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"आओ गांव चले"
'''सालासर बालाजी''' भगवान [[हनुमान]] के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है। यह [[राजस्थान]] के [[चूरू जिला|चूरू जिले]] में स्थित है। वर्ष भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। हर वर्ष [[चैत्र]] पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। बाकि चेहरे पर राम भक्ति में राम आयु बढ़ाने का सिंदूर चढ़ा हुआ है। कहा जाता है इस मंदिर का निर्माण मुस्लिम कारीगरों ने किया था, जिसमे मुख्य थे फतेहपुर से नूर मोहम्मद व दाऊ।
 
"सलासर का इतिहास"
 
( सालासर _भक्त व भगवान्  के बीच कोई दलाल नहीं)
 
               _30 वर्ष पहले स्व. विशन सिंह शेखावत "खाचरियावास "का पत्रिका में लिखा आलेख,
 
सालासर गांव  हनुमान जी मंदिर के कारण प्रसिद्ध है ।सीकर से सुजानगढ़ जाने वाली सड़क पर बसे इस स्थान पर यात्रियों व हनुमान भक्तों से भरी हुई बसें जीपे ,कारें दिनभर दिखाई देती है । मद्रास ,कोलकाता तथा विदेश में रहने वाले हनुमान जी की स्वामनी करने के लिए यहां आकर अपने मन के संकल्प को पूरा हुआ, जानकर आत्म विभोर हो जाते हैं। आसोज पूर्णिमा के मेले में तो हज़ारों व्यक्ति कट्ठे हो जाते हैं ।जिला प्रशासन की तरफ से 200 पुलिस के जवान लगाए जाते हैं ।इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हनुमानजी के प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव रखने वाले लोगों की संख्या में कितनी वृद्धि हुई है ।सालासर में किसी तरह का ढोंग पाखंड नहीं है। हरिजन और मुसलमान भी श्रद्धा से जाते हैं। भगवान और भक्त के बीच कोई दलाल नहीं है ।यही यहां की विशेषता है । कुण आवै, कुन पावे। यह कोई नहीं जानता।
 
यात्री चूरमा दाल बाटी की स्वामिनी देते हैं। स्वामनी इतनी आती है कि चूरमा को कूटना भी परेशानी का काम हो जाता था ।इसका भी उपाय निकाल लिया है चूरमा कूटने की मशीनें गाजियाबाद से  मंगाई गई है ।यह मशीन  3 मिनट में सवा मण बाटियों का चूरमा तैयार कर देती  है ।
 
चैत की पूर्णिमा, आसोज की पूर्णिमा के दो विशाल मेलों में यात्रियों के आने के कारण सुविधाओं में निरंतर सुधार होता जा रहा है। सालासर में यात्रियों की सुविधाओं के लिए 2 मंजिली सभी प्रकार की सुविधा से युक्त धर्मशालाएं हैं,  धर्मशाला में यात्री को बड़ी प्रसन्नता पूर्वक ठहराया जाता है। ओढ़ने बिछाने के लिए रजाई गद्दे भी मुफ्त दिए जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यात्री को यहां आने के बाद सिवाय नारियल अथवा प्रसाद के अलावा एक पैसा भी खर्च करना नहीं पड़ता। स्वेच्छा से खाना चाहे तो मुफ्त भोजन भी मिल जाता है।  यहां पर शुद्ध काम है। एक व्यक्ति ने इस संबंध में बताया कि बालाजी जाने और भक्त जाने ।
 
                सालासर में बालाजी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा सावन सुदी नवमी शनिवार सम्वत 1811 में 237 वर्ष पहले हुई थी l पहले सड़कें बिजली तथा आवागमन की सुविधा नहीं थी। लोग उंटो पर बैठ कर आते थे। 25 से ज्यादा धर्मशालाएं बन गई है । 50 से ज्यादा हनुमान जी के प्रसाद और तस्वीरें आदि की दुकानें खुल गई है। धर्मशालाओं के प्रबंध के कारण सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ है ।सालासर के 500 परिवारों  की आमदनी सालासर के मंदिर के कारण हो जाती है ।
 
       दूध अनाज यहां की यहां ही बिक जाता है। पैदावार वृद्धि के कारण भवन निर्माण का कार्य भी चलता रहता है ।
 
       कहते हैं कि रूल्याणी गांव के दायमा ब्राह्मणों की एक लड़की कानी बाई की सालासर में शादी हुई थी । बहन के विधवा होने पर कानी बाई का भाई मोहनदास सालासर सहायता के लिए आया था।उन दिनों पड़ोस के असोटा गांव के खेत में एक मूर्ति हल चलाते नजर आई थी। आसोटा ठाकुर को स्वप्न में यह आभास हुआ कि इस हनुमान मूर्ति को सालासर में स्थापित किया जाए ।सालासर में मोहन दास की धूनी थी, वहां मूर्ति स्थापित किए जाने के बाद सेवा पूजा का कार्य मोहनदास के दो भांजे सुखराम व उदय राम को सौंपा ।इन दो ब्राह्मणों के परिवार के पास ही बालाजी का पूजापा है। इन दोनों के 200 के करीब दायमा गोत्र के परिवार सालासर में बालाजी की सेवा पर ही निर्भर है । मामा मोहन दास की तपस्या का परिणाम है कि इतने वर्षों के बाद स्थल की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती जा रही है।
 
