाचारी''' (तमिल: சக்ரவர்தி ராஜகோபாலாச்சாரி) (दिसम्बर १०, १८७८ - दिसम्बर २५, १९७२), राजाजी[[भारत]] नाम से भी जाने जाते हैं। वेके [[अधिवक्ता|वकील]], [[लेखक]], [[राजनीति]]ज्ञ और [[दार्शनिक]] थे। वे राजाजी नाम से भी जाने जाते हैं। वे स्वतन्त्र भारत के द्वितीय गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे। १० अप्रैल १९५२ से १३ अप्रैल १९५४ तक वे [[चेन्नई|मद्रास प्रांतप्रान्त]] के मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत के [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] के प्रमुख नेता थे, किन्तु बाद में वे कांग्रेस के प्रखर विरोधी बन गए तथा [[स्वतंत्र पार्टी]] की स्थापना की। वे [[महात्मा गांधी|गांधीजी]] के समधी थे। (राजाजी की पुत्री लक्ष्मी का विवाह गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र [[देवदास गांधी]] से हुआ था।) उन्होंने दक्षिण भारत में [[हिन्दी]] के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कार्य किया। Ha
 
'''चक्रवर्ती राजगोपालाचारी''' (तमिल: சக்ரவர்தி ராஜகோபாலாச்சாரி) (दिसम्बर १०, १८७८ - दिसम्बर २५, १९७२), राजाजी नाम से भी जाने जाते हैं। वे [[अधिवक्ता|वकील]], [[लेखक]], [[राजनीति]]ज्ञ और [[दार्शनिक]] थे। वे स्वतन्त्र भारत के द्वितीय गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे। १० अप्रैल १९५२ से १३ अप्रैल १९५४ तक वे [[चेन्नई|मद्रास प्रांत]] के मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत के [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस|कांग्रेस]] के प्रमुख नेता थे, किन्तु बाद में वे कांग्रेस के प्रखर विरोधी बन गए तथा [[स्वतंत्र पार्टी]] की स्थापना की। वे [[महात्मा गांधी|गांधीजी]] के समधी थे। (राजाजी की पुत्री लक्ष्मी का विवाह गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र [[देवदास गांधी]] से हुआ था।) उन्होंने दक्षिण भारत में [[हिन्दी]] के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कार्य किया। Ha
 
== आरम्भिक जीवन ==
 
== मुख्यमंत्री ==
[[चित्र:Rajagopalachari declares India as a Republic.jpg|left|thumb|300px|भारत को गणतंत्र घोषित करते हुए राजाजी]]
 
सन 1937 में हुए काँसिलोकाउन्सिलों के चुनावों में चक्रवर्ती के नेतृत्व में कांग्रेस ने मद्रास प्रांत में विजय प्राप्त की। उन्हें मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया गया। 1939 में ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच मतभेद के चलते कांग्रेस की सभी सरकारें भंग कर दी गयी थीं। चक्रवर्तीराजाजी ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसी समय [[द्वितीय विश्वयुद्ध|दूसरे विश्व युद्ध]] का आरम्भ हुआ, कांग्रेस और चक्रवर्तीराजाजी के बीच पुन:पुनः ठन गयी। इस बार वह गांधी जी के भी विरोध में खड़े थे। गांधी जी का विचार था कि ब्रिटिश सरकार को इस युद्ध में मात्र नैतिक समर्थन दिया जाए, वहीं राजा जी का कहना था कि भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देने की शर्त पर ब्रिटिश सरकार को हर प्रकार का सहयोग दिया जाए। यह मतभेद इतने बढ़ गये कि राजा जी ने कांग्रेस की कार्यकारिणी की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 1942 में '[[भारत छोड़ो' आन्दोलन]] प्रारम्भ हुआ, तब भी वह अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ गिरफ्तार होकर जेल नहीं गये। इस का अर्थ यह नहीं कि वह देश के स्वतंत्रता संग्राम या कांग्रेस से विमुख हो गये थे। अपने सिद्धांतोंसिद्धान्तों और कार्यशैली के अनुसार वह इन दोनों से निरंतरनिरन्तर जुड़े रहे। उनकी राजनीति पर गहरी पकड़ थी। 1942 के इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने देश के विभाजन को स्पष्ट सहमति प्रदान की। यद्यपि अपने इस मत पर उन्हें आम जनता और कांग्रेस का बहुत विरोध सहना पड़ा, किंतुकिन्तु उन्होंने इसकी चिंताचिन्ता नहीं की। इतिहास गवाह है कि 1942 में उन्होंने देश के विभाजन को सभी के विरोध के बाद भी स्वीकार किया, सन 1947 में वही हुआ। यही कारण है कि कांग्रेस के सभी नेता उनकी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता का लोहा मानते रहे। कांग्रेस से अलग होने पर भी यह अनुभव नहीं किया गया कि वह उससे अलग हैं।
 