      सालासर नाम भी ठाकुर सालम सिंह के नाम पर है। कहते हैं कि सीकर की सीमा पर लगे हुए इस स्थान का पट्टा सालम सिंह राव जी का शेखावत जाति के राजपूत को बीकानेर के राजा ने दिया था। उन दिनों दक्षिणी मराठों के झुंड के झुंड राजस्थान के गांव को लूटते फिरते थे ।सालम सिंह दिन में एक बार बाबा मोहन दास जी की धूनी पर आया जाया करते थे। एक दिन धूनी पर नहीं आए  तो मोहनदास ही आसोटा चले गए। पूछा तो ठाकुर साहब ने बताया कि मराठे गांव को लूटने आ रहे हैं ।
 
बाबा मोहन दास के आशीर्वाद से बंदूकों की आवाज के साथ ही मराठे वहां  से भाग  गए। इसके बाद मोहनदास बाबा तथा हनुमान जी की  मूर्ति के चमत्कार की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई ।असोटा के ठाकुर पहला व्यक्ति था जिसकी भेंट से मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था। आज के दिन भव्य मंदिर है ।धूप की सुगंध, नगाड़ों और यज्ञ धूनी  की अखण्ड  जोत 237 बरस से निरंतर जल रही है।
 
सालासर में बाबा मोहन दास ने जीवित समाधि ली थी ।वहां छतरी बनी हुई है। बहन कानी बाई के पगले भी हैं। इतने वर्षों बाद भी सालासर का नाम लेते हैं तो सालम सिंह तथा बहन भाई मोहनदास व कानी भाई को अवश्य याद करते हैं। विधवा बहन के लिए भाई ने जो प्रसाद दिया व सैकड़ों वर्षो तक उनके परिवार के लोग पाते रहेंगे।
 
        सालासर में हाथ करघा उद्योग हैं। यहां पर गमछे बनते हैं।  यात्रियों की सुविधाओं के लिए दो बरतन भंडार खुले हुए हैं ।  भंडारों में इतने बर्तन है कि 15000 यात्रियों के लिए पर्याप्त है ।यात्री चाहे जितना बर्तन ले उसको इसके लिए एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ता ।हनुमान सेवा समिति की सन 80 में महावीर प्रसाद ने स्थापना की थी। यह समिति यात्रियों की सुख सुविधा का ध्यान रखती है। सालासर का पानी खारा है, पानी पीते ही पता चल जाता है कि सदियों तक खारा पानी पी पीकर इलाके के लोग कैसे मजबूती से डटे थे ।खारा पानी होने के कारण एक ही फसल खासकर होती है। बाजरा ,मोठ मूंग की पैदावार है। पशु खूब पाल रखे हैं। पहले गांव के लोग पैदावार से अनाज की पहली भरण भरकर बालाजी के मंदिर में चढ़ाते थे।
 
यहां पर सीनियर हायर सेकेंडरी, संस्कृत की पाठशाला, मातृ शिशु केंद्र हैं। अस्पताल को सीकर के सेकसरिया व सुजानगढ़ के कनोई सेठ ने बनाया है। हनुमान सेवा समिति ने पानी निकासी की व्यवस्था की है । लोहिया परिवार बस स्टैंड बनवा रहा है। मंदिर में एक ही संकेत है "जात पात पूछे नहीं कोई ,हरि को भजे सो हरि का होई! चुन्नीलाल मेघवाल जनता पार्टी से एमएलए रहे हैं।    60 परिवार जाटों के 40 राजपूतों के परिवारों के पास खेती का काम है। बस व जीपे आदि बहुत है ।ऑटोमोबाइल्स की दुकानें खुल गई है। सालासर तक सड़क महाराजा गंगा सिंह के जमाने में बन गई थी ।
 
सालासर में स्वामी करपात्री जी, जगद्गुरु शंकराचार्य, राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा आदि  आए।   मोहन दास जी की तिथि पर यहां भोग होता है, 25 हजार लोग मंदिर की तरफ से हलवे का प्रसाद पाते हैं। पानी की 3 योजनाएं चलती है ।नौरंगसर की योजना भीखाभाई के समय हुई थी । मंगलूना  से 10 किलोमीटर पाइप लाइन लगाकर मीठे पानी को लाया गया है ।सालासर में पंचायत भी है। सालासर में 30 पार्टियों ने नावा के पास नमक बनाने का नया धंधा शुरू किया है ।ज्यादातर लोगों का गांव में ही निजी व्यवसाय है। यहां पर चढ़ाए हुए सौ बरस के नारियल सुरक्षित है। हरियाणा पंजाब की भी काफी धर्मशालाएं बनी हुई है। इन दिनों 60% यात्री हरियाणा पंजाब से आते हैं । खीर जलेबी की रसोई खूब होती हैं।
 
_ संकलन कर्ता: जितेंद्र सिंह शेखावत व पूजा सिंह'''सालासर बालाजी''' भगवान [[हनुमान]] के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है। यह [[राजस्थान]] के [[चूरू जिला|चूरू जिले]] में स्थित है। वर्ष भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। हर वर्ष [[चैत्र]] पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। बाकि चेहरे पर राम भक्ति में राम आयु बढ़ाने का सिंदूर चढ़ा हुआ है। कहा जाता है इस मंदिर का निर्माण मुस्लिम कारीगरों ने किया था, जिसमे मुख्य थे फतेहपुर से नूर मोहम्मद व दाऊ।
हनुमान सेवा समिति, मंदिर और मेलों के प्रबन्धन का काम करती है। यहाँ रहने के लिए कई धर्मशालाएँ और खाने-पीने के लिए कई जलपान-गृह (रेस्तराँ) हैं। श्री हनुमान मंदिर सालासर कस्बे के ठीक मध्य में स्थित है। वर्त्तमान में सालासर हनुमान सेवा समिति ने भक्तों की तादाद बढ़ते देखकर दर्शन के लिए अच्छी व्यवस्था की है।