== राज्यपाल ==
1946 में देशभारत की अंतरिम सरकार बनी। उन्हें केन्द्र सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया। 1947 में देश के पूर्ण स्वतंत्र होने पर उन्हें [[पश्चिम बंगाल]] का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके अगले ही वर्ष वह स्वतंत्र भारत के प्रथम 'गवर्नर जनरल' जैसे अति महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किए गये। सन 1950 में वे पुन: केन्द्रीय मंत्रिमंडल में ले लिए गये। इसी वर्ष सरदार [[वल्लभ भाई पटेल]] की मृत्यु होने पर वे केन्द्रीय गृह मंत्री बनाये गये। सन 1952 के आम चुनावों में वह लोकसभा सदस्य बने और [[मद्रास]] के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए। इसके कुछ वर्षों के बाद ही कांग्रेस की तत्कालीन नीतियों के विरोध में उन्होंने मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस दोनों को ही छोड़ दिया और अपनी पृथक स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की।
 
अपनी वेशभूषा से भी भारतीयता के दर्शन कराने वाले इस महापुरुष का 28 दिसम्बर 1972 को निधन हो गया।
1946 में देश की अंतरिम सरकार बनी। उन्हें केन्द्र सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया। 1947 में देश के पूर्ण स्वतंत्र होने पर उन्हें बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके अगले ही वर्ष वह स्वतंत्र भारत के प्रथम 'गवर्नर जनरल' जैसे अति महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किए गये। सन 1950 में वे पुन: केन्द्रीय मंत्रिमंडल में ले लिए गये। इसी वर्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल की मृत्यु होने पर वे केन्द्रीय गृह मंत्री बनाये गये। सन 1952 के आम चुनावों में वह लोकसभा सदस्य बने और मद्रास के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए। इसके कुछ वर्षों के बाद ही कांग्रेस की तत्कालीन नीतियों के विरोध में उन्होंने मुख्यमंत्री पद और कांग्रेस दोनों को ही छोड़ दिया और अपनी पृथक स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की।
 
== सम्मान ==
1954 में भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले राजा जी को 1954 में [[भारत रत्‍न|भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वह विद्वान और अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी थे। जो गहराई और तीखापन उनके बुद्धिचातुर्य में था, वही उनकी लेखनी में भी था। वह [[तमिल]] और [[अंग्रेज़ी]] के बहुत अच्छे लेखक थे। '[[गीता]]' और '[[उपनिषद|उपनिषदों]]' पर उनकी टीकाएं प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा रचित ''[[चक्रवर्ति तिरुमगन]]'', जो गद्य में रामायण कथा है, के लिये उन्हें सन् १९५८ में [[साहित्य अकादमी पुरस्कार]] ([[साहित्य अकादमी पुरस्कार तमिल|तमिल]]) से सम्मानित किया गया।<ref name="sahitya">{{cite web | url=http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | title=अकादमी पुरस्कार | publisher=साहित्य अकादमी | accessdate=11 सितंबर 2016 | archive-url=https://web.archive.org/web/20160915135020/http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | archive-date=15 सितंबर 2016 | url-status=dead }}</ref> यह गद्य में [[रामायण]] कथा है। उनकी लिखी अनेक कहानियाँ उच्च स्तरीय थीं। 'स्वराज्य' नामक पत्र उनके लेख निरंतर प्रकाशित होते रहते थे। इसके अतिरिक्त नशाबंदी और [[स्वदेशी]] वस्तुओं विशेषकर [[खादी]] के प्रचार प्रसार में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
 
1954 में भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले राजा जी को [[भारत रत्‍न|भारत रत्न]] से सम्मानित किया गया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वह विद्वान और अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी थे। जो गहराई और तीखापन उनके बुद्धिचातुर्य में था, वही उनकी लेखनी में भी था। वह तमिल और अंग्रेज़ी के बहुत अच्छे लेखक थे। 'गीता' और 'उपनिषदों' पर उनकी टीकाएं प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा रचित ''[[चक्रवर्ति तिरुमगन]]'', जो गद्य में रामायण कथा है, के लिये उन्हें सन् १९५८ में [[साहित्य अकादमी पुरस्कार]] ([[साहित्य अकादमी पुरस्कार तमिल|तमिल]]) से सम्मानित किया गया।<ref name="sahitya">{{cite web | url=http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | title=अकादमी पुरस्कार | publisher=साहित्य अकादमी | accessdate=11 सितंबर 2016 | archive-url=https://web.archive.org/web/20160915135020/http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/awards/akademi%20samman_suchi_h.jsp | archive-date=15 सितंबर 2016 | url-status=dead }}</ref> उनकी लिखी अनेक कहानियाँ उच्च स्तरीय थीं। 'स्वराज्य' नामक पत्र उनके लेख निरंतर प्रकाशित होते रहते थे। इसके अतिरिक्त नशाबंदी और स्वदेशी वस्तुओं विशेषकर खादी के प्रचार प्रसार में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
 
== निधन ==
अपनी वेशभूषा से भी भारतीयता के दर्शन कराने वाले इस महापुरुष का 28 दिसम्बर 1972 को निधन हो गया।
 
== इन्हें भी देखें==